वैशेषिक दर्शन: प्राचीन भारत का वैज्ञानिक दर्शन
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| वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक ऋषि कणाद - जिन्होंने ब्रह्माण्ड को परमाणुओं में विश्लेषित किया |
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प्रस्तावना: एक भूला हुआ वैज्ञानिक दर्शन
आज जब हम 'विज्ञान' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में आधुनिक प्रयोगशालाएँ, सफेद कोट पहने वैज्ञानिक और जटिल उपकरणों की छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की भूमि पर हज़ारों वर्ष पूर्व एक ऐसा दर्शन विकसित हुआ था जो पूरी तरह से ब्रह्माण्ड के वैज्ञानिक विश्लेषण पर केंद्रित था? यह दर्शन था वैशेषिक, जिसकी नींव ऋषि कणाद ने रखी थी।
वैशेषिक दर्शन को अक्सर भारतीय दर्शन के इतिहास में उपेक्षित रखा गया है, परन्तु यह वास्तव में दुनिया के सबसे पुराने भौतिकी और रसायन विज्ञान के दर्शनों में से एक है। इस दर्शन की खासियत यह है कि यह अध्यात्म और भौतिकता के बीच एक सुनहरा सेतु बनाता है। जहाँ एक ओर यह परमाणु के सूक्ष्मतम सिद्धांतों की व्याख्या करता है, वहीं दूसरी ओर यह मोक्ष और नैतिकता की ऊँचाइयों तक पहुँचता है।
आज के इस डिजिटल युग में, जब विज्ञान और आध्यात्म के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है, वैशेषिक दर्शन हमें यह याद दिलाता है कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से हम इस प्राचीन परन्तु अत्यंत आधुनिक दर्शन की गहराइयों में उतरेंगे और देखेंगे कि कैसे यह हमारे आज के जीवन के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।
वैशेषिक दर्शन क्या है और इसकी उत्पत्ति कैसे हुई?
वैशेषिक दर्शन भारत के छह शास्त्रीय दर्शनों में से एक है जिसका प्रमुख उद्देश्य ब्रह्माण्ड की वास्तविक प्रकृति को समझना है। 'वैशेषिक' शब्द 'विशेष' से बना है, जिसका अर्थ है 'विशिष्टता' या 'विशेष गुण'। यह दर्शन हर पदार्थ के विशेष गुणों और उनके वर्गीकरण पर ध्यान केंद्रित करता है।
वैशेषिक दर्शन की उत्पत्ति लगभग 600 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच हुई मानी जाती है। इस काल को भारतीय दर्शन का स्वर्ण युग कहा जा सकता है, जब विभिन्न विचारधाराएँ फल-फूल रही थीं।
वैशेषिक दर्शन के मूल सिद्धांत क्या हैं?
- पदार्थ का वर्गीकरण:- वैशेषिक दर्शन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को सात मूलभूत श्रेणियों (पदार्थ) में वर्गीकृत करता है
- परमाणु सिद्धांत:- यह दर्शन परमाणुवाद का प्रतिपादन करता है, जो दुनिया के सबसे पुराने परमाणु सिद्धांतों में से एक है
- नैतिक आधार:- भौतिक विश्लेषण के साथ-साथ यह नैतिकता और आध्यात्मिक विकास पर भी बल देता है
- अनुभवजन्य दृष्टिकोण:- वैशेषिक तर्क और प्रेक्षण को ज्ञान प्राप्ति के मुख्य साधन मानता है
कणाद कौन थे और वैशेषिक सूत्र क्या हैं?
कणाद वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनका नाम 'कण' और 'अद' शब्दों से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'कणों का भक्षण करने वाला'। यह नाम उनकी गहन वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाता है जो सूक्ष्म कणों तक पहुँचती थी।
कणाद के जीवन के बारे में बहुत कम ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध है, परन्तु उनकी रचना 'वैशेषिक सूत्र' आज भी उनकी प्रतिभा का प्रमाण है। कहा जाता है कि उन्होंने अपना अधिकांश समय प्रकृति का अवलोकन करते हुए बिताया और उसके रहस्यों को समझने का प्रयास किया।
वैशेषिक सूत्र की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
- सूत्र शैली:- वैशेषिक सूत्र संक्षिप्त, सटीक और गहन अर्थ वाले सूत्रों का संग्रह है
- व्यवस्थित विश्लेषण:- इसमें ब्रह्माण्ड के तत्वों का क्रमबद्ध और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है
- 370 सूत्र:- मूल वैशेषिक सूत्र में लगभग 370 सूत्र हैं जो 10 अध्यायों में विभाजित हैं
- व्यावहारिक दर्शन:- यह केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन से जुड़ा दर्शन है
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| कणाद का प्रकृति प्रेम उनके दर्शन की नींव बना |
पदार्थ के सात प्रकार कौन-कौन से हैं?
वैशेषिक दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण और अनूठी देन है पदार्थों का वर्गीकरण। इस दर्शन के अनुसार, समस्त ब्रह्माण्ड सात मूलभूत पदार्थों या श्रेणियों से मिलकर बना है। इन्हें 'सप्त पदार्थ' कहा जाता है।
यह वर्गीकरण इतना व्यवस्थित है कि आज के वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रणालियों से तुलना की जा सकती है। हर पदार्थ की अपनी विशेषताएँ, गुण और कार्य हैं जो उसे अन्य पदार्थों से अलग करते हैं।
इन सात पदार्थों का विस्तृत विवरण क्या है?
1. द्रव्य (पदार्थ):- यह सभी भौतिक तत्वों का आधार है
- पृथ्वी:- ठोस पदार्थ जिसमें गंध का गुण होता है
- जल:- तरल पदार्थ जिसमें रस का गुण होता है
- तेज/अग्नि:- ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत
- वायु:- गैसीय अवस्था जिसमें स्पर्श का गुण होता है
- आकाश:- सभी तत्वों को समाहित करने वाला स्थान
- काल:- समय की अवधारणा
- दिक्:- दिशा और स्थान की अवधारणा
- आत्मा:- चेतना का स्रोत
- मन:- चिंतन और अनुभूति का केंद्र
2. गुण (गुण): द्रव्य के अभिन्न लक्षण
- 17 मूल गुण:- रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न
- गुणों की विशेषता:- गुण स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान नहीं हो सकते, उन्हें द्रव्य में ही रहना पड़ता है
3. कर्म (क्रिया) गति और परिवर्तन के सिद्धांत
- पाँच प्रकार की गतियाँ:- ऊपर की ओर, नीचे की ओर, संकुचन, प्रसार और गमन
- कर्म का स्वभाव:- कर्म अस्थायी होता है लेकिन इसका प्रभाव स्थायी हो सकता है
4. सामान्य (सामान्यता)- समानता और वर्गीकरण का आधार
- सर्वसामान्य:- वह सामान्य गुण जो सभी वस्तुओं में पाया जाता है, जैसे 'अस्तित्व'
- परसामान्य:- विशिष्ट वर्गों में पाई जाने वाली समानता
5. विशेष (विशिष्टता):- प्रत्येक वस्तु की अद्वितीयता
- परमाणु की विशेषता:- हर परमाणु अपने आप में अद्वितीय है
- व्यक्तित्व का आधार:- यही विशेषता प्रत्येक वस्तु को अन्य से अलग बनाती है
6. समवाय (अविभाज्य संबंध):- अटूट संबंधों का सिद्धांत
- पूर्ण और अंश का संबंध:- जैसे कपड़े और उसके धागे
- गुण और द्रव्य का संबंध:- गुण का द्रव्य से अविभाज्य संबंध
7. अभाव (अनुपस्थिति):- गैर-अस्तित्व की अवधारणा
चार प्रकार के अभाव:- प्रागभाव (उत्पत्ति से पहले का अभाव), ध्वंसाभाव (विनाश के बाद का अभाव), अत्यंताभाव (सदैव का अभाव), अन्योन्याभाव (पारस्परिक अभाव)
गुण और कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है?
वैशेषिक दर्शन में गुण और कर्म की अवधारणाएँ ब्रह्माण्ड की गतिशीलता को समझने की कुंजी हैं। गुण किसी पदार्थ के स्थायी लक्षण हैं, जबकि कर्म उसमें होने वाली गति और परिवर्तन है। इन दोनों के समन्वय से ही ब्रह्माण्ड की जटिलता समझ में आती है।
गुण और कर्म का यह सिद्धांत न केवल भौतिक जगत को समझने में मदद करता है बल्कि मानवीय अनुभवों और मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को भी स्पष्ट करता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और इस परिवर्तन के पीछे गुणों की अंत:क्रिया कार्य करती है।
गुणों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है?
- मूल गुण और व्युत्पन्न गुण:- कुछ गुण मूलभूत हैं जबकि कुछ इनके संयोग से उत्पन्न होते हैं
- गुणों की संख्या:- वैशेषिक दर्शन में 17 मूल गुण माने गए हैं, लेकिन बाद के विद्वानों ने इनकी संख्या बढ़ाई भी है
- गुणों का संबंध:- प्रत्येक गुण किसी न किसी द्रव्य से संबंधित होता है, स्वतंत्र रूप से गुण का अस्तित्व नहीं हो सकता
कर्म के विभिन्न प्रकार क्या हैं?
- उत्क्षेपण (ऊपर की ओर गति):- जैसे पक्षी का उड़ना
- अवक्षेपण (नीचे की ओर गति):-जैसे पत्थर का गिरना
- आकुंचन (संकुचन):- जैसे ठंड में शरीर का सिकुड़ना
- प्रसरण (प्रसार):- जैसे गर्मी में वस्तुओं का फैलना
- गमन (एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति):- जैसे व्यक्ति का चलना
नैतिकता और आध्यात्मिकता का पदार्थ से क्या संबंध है?
वैशेषिक दर्शन की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यह भौतिक विश्लेषण और आध्यात्मिक उन्नति के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है। अक्सर भौतिकवाद और आध्यात्मवाद को परस्पर विरोधी माना जाता है, लेकिन वैशेषिक दर्शन इन दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में प्रस्तुत करता है।
इस दर्शन के अनुसार, पदार्थ का अध्ययन केवल भौतिक ज्ञान प्राप्ति के लिए नहीं है, बल्कि यह आत्म-ज्ञान की ओर एक कदम है। जब हम ब्रह्माण्ड की संरचना को समझते हैं, तो हम स्वयं को और उस परम सत्ता को भी बेहतर समझ पाते हैं।
नैतिक आचरण का वैज्ञानिक आधार क्या है?
- कारण-कार्य संबंध:- हर कर्म का फल होता है - यह वैज्ञानिक नियम है
- संतुलन का सिद्धांत:- प्रकृति में संतुलन बनाए रखना नैतिक आचरण का आधार है
- परस्पर निर्भरता:- सभी तत्व एक-दूसरे पर निर्भर हैं, इसलिए परोपकार नैतिकता का मूल है
आध्यात्मिक विकास के लिए भौतिक ज्ञान क्यों आवश्यक है?
- माया का भ्रम दूर करना:-भौतिक जगत की वास्तविकता समझकर ही हम माया के भ्रम से मुक्त हो सकते हैं
- आत्म-ज्ञान का मार्ग:- बाह्य जगत को समझना आंतरिक जगत को समझने की पहली सीढ़ी है
- मोक्ष की प्राप्ति:- वैशेषिक दर्शन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, जो ज्ञान के माध्यम से संभव है
वैशेषिक दर्शन आधुनिक विज्ञान से कितना मिलता-जुलता है?
जब हम वैशेषिक दर्शन के सिद्धांतों और आधुनिक विज्ञान की खोजों की तुलना करते हैं, तो हमें आश्चर्यजनक समानताएँ दिखाई देती हैं। यह दर्शन लगभग 2500 वर्ष पूर्व विकसित हुआ था, लेकिन इसकी अनेक मान्यताएँ आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से मेल खाती हैं।
विशेष रूप से क्वांटम भौतिकी और कण भौतिकी के क्षेत्र में वैशेषिक के सिद्धांत अत्यधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। इस तुलना से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि प्राचीन भारतीय ऋषि कितनी गहन दृष्टि रखते थे।
परमाणु सिद्धांत में क्या समानताएँ हैं?
- अविभाज्य इकाई:- वैशेषिक और आधुनिक विज्ञान दोनों परमाणु को सबसे छोटी अविभाज्य इकाई मानते हैं
- संयोग और वियोग:- दोनों में परमाणुओं के संयोग से वस्तुओं का निर्माण माना गया है
- गुणों का हस्तांतरण:- वैशेषिक के अनुसार, संयुक्त परमाणु अपने गुणों को नई वस्तु को प्रदान करते हैं
ऊर्जा और पदार्थ के संबंध में क्या तुलना की जा सकती है?
- पदार्थ-ऊर्जा संबंध:- वैशेषिक में 'तेज' (अग्नि) को ऊर्जा का स्रोत माना गया है
- रूपांतरण का सिद्धांत:- आधुनिक विज्ञान की तरह वैशेषिक भी पदार्थ के रूपांतरण को मानता है
- संरक्षण का नियम:- वैशेषिक में पदार्थ के नष्ट न होने की अवधारणा है
नवीनतम वैज्ञानिक घटनाओं के संदर्भ में:- 2022 में CERN में हिग्स बोसॉन पर की गई नवीनतम शोध और 2023 में क्वांटम एन्टैंगलमेंट पर हुई खोजें वैशेषिक दर्शन की अनेक मान्यताओं से मेल खाती हैं। विशेष रूप से, 'समवाय' (अविभाज्य संबंध) की अवधारणा क्वांटम एन्टैंगलमेंट से मिलती-जुलती है।
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| वैशेषिक दर्शन और आधुनिक विज्ञान में आश्चर्यजनक समानताएँ |
वैशेषिक दर्शन की मुख्य आलोचनाएँ क्या हैं?
किसी भी दर्शन की तरह वैशेषिक दर्शन की भी अपनी सीमाएँ हैं और समय के साथ विभिन्न विद्वानों ने इसकी आलोचनाएँ भी की हैं। इन आलोचनाओं को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें दर्शन की संपूर्ण समझ विकसित करने में मदद मिलती है।
वैशेषिक दर्शन मुख्य रूप से न्याय दर्शन के करीब माना जाता है, और कई बार न्याय-वैशेषिक को एक ही दर्शन के दो पहलू मान लिया जाता है। परन्तु गहराई से देखने पर इनमें मौलिक अंतर दिखाई देते हैं।
तार्किक आलोचनाएँ क्या हैं?
- अनंत रेग्रेशन की समस्या:- यदि हर वस्तु परमाणुओं से बनी है, तो परमाणु किससे बने हैं?
- गुणों का स्वतंत्र अस्तित्व:- गुणों का द्रव्य के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता - यह सिद्ध करना कठिन है
- काल और दिक् की अवधारणा:- समय और स्थान को स्वतंत्र पदार्थ मानना विवादास्पद है
वैज्ञानिक आलोचनाएँ क्या हैं?
- परमाणु की अविभाज्यता:- आधुनिक विज्ञान ने परमाणु को विभाजित कर दिया है
- तत्वों का सीमित वर्गीकरण:- केवल पाँच मूल तत्व मानना आधुनिक रसायन विज्ञान से मेल नहीं खाता
- गति के प्रकार:- गति के केवल पाँच प्रकार मानना अपर्याप्त है
आज के समाज में वैशेषिक दर्शन की प्रासंगिकता क्या है?
आज के तकनीकी युग में जहाँ हम भौतिकवाद और आध्यात्मवाद के बीच खड़े हैं, वैशेषिक दर्शन एक समन्वयकारी भूमिका निभा सकता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाएँ और आध्यात्मिक शांति दोनों एक साथ प्राप्त की जा सकती हैं।
विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के बाद के समय में, जब लोग स्वास्थ्य, पर्यावरण और आध्यात्मिकता के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं, वैशेषिक दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। यह हमें एक संतुलित जीवनशैली की ओर मार्गदर्शन कर सकता है।
शिक्षा के क्षेत्र में इसकी क्या उपयोगिता है?
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास:- वैशेषिक दर्शन तर्क और प्रेक्षण पर आधारित है
- अंतःविषय अध्ययन:- यह विज्ञान, दर्शन और नैतिकता को एक साथ जोड़ता है
- महत्वपूर्ण चिंतन:- छात्रों में महत्वपूर्ण चिंतन कौशल विकसित करने में सहायक
पर्यावरण संरक्षण में इसकी क्या भूमिका है?
- प्रकृति के प्रति सम्मान:- वैशेषिक दर्शन प्रकृति के सभी तत्वों को महत्व देता है
- संतुलन का सिद्धांत:- यह प्रकृति में संतुलन बनाए रखने पर बल देता है
- टिकाऊ विकास:- प्राचीन होते हुए भी यह टिकाऊ विकास की अवधारणा से मेल खाता है
अन्य भारतीय दर्शनों के साथ वैशेषिक का तालमेल कैसा है?
भारतीय दर्शन परंपरा अद्वितीय है क्योंकि यहाँ विभिन्न दर्शन एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित हुए हैं। वैशेषिक दर्शन भी इसका अपवाद नहीं है। यह न्याय, सांख्य, योग और वेदांत दर्शनों के साथ गहरा संबंध रखता है।
इन दर्शनों के बीच वाद-विवाद और संवाद की लंबी परंपरा रही है, जिसने भारतीय चिंतन को समृद्ध किया है। वैशेषिक दर्शन ने अन्य दर्शनों को प्रभावित किया है और स्वयं भी उनसे प्रभावित हुआ है।
न्याय दर्शन के साथ संबंध कैसा है?
- तार्किक आधार:- न्याय दर्शन तर्कशास्त्र पर केन्द्रित है जबकि वैशेषिक पदार्थ विज्ञान पर
- पूरक दर्शन:- अक्सर न्याय-वैशेषिक को एक ही दर्शन माना जाता है
- ज्ञान के स्रोत:- दोनों प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द को ज्ञान के स्रोत मानते हैं
सांख्य दर्शन से तुलना क्या है?
- तत्वों की संख्या:- सांख्य 25 तत्व मानता है जबकि वैशेषिक 9 द्रव्य
- द्वैत और बहुलता:- सांख्य द्वैतवादी है जबकि वैशेषिक बहुलतावादी
- मोक्ष का मार्ग:- सांख्य में विवेकज्ञान से मोक्ष जबकि वैशेषिक में धर्माचरण से
21वीं सदी में वैशेषिक दर्शन का क्या महत्व है?
21वीं सदी विज्ञान और तकनीक की सदी है, लेकिन साथ ही यह मानसिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और नैतिक मूल्यों के ह्रास की सदी भी है। ऐसे में वैशेषिक दर्शन की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है।
यह दर्शन हमें एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है जो भौतिक विकास और आध्यात्मिक शांति के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोम एडिटिंग और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीकों के युग में, वैशेषिक दर्शन हमें नैतिक मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
तकनीकी विकास के संदर्भ में इसकी क्या भूमिका है?
- नैतिक ढाँचा:- नई तकनीकों के लिए नैतिक ढाँचा प्रदान करना
- मानवीय मूल्यों का संरक्षण:- तकनीकी विकास के साथ मानवीय मूल्यों को बनाए रखना
- सामंजस्यपूर्ण विकास:- विज्ञान और आध्यात्म के बीच सामंजस्य स्थापित करना
वैश्विक समस्याओं के समाधान में यह कैसे सहायक है?
- जलवायु परिवर्तन:- प्रकृति के सभी तत्वों के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना
- मानसिक स्वास्थ्य:- भौतिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना
- शांति और सद्भाव:- विविधता में एकता के सिद्धांत को बढ़ावा देना
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निष्कर्ष: अतीत से भविष्य की ओर
वैशेषिक दर्शन भारतीय चिंतन परंपरा का एक गौरवशाली अध्याय है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं है और सत्य की खोज निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
आज जब हम नए वैज्ञानिक आविष्कारों और तकनीकी चमत्कारों से घिरे हैं, वैशेषिक दर्शन हमें यह याद दिलाता है कि सभी ज्ञान एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्राचीन और आधुनिक, विज्ञान और आध्यात्म, भौतिक और आत्मिक - ये सभी विपरीत ध्रुव नहीं बल्कि एक ही सत्य के विभिन्न पहलू हैं।
हमारा कर्तव्य है कि हम इस प्राचीन ज्ञान को संरक्षित करें, उसका अध्ययन करें और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ। वैशेषिक दर्शन न केवल हमारी विरासत है बल्कि भविष्य के लिए हमारा मार्गदर्शक भी है।
सवाल और जवाब
प्रश्न: वैशेषिक दर्शन और आधुनिक विज्ञान में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
उत्तर: वैशेषिक दर्शन आध्यात्मिकता को विज्ञान का अभिन्न अंग मानता है जबकि आधुनिक विज्ञान इसे अलग रखता है।
प्रश्न: क्या वैशेषिक दर्शन आज के युवाओं के लिए प्रासंगिक है?
उत्तर: हाँ, क्योंकि यह तार्किक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है।
प्रश्न: वैशेषिक दर्शन के अनुसार परमाणु किससे बना है?
उत्तर: वैशेषिक दर्शन के अनुसार परमाणु अविभाज्य है और यह सृष्टि की मूल इकाई है।
प्रश्न: क्या वैशेषिक दर्शन ईश्वर को मानता है?
उत्तर: वैशेषिक दर्शन ईश्वर को सृष्टि का नियंत्रक मानता है लेकिन उसे सृष्टिकर्ता नहीं मानता।
प्रश्न: आज वैशेषिक दर्शन का अध्ययन कहाँ किया जा सकता है?
उत्तर: भारतीय दर्शन के विभागों, संस्कृत विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के माध्यम से।
अंतिम विचार
वैशेषिक दर्शन हमें एक सरल सीख देता है - ब्रह्माण्ड को समझने के लिए हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतम की ओर देखना चाहिए। यह दर्शन न केवल ज्ञान का भंडार है बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है। आइए, हम इस प्राचीन परन्तु सदैव प्रासंगिक दर्शन से सीखें और एक बेहतर मानव बनें।
आपकी कार्रवाई का आह्वान
क्या आपने कभी सोचा है कि प्राचीन ज्ञान आपके आज के जीवन को कैसे समृद्ध कर सकता है? वैशेषिक दर्शन के बारे में और जानने के लिए आज ही एक कदम उठाएँ। अपने बच्चों को इस दर्शन से परिचित कराएँ, अपने मित्रों के साथ चर्चा करें, या स्वयं इसका अध्ययन प्रारंभ करें। यह न केवल आपका ज्ञान बढ़ाएगा बल्कि आपके जीवन को नई दिशा भी देगा।
मीमांसा दर्शन और कर्मकांड: एक सम्पूर्ण मार्गदर्शिका- अगला लेख पढ़ें।


