जहाँ धर्म है वहाँ दया है, पर निर्णय नीति से होता है

 व्यामास्थाय परमां धर्माविचलन् नृपः ।
पीड़ितानामनाथानां कुर्यादक्षु प्रमार्जनम् ॥

इस श्लोक का आशय है कि राजा करुणा से पीड़ितों की रक्षा करे, लेकिन अपने धर्म और नीति से कभी विचलित न हो।

विषयसूची 

  • परिचय – जब करुणा और कर्तव्य आमने-सामने हों

  • कामान्द्की नीतिसार क्या है? – एक प्राचीन नीतिशास्त्र

  • कामन्दकीय नीतिसार में राजधर्म करुणा से ऊपर क्यों माना गया है?

  • शासक के लिए कर्तव्य करुणा से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?

  • आधुनिक भारत में नीति ने करुणा पर कैसे प्राथमिकता पाई?

  • शिवाजी महाराज और अफ़ज़ल ख़ान प्रसंग से क्या नीति-संदेश मिलता है?

  • नेतृत्व में करुणा और नीति का संतुलन कैसे बनाया जाए?

  • निष्कर्ष – करुणा हृदय की, निर्णय बुद्धि की

  • FAQs – करुणा और नीति से जुड़े सामान्य प्रश्न

परिचय – जब करुणा और कर्तव्य आमने-सामने हों

कल्पना कीजिए, एक राजा युद्ध में अपने शत्रु को पराजित करता है। शत्रु अब रक्षाहीन है, उसकी प्रजा रो रही है। राजा के मन में करुणा उमड़ती है, लेकिन उसका मंत्री उसे याद दिलाता है: “राजन्! यह समय भावुक होने का नहीं, धर्म पर अडिग रहने का है।

करुणा बड़ी या नीति  यह प्रश्न उतना ही पुराना है जितना शासन स्वयं। कामन्दकीय नीतिसार स्पष्ट करता है कि जहाँ धर्म में करुणा आवश्यक है, वहीं शासन में निर्णय नीति से होना चाहिए। एक शासक यदि केवल भावुक करुणा के आधार पर निर्णय ले, तो वह अपने राजधर्म से विचलित हो सकता है। यही संघर्ष इस लेख का मूल विषय है।



Religion is guided by compassion, but governance must be guided by policy and duty.


क्या है 'कामान्द्की नीतिसार'?

नीति, शक्ति और व्यवहार का प्राचीन ग्रंथ

कामान्द्की नीतिसार एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ है जो राजा, मंत्री और राज्य व्यवस्था से संबंधित आदर्शों और रणनीतियों का समुच्चय है। इसे कौटिल्य अर्थशास्त्र के बाद दूसरा सबसे प्रभावशाली नीतिशास्त्रीय ग्रंथ माना जाता है।

  • यह ग्रंथ सत्ता, युद्धनीति, नैतिकता, कूटनीति और न्याय जैसे विषयों पर गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

  • इसमें राजा के धर्म और व्यवहार की स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित की गई हैं।


कामन्दकीय नीतिसार में राजधर्म करुणा से ऊपर क्यों माना गया है?

 क्या एक राजा दया के चलते अपने कर्तव्यों को छोड़ सकता है?

नीति का मूल संदेश – धर्म सर्वोपरि है

नीतिसार हमें सिखाता है कि एक राजा का मुख्य धर्म है अपने राज्य और प्रजा की रक्षा करना। वह यदि करुणा के नाम पर अपने शत्रुओं को क्षमा करता है या कड़ी कार्रवाई नहीं करता, तो उसका साम्राज्य अस्थिर हो सकता है।

"राजा वह नहीं जो केवल दयालु हो, बल्कि वह है जो उचित समय पर कठोर निर्णय ले सके।"

'करुणा' एक गुण है, 'कर्तव्य' एक जिम्मेदारी

करुणा, न्याय के मार्ग में बाधक नहीं होनी चाहिए। राजा को संतुलन बनाकर चलना चाहिए:

  • जहाँ आवश्यक हो वहाँ न्यायपूर्ण दंड देना चाहिए।

  • जहाँ अन्याय हो रहा हो, वहाँ करुणा नहीं, साहस चाहिए।


आधुनिक भारत में इस नीति की प्रासंगिकता

समकालीन उदाहरण – करुणा और कर्तव्य का संघर्ष

1. प्रधानमंत्री द्वारा आतंकवाद के प्रति 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति

हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कई अवसरों पर करुणा के स्थान पर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। उदाहरणस्वरूप:

  • सर्जिकल स्ट्राइक (2016): आतंकवादी हमलों के बाद सरकार ने भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर ठोस कार्रवाई की।

  • बाला कोट एयर स्ट्राइक (2019): राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए नीतिगत निर्णय।

यदि करुणा के नाम पर सख़्त निर्णयों से बचा जाता, तो देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती थी।

2. न्यायपालिका में कठोर निर्णय

जब बलात्कार या हत्या जैसे मामलों में अदालतें सख़्त सजा सुनाती हैं, तब कई बार भावनात्मक अपीलें आती हैं। लेकिन:

  • निर्भया केस में फांसी की सज़ा ने न्याय की भावना को स्थापित किया।

  • न्यायालय ने यह सिद्ध किया कि भावुकता नहीं, न्याय सर्वोपरि होना चाहिए।


केस स्टडी: छत्रपति शिवाजी महाराज और अफज़ल खान

अफज़ल खान ने जब शिवाजी महाराज को धोखे से मारने की योजना बनाई, तब भी शिवाजी ने पहले सम्मान और शांति से वार्ता का प्रस्ताव रखा। लेकिन जैसे ही धोखे का संकेत मिला, उन्होंने साहस और रणनीति का परिचय दिया।

"करुणा से आँख मूंदकर अपने धर्म से विमुख होना एक राजा के लिए अधर्म है।"


नेतृत्व के लिए सन्देश: नीति और करुणा का संतुलन ज़रूरी है

अच्छे नेतृत्व के लिए नीति का पालन अनिवार्य है

  • नीति के बिना करुणा नेतृत्व को कमज़ोर बना सकती है।

  • करुणा के बिना नीति नेतृत्व को क्रूर बना सकती है।

इसलिए, श्रेष्ठ नेता वही है जो दोनों में संतुलन बनाए रखे।


करुणा के साथ न्याय भी आवश्यक है

राजा या कोई भी नेता केवल अपने दिल की सुनकर नहीं चल सकता। उसे समय, परिस्थिति और नीति का आकलन करते हुए निर्णय लेना होता है।

कामान्द्की नीतिसार का यह शिक्षण आज के लोकतांत्रिक और नेतृत्व-प्रधान भारत में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में।

"नेता वही जो करुणा में नीति और नीति में करुणा देखे!"


संन्यास आश्रम और वैराग्य: आध्यात्मिक जीवन की गहराई - हमारी पिछली पोस्ट पढ़ें।

प्रश्न-उत्तर 

प्रश्न: क्या आज के नेताओं को भी प्राचीन नीतिशास्त्र पढ़ने चाहिए?

उत्तर: बिल्कुल! कामान्द्की नीतिसार और कौटिल्य अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ आज के नेताओं को नैतिकता, कूटनीति और निर्णय लेने की स्पष्टता प्रदान करते हैं।

प्रश्न: क्या एक नेता कभी करुणा दिखा सकता है?

उत्तर: हाँ, लेकिन करुणा ऐसी होनी चाहिए जो नीति और न्याय की सीमाओं में हो, न कि उनके विपरीत।

प्रश्न: क्या नीति-आधारित निर्णय करुणा के विरुद्ध होते हैं?
उत्तर: नहीं। नीति करुणा को नियंत्रित करती है, न कि समाप्त। नीति के बिना करुणा अराजकता बन जाती है।


आज के समय में, जब भावनाएं और जनभावनाएं नेताओं को प्रभावित कर सकती हैं, कामान्द्की नीतिसार का यह ज्ञान हमें सिखाता है कि राजा या शासक को अपने धर्म (कर्तव्य) से डिगना नहीं चाहिए।

एक सच्चा शासक वही है जो नीतिपूर्ण निर्णय लेता है, भले ही वह निर्णय भावुकता के विपरीत क्यों न हो। तभी वह समाज और राष्ट्र की सही मायनों में सेवा कर सकता है।

करुणा बड़ी या नीति?


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