कामन्दकीय नीतिसार में धर्म और अधर्म की पहचान

कामन्दकीय नीतिसार का शाश्वत सिद्धांत, धर्म और अधर्म की पहचान।

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परिचय

धर्म और अधर्म की चर्चा भारतीय दर्शन का सदाबहार विषय है। हर युग में मनुष्य यह जानना चाहता है कि, सही क्या है और गलत क्या है। अक्सर लोग सोचते हैं कि धर्म का मतलब केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान है, लेकिन भारतीय परंपरा धर्म को कहीं व्यापक अर्थ में देखती है।

कामन्दकीय नीतिसार, जो राजनीति और राज्यशास्त्र पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, उसमें धर्म और अधर्म की पहचान का अत्यंत स्पष्ट सूत्र दिया गया है। इस सूत्र की खास बात यह है कि यह न केवल प्राचीन काल में बल्कि आज के आधुनिक जीवन में भी पूरी तरह प्रासंगिक है।

श्लोक और अनुवाद

यमार्याः क्रियमाणं हि शंसन्त्यागमवेदिनः ।
स धर्मो यं विगर्हन्ति तमधर्मं प्रचक्षते ॥ 
(कामन्दकीय नीतिसार 6/7)

अनुवाद:
जिस कर्म की प्रशंसा सज्जन और शास्त्रज्ञ विद्वान करते हैं, वही धर्म है। और जिसे वे निंदनीय बताते हैं, वही अधर्म है।

श्लोक की व्याख्या

यह श्लोक धर्म और अधर्म की पहचान का एक सरल लेकिन गहन सूत्र प्रस्तुत करता है।

  • आर्याः” – इसका अर्थ है सज्जन, साधु और सच्चरित्र लोग, जिनका जीवन आदर्श और नैतिकता पर आधारित होता है। ये लोग केवल ज्ञानवान ही नहीं होते बल्कि अपने आचरण से समाज का मार्गदर्शन भी करते हैं।
  • आगमवेदिनः” – इसका तात्पर्य है वे विद्वान जो वेद, शास्त्र और आगम को गहराई से समझते हैं। ऐसे आचार्य धर्मशास्त्र के नियमों और जीवन के नैतिक सिद्धांतों का विवेकपूर्ण उपयोग करते हैं।
जब कोई कार्य इन दोनों की दृष्टि में प्रशंसनीय होता है।अर्थात् सज्जन लोग उसे आदर्श मानते हैं और शास्त्रज्ञ उसे शास्त्रसम्मत ठहराते हैं। तो वह धर्म कहलाता है। इसके विपरीत, यदि कोई आचरण उन्हें अनुचित और निंदनीय प्रतीत होता है, तो वही अधर्म है।

उदाहरण
  • धर्म का उदाहरण: सत्य बोलना। सत्य बोलने को सज्जन लोग भी सराहते हैं और शास्त्र भी इसे धर्म का अंग मानते हैं।
  • अधर्म का उदाहरण: झूठ बोलकर किसी का नुकसान करना। इसे सज्जन लोग भी निंदनीय मानते हैं और शास्त्र भी इसे अधर्म बताते हैं।


धर्म की परिभाषा

धर्म की परिभाषा

धर्म केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है बल्कि,
  • समाजहितकारी आचरण – ऐसा कार्य जो समाज की शांति, व्यवस्था और कल्याण को बढ़ाए।
  • शास्त्रसम्मत कार्य – जो कार्य वेद, शास्त्र और आगम के अनुसार उचित हों।
  • सदाचारी जनों की स्वीकृति – जिसे सज्जन और चरित्रवान लोग उचित और प्रशंसनीय मानें।
इस प्रकार, धर्म का अर्थ है “वह आचरण जो व्यक्ति और समाज दोनों के कल्याण से जुड़ा हो।


अधर्म का स्वरूप

अधर्म का अर्थ केवल पाप या कानूनी अपराध भर नहीं है। यह उससे कहीं व्यापक है।
  • अनैतिक आचरण: ऐसा व्यवहार जो नैतिक मूल्यों के विरुद्ध हो।
  • समाज के लिए हानिकारक कार्य: जो समाज की शांति, विश्वास और व्यवस्था को नष्ट करे।
  • सज्जनों व विद्वानों की दृष्टि में निंदनीय कार्य: जिसे शास्त्रज्ञ और सच्चरित्र लोग अनुचित ठहराएँ।
इस प्रकार, अधर्म वह है जो व्यक्ति की आत्मा को कलुषित करे और समाज को नुकसान पहुँचाए।

उदाहरण
  • रिश्वत लेना और देना।
  • व्यापार या नौकरी में धोखाधड़ी।
  • कमजोर वर्ग का शोषण।
  • अत्यधिक लालच और अनियंत्रित भोगवृत्ति।


धर्म और अधर्म 


देश-काल-परिस्थिति के अनुसार धर्म

कामन्दकीय नीतिसार की श्लोक में कहा गया है कि धर्म और अधर्म का स्वरूप पूर्णतः स्थिर नहीं होता, बल्कि यह देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है।
  • देशानुसार धर्म:- जो कार्य एक स्थान पर उचित माना जाता है, वही किसी दूसरे स्थान पर अनुचित हो सकता है।  उदाहरण: भोजन की कुछ परंपराएँ एक देश में धर्मसम्मत मानी जाती हैं, परंतु दूसरी जगह वर्जित होती हैं।
  • कालानुसार धर्म:- समय बदलने के साथ आचार-विचार भी बदलते हैं। जो प्राचीन काल में धर्म था, वह आज की सामाजिक परिस्थितियों में व्यावहारिक न भी हो।उदाहरण: कभी बहुपत्नी प्रथा स्वीकार्य थी, आज इसे अधर्म माना जाता है।
  • परिस्थिति अनुसार धर्म:-कभी-कभी आपातकालीन या विशेष परिस्थिति में ऐसा कर्म, जो सामान्यतः गलत माना जाता है, धर्म बन जाता है। उदाहरण: युद्ध में छल से शत्रु को पराजित करना सामान्य स्थिति में अधर्म है, पर राष्ट्ररक्षा के लिए इसे धर्म मान लिया जाता है।

देश-काल-परिस्थिति
  

इस प्रकार धर्म का वास्तविक स्वरूप स्थिर नियमों से नहीं, बल्कि सामाजिक हित, न्याय और परिस्थिति की माँग के अनुसार तय होता है।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

कामन्दकीय नीतिसार का यह श्लोक केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं है, बल्कि आज के जीवन में भी उतना ही मार्गदर्शक है।
  • व्यक्तिगत आचरण में:- हमें यह देखना चाहिए कि हमारा कोई भी कार्य केवल हमें ही नहीं, बल्कि समाज को भी लाभ पहुँचाए। यदि हमारे कार्य से दूसरों को हानि होती है, तो वह धर्म नहीं माना जा सकता।
  • नैतिक निर्णयों में:- किसी भी निर्णय से पहले हमें यह सोचना चाहिए कि क्या यह आचरण नैतिक है और क्या इसे समाज के विवेकशील लोग स्वीकार करेंगे। यदि सज्जन और विद्वान लोग उसे उचित न मानें, तो वह अधर्म की श्रेणी में आएगा।
  • सार्वजनिक जीवन में:- राजनीति, व्यापार और सामाजिक संबंधों में यह सूत्र और भी आवश्यक है। केवल कानूनी दृष्टि से सही होना पर्याप्त नहीं है; सही वही है जो न्यायसंगत और समाजहितकारी हो।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

 यही कारण है कि यह श्लोक आज के दौर में भी हमें सही-गलत का भेद स्पष्ट करने की प्रेरणा देता है।

व्यावहारिक उदाहरण

  • धर्म
    • ईमानदारी से व्यापार करना।
    • कठिन समय में सत्य बोलना।
    • दूसरों की मदद करना।
  • अधर्म
    • रिश्वत लेना।
    • झूठ बोलकर लाभ उठाना।
    • किसी की मेहनत का शोषण करना।
व्यावहारिक उदाहरण


निष्कर्ष

कामन्दकीय नीतिसार का यह श्लोक हमें सिखाता है कि धर्म और अधर्म की पहचान केवल ग्रंथ पढ़कर नहीं, बल्कि सज्जन और शास्त्रज्ञों की दृष्टि से करनी चाहिए। सही-गलत का निर्णय हमेशा विवेक और समाजहित को ध्यान में रखकर होना चाहिए।


प्रश्नोत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: क्या धर्म और अधर्म हमेशा बदलते रहते हैं?
उत्तर: हाँ, उनका स्वरूप देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है, लेकिन मूल सिद्धांत वही रहते हैं।
प्रश्न 2: क्या केवल शास्त्र पढ़कर धर्म समझा जा सकता है?
उत्तर: नहीं, इसके लिए आचरणशील विद्वानों और समाज के सज्जनों की दृष्टि भी आवश्यक है।
प्रश्न 3: क्या धर्म केवल पूजा-पाठ है?
उत्तर: नहीं, धर्म जीवन के हर क्षेत्र में आचरण का मार्गदर्शन करता है।



धर्म और अधर्म को समझना उतना कठिन नहीं है जितना लोग सोचते हैं। बस हमें अपने कर्मों को इस कसौटी पर कसना है कि क्या यह कार्य शास्त्रज्ञ और सज्जन लोगों की दृष्टि में प्रशंसनीय है या नहीं। अगर आपको यह लेख उपयोगी लगा तो इसे अपने मित्रों और सोशल मीडिया पर साझा करें। नीचे कमेंट में बताइए कि आपके अनुसार आज के समय में धर्म और अधर्म की पहचान कैसे होनी चाहिए।

पाठकों के लिए सुझाव

  • कामन्दकीय नीतिसार और अन्य नीतिशास्त्र ग्रंथों का अध्ययन करें।
  • जीवन में निर्णय लेने से पहले समाजहित और नैतिकता को देखें।
  • चर्चा और संवाद के माध्यम से अपनी समझ को और गहरा करें।

संदर्भ

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