कामन्दकीय नीतिसार: कार्य के लिए शत्रु की प्रशंसा - रणनीति

कामन्दकीय नीतिसार का श्लोक और आधुनिक व्यवसाय व राजनीति का संगम
प्राचीन ज्ञान, आधुनिक अनुप्रयोग: कामन्दक का सूत्र आज भी प्रासंगिक क्यों है?

कीवर्ड: कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 82, कार्य की प्रधानता, व्यावहारिक राजनीति, चाणक्य नीति, प्रशंसा की कूटनीति

परिचय 

कल्पना कीजिए, आपको एक जीवनरक्षक परियोजना पूरी करनी है, लेकिन उसकी कुंजी आपके हाथ में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के पास है जिसे आप नैतिक रूप से पसंद नहीं करते, जिसकी विचारधारा आपसे मेल नहीं खाती, या जो आपका प्रतिद्वंद्वी भी हो सकता है। तब आप क्या करेंगे? उसकी आलोचना करके अपना मन हल्का कर लेंगे, या उसे खुश करके अपना काम निकलवाएंगे?
प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र के ग्रंथ कामन्दकीय नीतिसार का 82वां श्लोक इसी स्थिति के लिए एक चौंकाने वाला, परन्तु गहरा व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। यह सूत्र सिखाता है कि जब कोई बहुत बड़ा लक्ष्य सामने हो, तो व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, यहां तक कि नैतिक शुद्धतावाद भी पीछे रख देना चाहिए। कार्य की सिद्धि ही सर्वोपरि हो जाती है।
आज के जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य, कॉर्पोरेट शक्ति संघर्ष और सीमित संसाधनों के युग में यह सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। क्या यह नीति केवल अवसरवाद है या एक कठोर यथार्थवाद? आइए, इस प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में समझते हैं।

 मूल श्लोक और सरल अर्थ

कार्यस्य हि गरीयस्त्वात् नीचानामपि कालवित् ।
सतोऽपि दोषान् प्रच्छाद्य गुणानप्यसतो वदेत् ॥
कामन्दकीय नीतिसार

अर्थ

कार्य की महानता को समझने वाला बुद्धिमान व्यक्ति, कार्यसिद्धि के लिए नीच लोगों के भी दोषों को छिपा देता है और दुष्टों के गुणों की भी (आवश्यकता पड़ने पर) प्रशंसा करता है।

इस श्लोक में चार मूलभूत सिद्धांत निहित हैं:

  • कार्य की गुरुता: लक्ष्य इतना महत्वपूर्ण हो कि साधनों पर विवाद गौण हो जाए।
  • काल का ज्ञान: समय की मांग को पहचानना कि अब यह सिद्धांतों की दुहाई देने का नहीं, बल्कि काम निकालने का समय है।
  • दोषों का आच्छादन: आवश्यक व्यक्ति के दोषों को सार्वजनिक न करना, भले ही वे स्पष्ट हों।
  • गुणों का आरोपण: उस व्यक्ति में न होने वाले गुणों की भी, कार्य हेतु, प्रशंसा कर देना।

कार्य व्यक्ति से बड़ा क्यों होता है?

क्या किसी अनैतिक व्यक्ति से सहयोग लेना उचित है? कामन्दक का जवाब स्पष्ट है: हाँ, यदि परिणाम उस सहयोग से मिलने वाले लाभ से कहीं अधिक बड़ा और महत्वपूर्ण है। यह सिद्धांत व्यक्तिगत अहंकार को त्यागने की शिक्षा देता है।
यह दृष्टिकोण एक रणनीतिकार और एक आदर्शवादी के बीच मूलभूत अंतर रेखांकित करता है। रणनीतिकार का लक्ष्य 'सही होना' नहीं, बल्कि 'सफल होना' होता है। यही कारण है कि इतिहास के महान राजनयिक और सेनापति अक्सर अपने घोर विरोधियों से भी अस्थायी गठजोड़ कर लेते थे।
  • उद्देश्य की प्रधानता: व्यक्तिगत घृणा या आकर्षण से ऊपर उठकर संगठन, राज्य या राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानना।
  • संसाधनों का यथार्थवादी मूल्यांकन: दुनिया को वैसा न देखना जैसा वह होनी चाहिए, बल्कि वैसा देखना जैसी वह है। फिर उपलब्ध (भले ही अपूर्ण) संसाधनों से ही काम चलाना।
  • लचीली नैतिकता: एक कठोर, अटल नैतिकता के बजाय परिस्थिति के अनुसार ढलने वाली व्यावहारिक नैतिकता को अपनाना। इसे 'परिस्थितिजन्य नैतिकता' भी कह सकते हैं।

इस सिद्धांत को अपनाने के जोखिम क्या हैं?

हालांकि यह नीति व्यावहारिक लाभ देती है, इसके कुछ स्पष्ट जोखिम भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
  • विश्वसनीयता का संकट: लगातार दोषियों की प्रशंसा करने से आपकी अपनी विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
  • दीर्घकालीन नुकसान: अल्पकाल में कार्य सिद्ध हो सकता है, लेकिन लंबे समय में आप उस 'नीच' व्यक्ति पर निर्भर हो सकते हैं या उसके दोष आपके संगठन में प्रवेश कर सकते हैं।
  • नैतिक पतन की ओर ढलान: एक बार सिद्धांतों से समझौता करने का रास्ता खुल जाए, तो यह एक आदत बन सकती है और भविष्य में छोटे-छोटे लक्ष्यों के लिए भी नैतिकता को ताक पर रख दिया जा सकता है।

आधुनिक विश्व राजनीति में इस सिद्धांत के उदाहरण क्या हैं?

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य इस सिद्धांत का जीवंत प्रदर्शन क्षेत्र है। राष्ट्रहित सर्वोपरि होने के कारण देश अक्सर उन शासकों और व्यवस्थाओं के साथ काम करते हैं, जिनकी मान्यताएं उनके अपने मूल्यों के विपरीत होती हैं।
हाल की घटनाएं इसकी पुष्टि करती हैं।पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने तेल और ऊर्जा सुरक्षा के लिए कई बार ऐसे शासकों के साथ संबंध बनाए हैं, जिनके मानवाधिकार रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल हैं। इसी प्रकार, यूक्रेन संकटके दौरान विभिन्न देशों ने अपनी-अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों के आधार पर ऐसे गठबंधन बनाए, जो उनकी पारंपरिक विदेश नीति से मेल नहीं खाते थे।

क्या परमाणु अप्रसार जैसे वैश्विक मुद्दे भी इस नीति का पालन करते हैं?

बिल्कुल। वैश्विक सुरक्षा के लक्ष्य (कार्यस्य गरीयस्त्वात्) के आगे देश अक्सर अपनी आपत्तियाँ दबा देते हैं।
  • उत्तर कोरिया के साथ वार्ता: अमेरिका जैसे देश कई बार उत्तर कोरिया के साथ सीधी वार्ता करते हैं, भले ही वे उसके शासन को मान्यता नहीं देते। उसके दोषों (मानवाधिकार हनन) को एक तरफ रखकर, परमाणु अप्रसार (गुण) जैसे मुद्दे पर बातचीत होती है।
  • ईरान परमाणु समझौता: विश्व शक्तियों ने ईरान की कई गतिविधियों पर आंख मूंदकर, सिर्फ उसके परमाणु कार्यक्रम पर सीमित समझौता किया था। यहाँ लक्ष्य विशिष्ट और सीमित था।
  • जलवायु परिवर्तन समझौते: चीन या अन्य बड़े प्रदूषक देशों के आंतरिक मामलों पर चुप्पी साधकर, उन्हें वैश्विक जलवायु समझौतों में शामिल किया जाता है, क्योंकि बिना उनके सहयोग के यह 'कार्य' (जलवायु संरक्षण) असंभव है।
उदाहरण: भू-राजनीति वाले हिस्से में द्वितीय विश्व युद्ध का उदाहरण दिया जा सकता है, जहाँ हिटलर (बड़ी बुराई) को हराने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने स्टालिन (जिनकी विचारधारा एकदम अलग थी) से हाथ मिलाया था। यह 'कार्यस्य गरीयस्त्वात्' का सटीक ऐतिहासिक उदाहरण है।

कॉर्पोरेट जगत में यह रणनीति कैसे काम करती है?

कॉर्पोरेट बोर्डरूम और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में यह श्लोक एक मूलमंत्र की तरह काम कर सकता है। यहाँ 'कार्य' का अर्थ है प्रोजेक्ट की सफलता, क्वार्टरली प्रॉफिट, या बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना।
एक प्रोजेक्ट मैनेजर को अक्सर ऐसे स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) के साथ काम करना पड़ता है, जो अड़ियल, अक्षम या असहयोगी होते हैं। लेकिन अगर प्रोजेक्ट की सफलता उनकी मंजूरी या सहयोग पर टिकी है, तो उनकी कमियों की अनदेखी करके उनकी तारीफ करना एक रणनीतिक जरूरत बन जाती है।
आधुनिक शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू जैसे प्रकाशनों में 'स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट' और 'इन्फ्लुएंस विदाउट अथॉरिटी' जैसे विषयों पर लेख इसी बात पर जोर देते हैं कि तकनीकी कौशल से ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों को प्रभावित करने और साथ लेकर चलने का कौशल है।

क्या स्टार्ट-अप कल्चर में भी यह नीति देखी जा सकती है?

निस्संदेह। स्टार्ट-अप का मुख्य 'कार्य' होता है जीवित रहना और बढ़ना (Survival and Growth)। इस लक्ष्य के आगे कई समझौते होते हैं।
  • वेंचर कैपिटलिस्ट्स (VCs) के साथ संबंध: संस्थापक कई बार उन निवेशकों के सुझाव मान लेते हैं जिनसे वे सहमत नहीं होते, सिर्फ इसलिए कि फंडिंग जारी रहे।
  • प्रतिभाशाली लेकिन मुश्किल कर्मचारी: कई बार एक ऐसा जीनियस प्रोग्रामर या सेल्सपर्सन, जो टीम के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, उसकी कमियों को नजरअंदाज करके सिर्फ उसके असाधारण परिणामों (गुण) की प्रशंसा की जाती है।
  • प्रतिस्पर्धी सहयोग (Coopetition): एक ही बाजार के प्रतिद्वंद्वी कंपनियां कभी-कभी तकनीक या मानकों के मामले में सहयोग कर लेती हैं, क्योंकि बाजार का विस्तार (बड़ा कार्य) उनके आपसी झगड़े से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इस नीति का दुरुपयोग कैसे हो सकता है?

किसी भी शक्तिशाली उपकरण की तरह, इस नीति का भी अनुचित उपयोग संभव है। कामन्दक ने इसे 'कालवित्' (समयज्ञ) व्यक्ति के लिए निर्देशित किया है, यानी सिर्फ वही जो समय, परिस्थिति और अनुपात का ज्ञान रखता है, इसका सही उपयोग कर सकता है। इसके बिना यह नीति भ्रष्टाचार, अवसरवाद और नैतिक पतन का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

आधुनिक राजनीति में दुरुपयोग के उदाहरण क्या मिलते हैं?

दुर्भाग्य से, इस सिद्धांत को गलत ढंग से पेश करके या इसकी आड़ लेकर कई अनैतिक कार्यों को सही ठहराया जाता है।
  • भ्रष्ट गठबंधन (Corrupt Alliances): सत्ता में बने रहने (जो एक छोटा स्वार्थपूर्ण 'कार्य' है) के लिए भ्रष्ट नेताओं या अपराधिक तत्वों के साथ गठजोड़ करना और उनके दोषों को छिपाना।
  • अफवाहों और झूठ का प्रचार: चुनाव जीतने (कार्य) के लिए प्रतिद्वंद्वी के झूठे गुणों को गाना या उसकी झूठी बुराइयाँ फैलाना एक आम बात हो गई है, जो इस सिद्धांत का पूर्ण विपरीत है।
  • लोकतंत्र का क्षरण: कुछ नेता 'राष्ट्रीय सुरक्षा' या 'आर्थिक विकास' (बड़े कार्य) का हवाला देकर लोकतांत्रिक संस्थाओं, मीडिया की स्वतंत्रता और न्यायपालिका पर अंकुश लगाने का प्रयास करते हैं।

नैतिकता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन कैसे बनाएं?

यही इस पूरे विमर्श का सबसे कठिन और महत्वपूर्ण प्रश्न है। कामन्दक की नीति को अंधाधुंध अपनाना खतरनाक है, और पूरी तरह नकार देना अव्यावहारिक। कुंजी है 'संतुलन' और 'सचेतन प्रयोग'।
इसका मतलब यह नहीं कि आप हर समय हर किसी की झूठी तारीफ करें। बल्कि इसका अर्थ है कि आप उन दुर्लभ, महत्वपूर्ण अवसरों को पहचानें, जहां वास्तव में कोई बहुत बड़ा, सार्वजनिक हित का लक्ष्य दांव पर लगा हो, और उसके लिए अस्थायी रूप से अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को नियंत्रित कर लें।

एक आधुनिक नेता या प्रबंधक के लिए क्या मार्गदर्शक सिद्धांत हो सकते हैं?

इस नीति का नैतिक उपयोग सुनिश्चित करने के लिए कुछ फिल्टर लगाए जा सकते हैं।
  • लक्ष्य का महत्व: सबसे पहले स्वयं से पूछें: क्या यह लक्ष्य वास्तव में इतना विशाल और महत्वपूर्ण है कि इसके लिए सिद्धांतों से समझौता उचित है? क्या यह सिर्फ मेरा स्वार्थ या ऐशो-आराम तो नहीं?
  • अंतिम उपाय: क्या इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई अन्य, अधिक नैतिक रास्ता है? क्या मैंने सभी विकल्प आजमा लिए हैं?
  • पारदर्शिता की सीमा: क्या मैं इस रणनीति का उपयोग अपने टीम के सामने खुलकर बता सकता हूँ/सकती हूँ? अगर नहीं, तो शायद यह गलत है।
  • दीर्घकालीन प्रभाव: इस अस्थायी समझौते का मेरे चरित्र, मेरे संगठन की संस्कृति और समाज पर दीर्घकाल में क्या प्रभाव पड़ेगा?

मुख्य बिंदुओं का सारांश तालिका

सिद्धांत मूल भावना आधुनिक उदाहरण संभावित खतरा
कार्य की गुरुता लक्ष्य इतना बड़ा हो कि साधन गौण हों। जलवायु समझौते के लिए सभी देशों को साथ लाना। छोटे स्वार्थों को बड़ा लक्ष्य बताकर सही ठहराना।
दोषों का आच्छादन आवश्यक व्यक्ति की कमजोरियों को सार्वजनिक न करना। एक मुश्किल लेकिन प्रतिभाशाली कर्मचारी की कमियों को टीम के सामने न उछालना। भ्रष्टाचार या गलत काम को ढकना।
गुणों का आरोपण कार्य हेतु आवश्यक व्यक्ति की झूठी प्रशंसा करना। एक अड़ियल क्लाइंट को उसके 'विजन' की तारीफ करके प्रोजेक्ट हासिल करना। चापलूसी की संस्कृति को बढ़ावा देना।
काल का ज्ञान समय की नजाकत को पहचानना। संकट के समय पुराने विरोधियों से हाथ मिलाना। अवसरवादिता; हर समय समझौता करना।

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निष्कर्ष

कामन्दकीय नीतिसार का यह श्लोक हमें एक कठोर यथार्थवाद का पाठ पढ़ाता है। यह स्वीकार करता है कि शुद्ध आदर्शों से भरी दुनिया एक सुंदर कल्पना है, लेकिन वास्तविकता अक्सर गंदगी और समझौतों से भरी होती है। एक सफल नेता, प्रबंधक या यहाँ तक कि एक सामान्य व्यक्ति भी, जब बहुत बड़े लक्ष्य के सामने होता है, तो उसे व्यक्तिगत पसंद-नापसंद और अहंकार को पीछे छोड़ने का साहस दिखाना चाहिए। हालांकि, यह नीति एक तेज धार वाली तलवार की तरह है। इसका उपयोग केवल एक 'कालवित्' – समय, परिस्थिति और नैतिक अनुपात को समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि एक अवसरवादी द्वारा।

पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. क्या यह श्लोक झूठ बोलने और चापलूसी करने की सलाह देता है?
नहीं, यह श्लोक एक विशिष्ट, बहुत बड़े सार्वजनिक हित के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, अस्थायी रूप से सच्चाई को रणनीतिक ढंग से प्रस्तुत करने की बात करता है, न कि स्वार्थ के लिए नियमित झूठ या चापलूसी की।
2. क्या आधुनिक लोकतंत्र में यह नीति खतरनाक नहीं है?
यह तभी खतरनाक है जब इसका उपयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने के लिए किया जाए; लेकिन जब लोकतंत्र की रक्षा या राष्ट्रहित जैसे बड़े लक्ष्य के लिए इसका संयमित उपयोग किया जाए, तो यह एक रणनीतिक उपकरण बन सकती है।
3. क्या निजी जीवन में भी इस सिद्धांत को अपनाना चाहिए?
निजी रिश्ते विश्वास और सच्चाई पर टिके होते हैं, इसलिए यहाँ इस सिद्धांत का अनुसरण अक्सर रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकता है। हाँ, परिवार की भलाई जैसे बहुत बड़े लक्ष्य के लिए कभी-कभी छोटे समझौते किए जा सकते हैं।
4. क्या इससे भ्रष्ट लोगों को बढ़ावा नहीं मिलेगा?
इसका दुरुपयोग निश्चित रूप से भ्रष्ट लोगों को शक्तिशाली बना सकता है, इसीलिए इसका उपयोग सतर्कता, पारदर्शिता और दीर्घकालीन दृष्टि के साथ होना चाहिए।
5. चाणक्य नीति और कामन्दकीय नीति में क्या अंतर है?
चाणक्य नीति (अर्थशास्त्र) अधिक कठोर, प्रतिशोधात्मक और नीति-केंद्रित है, जबकि कामन्दकीय नीतिसार में नैतिकता और व्यावहारिकता के बीच के संतुलन पर अधिक जोर दिया गया है।

अंतिम विचार

कामन्दक का यह सूत्र हमें सपनों की दुनिया से निकालकर जमीन पर लाता है। यह याद दिलाता है कि परिवर्तन लाने के लिए कभी-कभी व्यवस्था के अंदर रहकर, उसके नियमों से ही खेलना पड़ता है। सिद्धांतों की बलि चढ़ाए बिना, लेकिन उन्हें लचीला बनाकर, ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है। अंत में, यह नीति उनके लिए है जो 'जीत' चाहते हैं, न कि सिर्फ 'सही' दिखना।

मण्डल शोधन: मित्र, शत्रु, उदासीन की पहचान कैसे करें?- अगला लेख पढ़ें।

कार्यवाही

अगली बार जब आपको कोई बड़ा लक्ष्य मिले और उसमें एक 'मुश्किल' व्यक्ति बाधा बने, तो एक पल रुककर कामन्दक के इस सूत्र के बारे में सोचें। क्या यह वह क्षण है जहाँ 'कार्यस्य गरीयस्त्वात्' लागू हो सकता है? इसका प्रयोग करके देखें, और परिणामों को स्वयं आंकें।
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