क्या सिंहासन की इच्छा पिता और पुत्र के बीच के रिश्ते को भी बदल सकती है? कामन्दकीय नीतिसार में एक श्लोक है, जो इस सवाल का सीधा, लेकिन असहज उत्तर देता है। कामन्दक बताते हैं कि राज्य का प्रश्न उठने पर निकटतम पारिवारिक संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं।
विकारं याति पुत्रोऽपि राज्यालीढस्तथा पिता ।
तल्लोकवृत्तान्नृपतेरन्यद् वृत्तं प्रचक्षते ॥
सीधे शब्दों में समझें तो राज्य की आकांक्षा से पुत्र भी अपने स्वाभाविक व्यवहार से हट सकता है और पिता भी। इसी कारण राजा के व्यवहार को सामान्य लोकव्यवहार से अलग बताया गया है। श्लोक की बात केवल पिता-पुत्र के संबंध तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सत्ता, उत्तराधिकार और निजी संबंधों के बीच पैदा होने वाले उस तनाव की ओर संकेत है, जिसमें अपना व्यक्ति भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन सकता है।
|
| जब सत्ता पिता और पुत्र के संबंध को बदल दे |
राज्यालीढः जब सत्ता रिश्तों पर भारी पड़ जाए
इस श्लोक में ‘राज्यालीढः’ शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। इस शब्द में राज्य के प्रति वह आसक्ति दिखाई देती है, जो व्यक्ति को सत्ता प्राप्त करने के लिए बेचैन कर सकती है। लेकिन कामन्दक जिस बात की ओर इशारा करते हैं, वह केवल महत्वाकांक्षा नहीं है। वे उस स्थिति की ओर संकेत करते हैं, जहाँ व्यक्ति अपने निकटतम संबंधों को भी सत्ता की दृष्टि से देखने लगता है।
सामान्य जीवन में पिता-पुत्र का रिश्ता विश्वास, स्नेह और आत्मीयता से चलता है। लेकिन जब इस रिश्ते के बीच सिंहासन का प्रश्न आ जाता है, तो दोनों एक-दूसरे को नए ढंग से देखने लगते हैं। पुत्र पिता को पिता से अधिक एक ‘स्वामी’ के रूप में देख सकता है, और पिता पुत्र को पुत्र से अधिक एक ‘दावेदार’ के रूप में। यहाँ ‘विकारं याति’ का अर्थ केवल मानसिक परिवर्तन नहीं है, यह उस स्थिति की ओर संकेत करता है, जब रिश्तों की जगह संदेह, आकलन और प्रतिस्पर्धा लेने लगते हैं।
पिता-पुत्र का उदाहरण क्यों?
उन्होंने पिता और पुत्र का उदाहरण सामने रखा है। इससे श्लोक की बात और तीखी हो जाती है। पिता-पुत्र का रिश्ता सामान्यतः विश्वास और आत्मीयता का रिश्ता माना जाता है। लेकिन राजनीति का यथार्थ यह है कि जब राज्य का प्रश्न आ जाता है, तो यही आधार डगमगा जाता है।
यदि पुत्र को राज्य चाहिए और पिता उसे छोड़ना नहीं चाहता, तो उनके हित सीधे टकरा जाते हैं। जहाँ सिंहासन दाँव पर हो, वहाँ रक्त का रिश्ता भी हमेशा पर्याप्त सुरक्षा-कवच नहीं होता। पिता पुत्र को अपनी सत्ता के लिए खतरा समझने लगता है, और पुत्र पिता को उस राह का काँटा। कामन्दक यहाँ केवल ‘सत्ता भ्रष्ट करती है’ की बात नहीं कर रहे, वे एक ठोस राजनीतिक विडंबना दिखा रहे हैं,सत्ता की इच्छा मनुष्य को उसके अपनों के विरुद्ध भी खड़ा कर सकती है।
राजा का व्यवहार सामान्य लोकव्यवहार से अलग क्यों है?
श्लोक के दूसरे हिस्से में कहा गया है,
तल्लोकवृत्तान्नृपतेरन्यद् वृत्तं प्रचक्षते ॥
‘लोकवृत्त’ का अर्थ है सामान्य जन-जीवन की चाल-ढाल। सामान्य व्यक्ति का व्यवहार प्रेम, कर्तव्य और रीति-रिवाज से चलता है, लेकिन राजा के सामने राज्य, सत्ता-संतुलन और उत्तराधिकार जैसी बाध्यताएँ भी होती हैं।इसी कारण राजा के व्यवहार को सामान्य लोकव्यवहार से अलग करके देखने की बात कही गई है।
इसका आशय यह नहीं कि राजा नैतिक नियमों से मुक्त है। उसके सामने निजी संबंधों के साथ राज्यहित का प्रश्न भी रहता है। इसलिए उसके निर्णयों को केवल पारिवारिक संबंधों की कसौटी पर समझना पर्याप्त नहीं होता। जब सत्ता दाँव पर हो, तो विश्वास का अर्थ भी बदल सकता है।
कामन्दकीय नीति में यह बात और स्पष्ट हो जाती है जब हम इसे संधि और विश्वास के प्रसंग में रखते हैं। राजनीति में कोई समझौता हमेशा स्थायी रहे, यह आवश्यक नहीं; राज्यहित बदलने पर संबंध और निष्ठाएँ भी बदल सकती हैं।
इस श्लोक को आज के समय में कैसे पढ़ा जा सकता है?
बेशक, आज राजतंत्र नहीं रहा और सत्ता का उत्तराधिकार पिता-पुत्र परंपरा से तय नहीं होता। आधुनिक लोकतंत्र में संविधान, कानून और संस्थाएँ हैं, जो सत्ता-संघर्ष को नियमों में बाँध देती हैं। इसलिए इस श्लोक को आधुनिक राजनीति पर हूबहू लागू करना उचित नहीं होगा।
फिर भी सत्ता और संबंधों के बीच का तनाव कहीं-न-कहीं अभी भी बना हुआ है। जहाँ भी पद, अधिकार या प्रभाव के लिए होड़ होती है, वहाँ पारिवारिक या निजी संबंधों पर उस होड़ का असर पड़ता ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह संघर्ष परिवार के भीतर की बजाय दलों, संगठनों या सत्ता-केंद्रों के बीच अधिक दिखाई देता है।
इस श्लोक को किसी विशेष व्यक्ति या दल पर टिप्पणी के रूप में न देखकर, सत्ता के स्वभाव को समझने की एक कसौटी के रूप में पढ़ा जा सकता है।
कामन्दक की राजनीतिक दृष्टि
कामन्दकीय नीतिसार भारतीय राज्यशास्त्र का एक यथार्थवादी दस्तावेज़ है। यहाँ राजनीति को केवल आदर्शों से नहीं देखा गया, बल्कि महत्वाकांक्षा, भय, स्वार्थ और बदलते हितों को भी उतना ही स्थान दिया गया है। इस श्लोक में कामन्दक नैतिक पतन का रोना नहीं रो रहे,वे एक राजनीतिक परिघटना की ओर ध्यान दिला रहे हैं, जहाँ सिंहासन की चाहत अपनेपन की सीमाओं को मिटा देती है।
कामन्दक की राजनीति में निजी संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति किस हित से बँधा हुआ है। सिंहासन का प्रश्न आते ही पिता-पुत्र का संबंध भी इसी कसौटी पर परखा जाने लगता है। सत्ता अपने साथ एक अलग तर्क लाती है। जहाँ सिंहासन दाँव पर हो, वहाँ रक्त का रिश्ता भी हमेशा पर्याप्त सुरक्षा-कवच नहीं होता।
कामन्दक की बात की असुविधा यहीं है। सिंहासन केवल राज्य पाने का प्रश्न नहीं बनता; उसके साथ यह भी बदल सकता है कि व्यक्ति सामने वाले को किस रूप में देखता है। पिता के लिए पुत्र केवल पुत्र नहीं रह जाता, वह उत्तराधिकारी बन जाता है; और पुत्र की दृष्टि में पिता केवल पिता नहीं, राज्य का स्वामी हो सकता है।