न्याय और राजनीति: गीता से आधुनिक चुनौतियाँ

प्राचीन न्याय और आधुनिक राजनीति का प्रतीकात्मक मिलन।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..." - जब-जब धर्म का नाश होता है
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परिचय: क्या न्याय और राजनीति आज अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं?

आज के दौर में जब हम "राजनीति" शब्द सुनते हैं, तो मन में क्या छवि उभरती है? क्या वह न्याय, नैतिकता और लोक कल्याण की छवि है, या फिर सत्ता की होड़, अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की? दुखद रूप से, अक्सर दूसरा जवाब ही मिलता है। ऐसा लगता है मानो न्याय और राजनीति, जो कभी एक ही सिक्के के दो पहलू हुआ करते थे, अब दो विपरीत ध्रुवों पर जा पहुँचे हैं। प्राचीन भारतीय चिंतन में राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य 'न्याय' करना था। 'धर्मराज' युधिष्ठिर इसी आदर्श का प्रतीक थे। लेकिन आज की राजनीति में न्याय अक्सर गौण हो जाता दिखता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गीता और हमारे दर्शन में इस विसंगति का कोई समाधान छिपा है? क्या राजनीति फिर से न्याय का माध्यम बन सकती है? यह ब्लॉग इसी सवाल की तह में जाएगा। हम गीता के न्याय-दर्शन को समझेंगे, आधुनिक राजनीति की चुनौतियों का विश्लेषण करेंगे और खोजेंगे उस रास्ते को जो हमें एक न्यायपूर्ण समाज की ओर ले जा सके। क्योंकि बिना न्याय के राजनीति, और बिना नैतिकता के न्याय, दोनों ही समाज के लिए अभिशाप हैं।

न्याय का वास्तविक अर्थ क्या है, और राजनीति उसे क्यों भूल गई लगती है?

न्याय की अवधारणा सदियों से दर्शन और राजनीति का केंद्र रही है। भारतीय संदर्भ में न्याय केवल कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि 'धर्म' के अनुसार सही आचरण और विभाजन है। राजनीति, जिसका मूल उद्देश्य इसी न्याय को स्थापित करना था, आज उससे दूर क्यों हो गई? इसके पीछे दो मूलभूत कारण हैं:

धर्म, नीति और न्याय का त्रिकोण

प्राचीन भारत में शासन 'धर्म' (नैतिक नियम) पर आधारित था।
  • 'राजनीति' या 'नीति' धर्म को लागू करने की कला थी, और 'न्याय' उसका परिणाम।
  • कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी धर्म और लोक कल्याण को ही राज्य का चरम लक्ष्य मानता है।
  • समस्या तब शुरू हुई जब राजनीति धर्म (नैतिकता) से अलग होकर केवल 'सत्ता प्राप्ति की कला' बन गई।
  • जब नीति का आधार नैतिकता न रहा, तो न्याय की संभावना भी कम हो गई।

राजनीति: लोक कल्याण का साधन या सत्ता का खेल?

आधुनिक लोकतंत्र में राजनीति का सैद्धांतिक उद्देश्य जनता का कल्याण करना है।
  • व्यवहार में, यह अक्सर सत्ता हासिल करने और बनाए रखने का एक खेल बनकर रह गया है।
  • चुनावी गणित, जनसमर्थन जुटाना और विरोधियों पर पलटवार करना ही मुख्य एजेंडा बन जाता है।
  • इस दौड़ में, दीर्घकालिक न्याय और नैतिकता जैसे मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।
  • नेता अक्सर तात्कालिक लाभ के लिए सिद्धांतों से समझौता करते दिखते हैं, जिससे जनता का विश्वास टूटता है।

क्या गीता का न्याय-दर्शन आज की जटिल राजनीतिक दुनिया में प्रासंगिक है?

भगवद गीता, जो मूलतः एक योद्धा अर्जुन के आत्मसंघर्ष और नैतिक दुविधा का समाधान है, राजनीति और नेतृत्व के लिए गहन सिद्धांत प्रस्तुत करती है। युद्ध के मैदान में दिए गए ये उपदेश आज के राजनीतिक युद्धक्षेत्र में भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

स्वधर्म और राजधर्म: अपनी भूमिका का निर्वहन

गीता का केंद्रीय सिद्धांत 'स्वधर्म' यानी अपने कर्तव्य का पालन है। राजनेता का 'स्वधर्म' या 'राजधर्म' क्या है?
  • स्वधर्म की महिमा: भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" - अपने धर्म का पालन करते हुए मर जाना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भयावह है।
  • राजनेता का असली धर्म: एक राजनेता का धर्म सत्ता पाना नहीं, बल्कि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन करना है।
  • कर्तव्य से भटकाव: जब कोई नेता इस 'राजधर्म' को भूलकर केवल सत्ता को अपना धर्म मान लेता है, तो न्याय और नैतिकता का ह्रास होना तय है।

निष्काम कर्म योग: सत्ता के प्रति निर्लिप्त भाव

राजनीति में सबसे बड़ा भटकाव 'फल की इच्छा' यानी सत्ता पाने की लालसा से होता है। गीता इसका समाधान 'निष्काम कर्म योग' में देती है।
  • मूल सिद्धांत: यह सिद्धांत सिखाता है कि हमें कर्म करना चाहिए, लेकिन उसके परिणाम (सत्ता, पद, प्रशंसा) से आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
  • आदर्श राजनेता का गुण: एक आदर्श राजनेता को सत्ता पाने की लालसा से मुक्त होकर, केवल अपने कर्तव्य के निर्वहन पर ध्यान देना चाहिए।
  • भ्रष्टाचार की रोकथाम: यही वह भाव है जो भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और नैतिक पतन को रोक सकता है।
  • साधन बनाम साध्य: जो नेता सत्ता को एक साधन (जनसेवा का) मानते हैं, न कि साध्य (लक्ष्य), वे ही सच्चे न्याय को स्थापित कर पाते हैं।

स्थितप्रज्ञ नेता का आदर्श

गीता 'स्थितप्रज्ञ' की अवधारणा पेश करती है - वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो सफलता-विफलता, लाभ-हानि, यश-अपयश से विचलित नहीं होता।
  • आज की राजनीति की चुनौती: आज की राजनीति में, जहाँ टीवी डिबेट, सोशल मीडिया ट्रेंड और जनमत सर्वेक्षणों का दबाव सतत बना रहता है, 'स्थितप्रज्ञ' नेता का गुण अत्यंत आवश्यक है।
  • दीर्घकालिक न्याय का मार्ग: ऐसा नेता लोकलुभावन और अल्पकालिक फैसलों के बजाय दीर्घकालिक न्याय और राष्ट्रहित के लिए कार्य कर सकता है।
  • दबाव में धैर्य: वह मीडिया या विरोधियों के हमलों से विचलित हुए बिना, धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्यपथ पर चलता रह सकता है।
  • नेतृत्व का चरम आदर्श: यही गीता द्वारा प्रस्तावित नेतृत्व का चरम आदर्श है।

आधुनिक राजनीति नैतिकता से दूर क्यों होती जा रही है?

एक ओर जहाँ गीता नैतिकता और कर्तव्य पर बल देती है, वहीं आज की राजनीति अक्सर नैतिक समझौतों और विवादों में उलझी नजर आती है। इसके पीछे कुछ गहरे सामाजिक और संरचनात्मक कारण हैं।

सत्ता के लोभ में नैतिक समझौते

लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने के लिए चुनाव जीतना जरूरी है, और चुनाव जीतने के लिए अक्सर बड़े पैमाने पर संसाधन, जनसमर्थन और गठबंधन चाहिए होते हैं।
  • इस दबाव में, राजनीतिक दल और नेता अक्सर नैतिक मानदंडों से समझौता करते हैं।
  • वे विवादास्पद व्यक्तियों को टिकट दे सकते हैं, भ्रष्ट तत्वों से गठजोड़ कर सकते हैं।
  • कई बार अफवाहों और भावनाओं को भड़काकर वोट बैंक बनाने की कोशिश की जाती है।
  • उद्देश्य (सत्ता प्राप्ति) को साध्य मान लेने से, साधन (नैतिकता) गौण हो जाते हैं।
  • यह एक दुष्चक्र बन जाता है, जहाँ अनैतिकता सफलता की कुंजी लगने लगती है।

समाज में विश्वास की कमी और उसका प्रभाव

जब जनता की नजरों में राजनीति और नेता लगातार नैतिक पतन का शिकार होते दिखते हैं, तो समाज से विश्वास उठने लगता है।
  • लोग यह मानने लगते हैं कि "सब एक जैसे हैं" या "बदलाव असंभव है"।
  • इस विश्वास के अभाव में अच्छे और नैतिक लोग राजनीति में आने से कतराते हैं।
  • मतदाता भी कम उत्साहित होते हैं या फिर वोट को एक सौदेबाजी की तरह देखने लगते हैं।
  • इस तरह, नैतिकता के अभाव का दुष्प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक तंत्र पर पड़ता है।

सामाजिक न्याय की अवधारणा क्या वास्तव में समाज को न्याय दिला पाई है?

भारतीय राजनीति में 'सामाजिक न्याय' पिछले कई दशकों से एक प्रमुख विमर्श रहा है। ऐतिहासिक असमानताओं और भेदभाव को दूर करने के लिए इसे एक जरूरी कदम माना गया।

सामाजिक न्याय: उद्देश्य और विकृतियाँ

सामाजिक न्याय का सैद्धांतिक उद्देश्य महान और न्यायसंगत है।
  • इसका लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार विकास के अवसर मिलें।
  • आरक्षण, शिक्षा में सहायता, और आर्थिक योजनाएँ इसके साधन रहे हैं।
  • समस्या तब शुरू हुई जब सामाजिक न्याय की राजनीति केवल 'आरक्षण' और 'पहचान' तक सिमट गई।
  • यह अक्सर एक ऐसा वोट बैंक बनाने का तरीका बन गया, जिसमें समुदायों को लाभ देकर उनका राजनीतिक समर्थन हासिल किया जाता है।
  • इससे एक नई तरह की असमानता और विभाजन पैदा हुआ है, जहाँ 'योग्यता' बनाम 'आरक्षण' का विवाद सामाजिक एकता को कमजोर करता है।

सामाजिक न्याय की राजनीति और न्यायिक हस्तक्षेप

पिछले कुछ वर्षों में, सामाजिक न्याय की माँगों को लेकर कई बड़ी राजनीतिक और न्यायिक घटनाएँ देखने को मिली हैं।
  • कुछ राज्यों में आरक्षण की सीमा को 50% से ऊपर बढ़ाने के प्रयास हुए हैं।
  • विभिन्न जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल करने की माँगें उठती रही हैं।
  • इन मुद्दों पर अक्सर सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
  • न्यायालय के फैसले अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि आरक्षण एक 'असाधारण उपाय' है।
  • इसका उद्देश्य सशक्तिकरण होना चाहिए, न कि स्थायी रूप से लाभ पहुँचाना।

भारतीय दर्शन में 'धर्मराज्य' की कल्पना आज कैसे साकार हो सकती है?

प्राचीन भारतीय ग्रंथ 'रामायण' और 'महाभारत' में एक आदर्श राज्य की कल्पना 'धर्मराज्य' के रूप में की गई है - वह राज्य जहाँ धर्म (न्याय और नैतिकता) का शासन हो।

राजा का कर्तव्य: प्रजा का पालन-पोषण और रक्षण

प्राचीन ग्रंथों में राजा के मुख्य कर्तव्यों को 'प्रजा का पालन-पोषण (रक्षण)' और 'धर्म की स्थापना' बताया गया है।
  • इसमें न केवल शारीरिक सुरक्षा (कानून-व्यवस्था) शामिल थी।
  • इसमें आर्थिक समृद्धि (अर्थ), सामाजिक सद्भाव (धर्म) और आध्यात्मिक वातावरण भी शामिल था।
  • राजा स्वयं को प्रजा का सेवक मानता था।
  • आज के संदर्भ में, यह सिद्धांत सरकार और शासन तंत्र के हर स्तर पर लागू होता है।
  • एक आदर्श सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिकों की सुरक्षा करे, उनके लिए रोजगार और शिक्षा के अवसर पैदा करे।

आधुनिक लोकतंत्र में 'राजा' कौन है?

धर्मराज्य की अवधारणा को आज लागू करने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि आधुनिक लोकतंत्र में 'राजा' (शासक) कौन है?
  • यहाँ 'राजा' कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी की पूरी जनता है।
  • संविधान सर्वोच्च है, और चुने हुए प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं।
  • इसलिए, 'धर्मराज्य' का आज अर्थ हुआ 'संवैधानिक राज्य' या 'कानून का शासन' (Rule of Law)।
  •  इसका मतलब यह है कि शासन संविधान के नियमों और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार चले।
  • जब संविधान, जो देश का सर्वोच्च धर्मग्रंथ है, सर्वोपरि होगा, तभी एक आधुनिक धर्मराज्य की स्थापना संभव है।

क्या शिक्षा ही राजनीति को न्याय के पथ पर लौटा सकती है?

राजनीति में नैतिकता और न्याय की बहाली के लिए केवल नेताओं में परिवर्तन पर्याप्त नहीं है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक जागरूक, शिक्षित और सक्रिय नागरिक समाज की आवश्यकता होती है।

नागरिक शिक्षा और राजनीतिक चेतना

अधिकांश शिक्षा प्रणालियाँ छात्रों को डॉक्टर, इंजीनियर या व्यवसायी बनने के लिए तैयार करती हैं, लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए नहीं।
  • नागरिक शिक्षा (Civics) अक्सर एक औपचारिक और नीरस विषय बनकर रह जाती है।
  • इसमें संविधान के अनुच्छेदों को रटा दिया जाता है, लेकिन उनके व्यवहारिक अर्थ को नहीं समझाया जाता।
  • एक आदर्श शिक्षा में यह शामिल होना चाहिए कि लोकतंत्र कैसे काम करता है।
  • अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य क्या हैं, यह भी सिखाया जाना चाहिए।
  • सरकारी योजनाओं और बजट को कैसे समझा जाए, और सामाजिक मुद्दों पर तार्किक चर्चा कैसे की जाए, यह जानना जरूरी है।

जिम्मेदार मतदाता बनाने में शिक्षा की भूमिका

राजनीति पर जनता का सबसे बड़ा प्रभाव मतदान के माध्यम से पड़ता है।
  • जब मतदाता जाति, धर्म, नकद या सुविधाओं के लालच में वोट डालते हैं, तो न्यायपूर्ण राजनीति की उम्मीद करना बेमानी है।
  • शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह लोगों को एक जिम्मेदार मतदाता बनाए।
  • इसका मतलब है उनमें यह क्षमता विकसित करना कि वे नेताओं के चरित्र, उनके वादों की विश्वसनीयता, दल के इतिहास और राष्ट्रहित के मुद्दों के आधार पर निर्णय ले सकें।
  • एक शिक्षित और जागरूक मतदाता ही अनैतिक और अयोग्य उम्मीदवारों को हरा सकता है।
  • वह अच्छे लोगों को राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।

मुख्य बिंदुओं का सारांश

इस गहन चर्चा को संक्षेप में समझने के लिए नीचे दी गई तालिका देखें:
संकल्पना मुख्य विचार (गीता/दर्शन) आधुनिक राजनीति में चुनौती संभावित समाधान का रास्ता
न्याय का आधार धर्म (नैतिकता) पर आधारित न्याय। राजधर्म प्रजा की सेवा है। न्याय अक्सर सत्ता, लोभ और चुनावी फायदे से प्रभावित होता है। राजनीति को फिर से नैतिक आधार देना। नेताओं में ‘राजधर्म’ की भावना जगाना।
नेतृत्व का आदर्श स्थितप्रज्ञ नेता: निष्काम कर्मयोगी, स्वधर्म पालक। नेता अक्सर यश, सत्ता और फल की चिंता में लिप्त, भीड़ के दबाव में फैसले लेते हैं। निष्काम भाव से कर्तव्यपालन पर जोर। नेताओं के चरित्र एवं कर्म को महत्व देना।
सामाजिक न्याय सभी वर्णों/वर्गों के कर्तव्य और अधिकारों का संतुलन (गीता, 18वां अध्याय)। आरक्षण और पहचान की राजनीति में सिमटना, नई विषमताएँ पैदा करना। योग्यता आधारित सशक्तिकरण। सामाजिक न्याय को केवल राजनीतिक हथियार न बनने देना।
शासन का लक्ष्य धर्मराज्य: जहाँ धर्म (न्याय) का शासन हो, राजा प्रजा का पालन करे। शासन में भ्रष्टाचार, अकुशलता, जनकल्याण के बजाय स्वार्थ प्रमुख होना। कानून का शासन (Rule of Law) मजबूत करना। पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना।
नागरिक की भूमिका प्रजा को धर्मानुसार जीवन जीने का अधिकार और कर्तव्य। मतदाता का जागरूक न होना, जाति/धर्म/लालच के आधार पर वोट देना। नागरिक शिक्षा को मजबूत करना। जिम्मेदार मतदाता तैयार करना।

निष्कर्ष: न्यायपूर्ण राजनीति की ओर एक कदम

न्याय और राजनीति का रिश्ता टूटा नहीं है, बस धुंधला गया है। गीता और भारतीय दर्शन से हमें यह आश्वासन मिलता है कि न्यायपूर्ण राजनीति कोई असंभव सपना नहीं है, बल्कि एक सचेतन प्रयास से प्राप्त किया जा सकने वाला लक्ष्य है। इसके लिए दोनों स्तरों पर कार्य करने की जरूरत है: ऊपर से और नीचे से। ऊपर से, राजनीतिक नेतृत्व को 'राजधर्म' की भावना को अपनाना होगा - निष्काम भाव से जनसेवा करना, न्याय को सर्वोपरि रखना और 'स्थितप्रज्ञ' बनने का प्रयास करना। नीचे से, हम नागरिकों को अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें केवल शिकायत करने वाले दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बनना होगा। इसका मतलब है शिक्षित होना, मुद्दों को समझना, और अपने मतदान का उपयोग जिम्मेदारी से करना।
जब नेता अपना कर्तव्य निभाएंगे और जनता अपना, तभी 'धर्मराज्य' की आधुनिक व्याख्या - एक ऐसा लोकतंत्र जहाँ कानून का शासन हो, न्याय सुलभ हो और हर नागरिक का कल्याण सर्वोपरि हो - साकार हो पाएगी। गीता का संदेश स्पष्ट है: धर्म की स्थापना के लिए हमें स्वयं आगे आना होगा। राजनीति को न्याय के पथ पर लौटाने की जिम्मेदारी भी अंततः हम सबकी ही है।

सवाल-जवाब

1. क्या गीता की शिक्षाएँ, जो एक राजशासन (Monarchy) के समय की हैं, आज के लोकतंत्र में लागू हो सकती हैं?
हाँ, क्योंकि गीता के सिद्धांत शासन की संरचना के बजाय नेतृत्व के चरित्र, नैतिकता और कर्तव्यबोध पर केंद्रित हैं, जो किसी भी शासन प्रणाली के लिए आवश्यक हैं।
2. क्या 'निष्काम कर्म' का सिद्धांत महत्वाकांक्षी राजनेताओं के लिए व्यावहारिक है?
हाँ, क्योंकि इसका अर्थ महत्वाकांक्षा छोड़ना नहीं, बल्कि सत्ता पाने की लालसा से मुक्त होकर कर्म (जनसेवा) पर ध्यान केंद्रित करना है, जो दीर्घकालिक सफलता और सम्मान दिलाता है।
3. सामाजिक न्याय की राजनीति के नकारात्मक पक्ष से कैसे निपटा जाए?
सामाजिक न्याय को केवल आरक्षण तक सीमित न रखकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर जोर देकर, ताकि यह स्थायी समावेशन का मार्ग बने।
4. एक आम नागरिक राजनीति में न्याय कैसे बहाल कर सकता है?
एक जागरूक नागरिक के रूप में, मुद्दों पर शोध करके, योग्य और नैतिक उम्मीदवार को वोट देकर, और स्थानीय स्तर पर सक्रिय भागीदारी दिखाकर।
5. क्या धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और 'धर्मराज्य' की अवधारणा में विरोधाभास है?
नहीं, यदि 'धर्म' को किसी विशेष पंथ के बजाय सार्वभौमिक नैतिकता और न्याय के अर्थ में लिया जाए, तो एक आधुनिक 'धर्मराज्य' ही वास्तव में एक न्यायपूर्ण धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है।

अंतिम विचार

राजनीति महलों का खेल नहीं, आम जन के जीवन को प्रभावित करने वाला सबसे शक्तिशाली माध्यम है। इसे न्याय से जोड़े बिना एक शांतिपूर्ण और समृद्ध समाज की कल्पना अधूरी है। गीता का ज्ञान हमें यही याद दिलाता है कि हर युग में, हर परिस्थिति में, न्याय और धर्म के लिए खड़े होने का साहस ही सच्ची राजनीति है।

क्या आप तैयार हैं?

यह बदलाव किसी एक की प्रतीक्षा में नहीं आएगा। यह हम सबके छोटे-छोटे संकल्पों से शुरू होगा। आज ही यह संकल्प लें कि आप एक जागरूक नागरिक बनेंगे। अपने अधिकार जानेंगे, अपने कर्तव्य निभाएँगे, और अपने वोट का उपयोग सोच-समझकर करेंगे। क्योंकि एक न्यायपूर्ण राजनीति की नींव, आपके और मेरे हाथों में है। आइए, इसे मजबूत बनाएँ।
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