क्या किसी पुराने दुश्मन पर भरोसा करना ठीक है?
ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ दिल एक तरफ़ खींचता है और दिमाग दूसरी तरफ़। दोनों के बीच एक रस्साकशी शुरू हो जाती है और आप बस खड़े रह जाते हैं, बेबस, अधूरे, किसी फ़ैसले से इंच भर दूर। कुछ बरस पहले मैं ठीक इसी जगह खड़ा था। एक पुराना विश्वासघात था, और सामने एक सवाल माफ़ करूँ या नहीं।
बात यूँ हुई कि एक सहयोगी था मेरा। उस पर मैंने वह भरोसा किया था जो आदमी अपनी आँखों पर करता है पूरा, बिना शर्त मगर जब वक्त ने करवट ली, जब ज़मीन पैरों के नीचे से खिसकने लगी, तो उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। बस। एक दिन था, और अगले दिन वह नहीं था। न कोई फ़ोन आया, न कोई पैग़ाम। महीने गुज़रते गए ख़ामोशी की एक मोटी दीवार बीच में खड़ी हो गई।
फिर एक सुबह अचानक उसका फ़ोन बजा। माफ़ी माँगी। बोला "चलो, फिर से साथ चलते हैं।" मैं सुनकर रुक गया। जैसे कोई चलती ट्रेन में अचानक ब्रेक लगा दे। एक तरफ़ मन कह रहा था मौका दे दो, इंसान बदलते हैं, ज़िंदगी छोटी है। दूसरी तरफ़ कोई भीतरी आवाज़ बार-बार फुसफुसा रही थी सँभलकर। याद रख, यह वही आदमी है।
इसी कशमकश में जब न हाँ कह पा रहा था, न ना मेरी नज़र आचार्य कामन्दक के नीतिसार के एक श्लोक पर पड़ गई। उसमें ठीक मेरी उलझन का जवाब था, जैसे किसी ने सदियों पहले मेरे लिए ही लिख रखा हो 'समझौता करो, लेकिन भरोसा मत करो। कम से कम पूरी तरह तो नहीं।'
पहली बार पढ़ा तो भीतर कुछ सिकुड़ गया बड़ी कड़ी बात है। मगर जितना उस पर ठहरा, जितना चबाया, उतना रस निकलता गया। धीरे-धीरे समझ आया कि यह कोई कठोरता नहीं, यह समझदारी है। रिश्तों में क्षमा भी चाहिए और विवेक भी दोनों का तालमेल बिठाना ही असली कला है। और यह कला सीखने में पूरी उम्र लग जाती है।
आज मैं आपको उसी श्लोक से मिलवाता हूँ। हज़ारों साल पुरानी बात है, मगर इसकी स्याही अभी तक सूखी नहीं। आज के रिश्तों की पेचीदगियों को समझने में इससे बेहतर मार्गदर्शक शायद ही कोई मिले।
कामन्दकीय नीतिसार का वह श्लोक जो भीतर तक हिला देता है
आचार्य कामन्दक ने अपने ग्रंथ में एक बात कही है। सीधी। साफ़। बिना किसी लपेटेबाज़ी के जैसे कोई तीर छोड़ा हो, सीधा सीने में:
न जातु गच्छेद् विश्वासं संधितोऽपि हि बुद्धिमान् ।
अद्रोहे समयं कृत्वा वृत्रम् इन्द्रः पुरावधीत् ॥
जब पहली बार पढ़ा तो भीतर एक हलचल-सी हुई जैसे किसी ने अँधेरे कमरे में अचानक बत्ती जला दी हो। अरे, यह तो बड़ी सख्त बात कह दी! संधि हो गई, हाथ मिल गए, फिर भी भरोसा नहीं करना?
मगर फिर ठहरकर सोचा। जैसे किसी किताब का पन्ना दोबारा पढ़ो और पहली बार में छूटा हुआ मतलब अचानक खुल जाए। कामन्दक अविश्वास नहीं सिखा रहे। वे विवेक सिखा रहे हैं। कह रहे हैं समझौता हो भी जाए, तो भी समझदार आदमी पूरी तरह निश्चिंत होकर नहीं बैठ जाता। वह एक आँख खुली रखता है हमेशा।
इस श्लोक के पीछे एक पूरी कहानी है। इंद्र और वृत्रासुर की। और उस कहानी की जड़ों में वही सार छिपा है जो आज के दफ़्तरों की गलियारों में, कारोबारी बैठकों की चमकदार मेज़ों पर, और यहाँ तक कि अपने निजी रिश्तों की ख़ामोश रातों में भी काम आता है।
श्लोक का अर्थ जितना सरल, उतना गहरा
इस श्लोक का मतलब कुछ यूँ है -
बुद्धिमान आदमी को चाहिए कि वह अपने दुश्मन पर कभी पूरा भरोसा न करे, चाहे उसके साथ संधि ही क्यों न हो गई हो। क्योंकि पुराने ज़माने में इंद्र ने वृत्रासुर के साथ यह तय किया था कि एक-दूसरे का अहित नहीं करेंगे फिर भी उसका वध कर डाला।
एक बात गौर करने वाली है और यह बात मुझे कई बार पढ़ने के बाद समझ आई कामन्दक यहाँ छल करने की सलाह नहीं दे रहे। वे बस एक यथार्थ सामने रख रहे हैं, जैसे कोई आईना रख दे और कहे देखो, यह तुम हो, यह दुनिया है। कह रहे हैं कि जब हित बदलते हैं तो व्यवहार बदलता है। यह कोई दार्शनिक सिद्धांत नहीं यह ज़िंदगी का रोज़मर्रा का सच है। जो आज आपका साथी है, कल हालात पलटें तो विरोधी बन सकता है। और जो आज विरोधी है, वह कल साथी भी बन सकता है।
पर सवाल यह है क्या उसी पल आप उसे अपने दिल के सबसे क़रीब बिठा लेंगे? क्या उसे वह चाबी दे देंगे जो आपके सबसे बंद दरवाज़े खोलती है? शायद नहीं। इसीलिए कामन्दक कहते हैं समझौता करो, मगर होश में रहो। होश यही वह शब्द है जिसके इर्द-गिर्द पूरी नीति घूमती है।
इंद्र और वृत्रासुर की कहानी क्यों ज़रूरी है?
यह कहानी मैंने बचपन में कई बार सुनी थी दादी की ज़बान से, किताबों के पन्नों से, मंदिर की दीवारों पर बनी तस्वीरों से। मगर कामन्दक की नज़र से इसे पढ़ना बिलकुल अलग अनुभव था जैसे कोई जानी-पहचानी गली में पहली बार कोई नया दरवाज़ा दिखे।
वृत्रासुर इंद्र का सबसे ताकतवर दुश्मन था। उसकी ताकत ऐसी कि सीधे टकराव में जीत का भरोसा नहीं था। तो इंद्र ने परिस्थिति का मिज़ाज पढ़ा और उसके साथ संधि कर ली। तय हुआ कोई किसी को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। शब्द दिए गए, वचन बँधे। मगर जब वक्त बदला, जब हवा का रुख़ पलटा, तो इंद्र ने वही वचन तोड़कर उसका अंत कर दिया।
अब यहाँ मैं एक बात साफ़ कर दूँ और यह बात मेरे लिए कहना ज़रूरी है मैं यह नहीं कह रहा कि आपको किसी को धोखा देना चाहिए। बिलकुल नहीं। धोखा देना कमज़ोरी है, नीचता है। मैं बस इतना कह रहा हूँ कि संधि का मतलब दोस्ती नहीं होती। कई बार दो विरोधी पक्ष सिर्फ़ इसलिए समझौता करते हैं क्योंकि उस वक्त उनके हित एक जगह मिल जाते हैं जैसे दो नदियाँ एक मैदान में मिलती हैं, मगर उनकी मंज़िलें अलग होती हैं। जैसे ही वे हित अलग हुए, रिश्ते का रंग भी बदल जाता है।
यह बात आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी दिखती है। देश समझौते करते हैं, गठबंधन बनाते हैं, एक-दूसरे के झंडे फहराते हैं, मगर हर देश अपने राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखता है। इसमें कोई बुराई नहीं यह ज़िंदगी की व्यावहारिकता है। यह वह सच है जिसे स्वीकार करने में तकलीफ़ होती है, मगर नकारने में नुकसान।
संकट टलना और ख़तरा टलना दोनों अलग बातें हैं
यह फ़र्क़ मैंने अपनी ज़िंदगी में कई बार नहीं समझा। और हर बार इसकी क़ीमत चुकाई। कोई झगड़ा हुआ, बातचीत हुई, माफ़ी माँगी गई और मैं मान बैठा कि बस, अब सब पहले जैसा है। जैसे कोई टूटा हुआ बर्तन फ़ेविकोल से जोड़कर कहे देखो, बिलकुल नया है। मगर दरार तो रहती है भले ही दिखे न दिखे।
सच यह है विवाद शांत हो जाना और रिश्ता पहले जैसा हो जाना, ये दो बिलकुल अलग चीज़ें हैं। एक सतह पर होता है, दूसरा गहराई में। एक शब्दों से होता है, दूसरा वक्त से।
कामन्दक इसी भ्रम को तोड़ते हैं। कहते हैं तूफ़ान थम सकता है, आसमान साफ़ हो सकता है, मगर ख़तरा पूरी तरह ख़त्म नहीं होता। वह कहीं बादलों के पीछे छिपा रहता है। जिसने एक बार आपको चोट पहुँचाई हो, उसके साथ दोबारा रिश्ता जोड़ते वक्त जल्दबाज़ी ठीक नहीं। वक्त दीजिए। ख़ुद को भी, उसे भी।
माफ़ कर सकते हैं उसे। साथ काम भी कर सकते हैं। मगर उस पर उतना भरोसा नहीं कर सकते जितना किसी ऐसे इंसान पर करते हैं जिसने कभी धोखा ही नहीं दिया। यह कोई द्वेष नहीं है, कोई कड़वाहट नहीं। यह अनुभव की सीख है वह सीख जो किताबों से नहीं, ज़ख़्मों से मिलती है।
संधि और भरोसा यह फ़र्क़ मैंने ज़िंदगी में सीखा
शायद इस पूरे लेख की सबसे अहम बात यही है। वह बात जिसे समझने में मुझे बरसों लगे।
संधि एक व्यवस्था है। भरोसा एक भावनात्मक रिश्ता। दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। संधि में शर्तें होती हैं, ज़िम्मेदारियाँ तय होती हैं, लक्ष्मण रेखाएँ खिंची जाती हैं सब कुछ काग़ज़ पर या ज़बान पर साफ़। भरोसा इन सबसे आगे की चीज़ है भरोसा यह मानना है कि सामने वाला जानबूझकर आपका बुरा नहीं चाहेगा। भरोसा वह जगह है जहाँ आप अपनी पीठ मोड़कर सो सकते हैं।
तो जब किसी पुराने विरोधी के साथ समझौता करें, तो तीन चीज़ें ज़रूर जाँच लें तीन ऐसी कसौटियाँ जो मैंने अपने नुकसान से सीखी हैं:
- पहली - उसका व्यवहार। वह बोलता क्या है, इससे ज़्यादा अहम है कि करता क्या है। बातें बनाना सस्ता है शब्दों की कोई क़ीमत नहीं जब तक कर्म उनकी गवाही न दें। कर्म दिखाना महँगा है, और इसीलिए असली।
- दूसरी - उसका हित। आपके साथ रहकर उसे क्या मिल रहा है? उसकी दोस्ती के पीछे कौन-सा गणित चल रहा है? कल अगर वह फ़ायदा ख़त्म हो जाए, तो क्या वह तब भी वैसा ही रहेगा? यह सवाल पूछना बेरहमी नहीं यह ईमानदारी है।
- तीसरी - उसका इतिहास। जिसने एक बार भरोसा तोड़ा हो, उसके साथ नई शुरुआत करते वक्त पुरानी बातें पूरी तरह भूल जाना अक्लमंदी नहीं। इतिहास भविष्य की गारंटी नहीं देता, मगर एक अंदाज़ा ज़रूर देता है।
ये तीनों बातें मैंने अपने एक क़रीबी दोस्त को बताई थीं जब वह उसी पुराने सहयोगी के साथ दोबारा हाथ मिलाने की सोच रहा था। उसने उस वक्त तो नहीं माना। मुस्कुराया, कंधे उचकाए, बोला "तू बहुत सोचता है।" मगर कुछ महीने बाद रात को उसका फ़ोन आया। आवाज़ में वह भारीपन था जो सिर्फ़ तब आता है जब आदमी टूटा हुआ होता है "यार, तू सही कह रहा था।"
इतिहास की वे कहानियाँ जो आज भी सिखाती हैं
नीतिशास्त्र इसलिए ज़िंदा है क्योंकि वह इंसान के स्वभाव को पकड़ने की कोशिश करता है उस स्वभाव को जो हज़ारों साल में बदला नहीं। तकनीक बदल गई। बैलगाड़ी की जगह हवाई जहाज़ आ गए। चिट्ठियों की जगह मैसेज आ गए। दुनिया का चेहरा पहचान में नहीं आता। मगर इंसान की महत्वाकांक्षा, उसका स्वार्थ, उसका डर, उसकी होड़, उसकी ईर्ष्या ये नहीं बदले। ये वही हैं जो कामन्दक के ज़माने में थे। इसीलिए हज़ारों बरस पहले उन्होंने जो कहा, वह आज भी उतना ही खरा है जैसे कल ही कहा गया हो।
इतिहास में ऐसे अनगिनत क़िस्से बिखरे पड़े हैं दुश्मनों ने संधि की, गले मिले, एक मेज़ पर बैठकर चाय पी, हँसे, ठहाके लगाए, और फिर पहला मौका मिलते ही एक-दूसरे को गिराया। ऐसा इसलिए नहीं कि वे सब बुरे इंसान थे। बल्कि इसलिए कि उनके हित बदल गए थे। और हित बदलना कोई गुनाह नहीं यह इंसानी फ़ितरत है, उतनी ही पुरानी जितनी साँस लेना। मगर इस फ़ितरत को न पहचानना यह बेवकूफ़ी ज़रूर है।
कामन्दक बस यही कहना चाहते हैं लोगों को उनकी बातों से मत तौलो, उनके फ़ैसलों से तौलो। शब्द हवा में उड़ जाते हैं, काम ज़मीन पर रह जाते हैं। और अगर कोई बार-बार अपने फ़ायदे के लिए अपनी बात बदलता रहा है, तो उसके एक नए वादे पर आँखें बंद करके यक़ीन मत कर लो। वादे सस्ते हैं उन्हें पूरा करना महँगा है।
आज की ज़िंदगी में यह नीति कहाँ काम आती है
मुझे पता है, कुछ लोग सोच रहे होंगे भाई, यह तो राजा-महाराजाओं की बात है, सिंहासनों और युद्धभूमियों की बात है, हमारे किस काम की? मगर मेरा मानना है आज यह पहले से भी ज़्यादा काम की है। शायद इसलिए कि आज की लड़ाइयाँ तलवारों से नहीं, शब्दों से, संकेतों से, और ख़ामोशियों से लड़ी जाती हैं।
आज लड़ाई के मैदान कम हैं, मगर प्रतिस्पर्धा के मैदान चारों तरफ़ फैले हैं। कारोबार में, नौकरी में, सोशल मीडिया पर, यहाँ तक कि घर-परिवार की चार दीवारी में भी हर जगह हमें दूसरों पर भरोसा करना पड़ता है। और भरोसा करते हुए भी होश में रहना यह एक कला है जो किसी स्कूल में नहीं सिखाई जाती, ज़िंदगी की कक्षा में सीखनी पड़ती है।
कॉर्पोरेट दुनिया में साझेदारी और सावधानी
मान लीजिए दो कंपनियाँ बरसों से एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी रही हैं। बाज़ार में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ दाँव खेलती रही हैं। अचानक किसी बड़े प्रोजेक्ट पर साथ काम करने का फ़ैसला होता है। बहुत अच्छी बात। सहयोग हमेशा अच्छा होता है दो ताक़तें मिलकर जो कर सकती हैं, अकेले नहीं कर सकतीं। मगर क्या इसका मतलब यह है कि दोनों एक-दूसरे को अपना सारा व्यापारिक राज़ खोलकर रख देंगी? अपनी रणनीति के काग़ज़ात मेज़ पर बिछा देंगी? कतई नहीं।
एक समझदार कारोबारी पहले तय करता है कौन-सी जानकारी बाँटनी है, किसे देनी है, कितनी देनी है, और क्या अपने सीने में बंद रखना है। इसे अविश्वास मत कहिए यह जोखिम को सँभालना है। यह वही विवेक है जिसकी बात कामन्दक करते हैं।
मैंने ख़ुद कई कारोबारियों को यह भूल करते देखा है अपनी आँखों के सामने। पुराने प्रतिद्वंद्वी पर इतना भरोसा कर बैठे कि ग्राहकों की सूची, दाम तय करने की रणनीति, आने वाले वक्त की योजनाएँ सब कुछ मेज़ पर रख दिया। खुले हाथों से। मुस्कुराते चेहरे से। और फिर? चूना लग गया। बुरी तरह। वह मुस्कुराहट बहुत महँगी पड़ी।
कामन्दक की सीख यही है साझेदारी करो, मगर लक्ष्मण रेखा साफ़ रखो। वह रेखा जो बताती है कि यहाँ तक और इससे आगे नहीं।
निजी रिश्तों में पुरानी खटास का सिलसिला
यह बात सिर्फ़ कारोबार की चमकदार दुनिया तक सीमित नहीं रहती। हमारी अपनी ज़िंदगी में, हमारे अपने घर की दहलीज़ पर भी ऐसा होता है। कोई रिश्तेदार, कोई पुराना यार जिसके साथ कभी रातें जागकर बातें की थीं, या कोई पड़ोसी जिससे कभी बिगड़ी हो, जिसके साथ कड़वे बोल बोले गए हों अचानक सुलह की पहल करता है। एक फ़ोन करता है, एक मिठाई का डिब्बा भेजता है।
तो करें क्या? दो चरम सीमाओं से बचें क्योंकि दोनों में ख़तरा है।
- एक - पुरानी बात भूलकर आँख मूँदकर भरोसा कर लेना। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जैसे वह ज़ख़्म कभी लगा ही नहीं।
- दो - सामने वाले में बदलाव के साफ़ संकेत आने पर भी उसे उसी पुरानी नज़र से देखते रहना। जैसे इंसान बदल ही नहीं सकता। जैसे माफ़ी नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं।
दोनों ग़लत हैं। दोनों में एक तरह की अंधता है। सही रास्ता बीच में है वक्त को इम्तिहान बनने दो। अगर कोई सच में बदला है, तो उसके बर्ताव में वह बदलाव रोज़ दिखेगा छोटी-छोटी बातों में, बिन माँगे मदद में, मुश्किल वक्त में खड़े रहने में। एक दिन की माफ़ी से भरोसा नहीं लौटता। भरोसा धीरे-धीरे बनता है एक-एक दिन, एक-एक काम से, एक-एक सच्चाई से। जैसे ईंट पर ईंट रखकर दीवार बनती है।
राजनीति और कूटनीति में ज़मीनी समझ
कामन्दकीय नीतिसार असल में राजनीति का ग्रंथ है सत्ता की भाषा में लिखा गया, सिंहासनों के लिए। इसलिए इसका सबसे सीधा इस्तेमाल वहीं है। राजनीति में न कोई हमेशा का दोस्त होता है, न हमेशा का दुश्मन बस हित स्थायी होते हैं। बाक़ी सब बदलता रहता है चेहरे, नारे, गठबंधन, वादे। यह बात मुझे हर बार याद आती है जब दुनिया भर की राजनीतिक ख़बरें देखता हूँ जब कल के दुश्मन आज गले मिलते दिखते हैं, और कल के दोस्त आज एक-दूसरे पर बरसते हैं।
आज जो देश कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, कल वही पलट सकता है। इसीलिए कूटनीति में भावनाओं की जगह कम होती है हित, ताक़त, वक्त और अंजाम का हिसाब ज़्यादा चलता है। यह निर्ममता नहीं यह यथार्थ है।
कामन्दक कहते हैं शांति चाहो, मगर शांति के नाम पर अपनी सुरक्षा में सेंध मत लगने दो। शांति का झंडा उठाना और अपनी ढाल नीचे रख देना ये दो अलग बातें हैं।
तो क्या हर किसी पर शक करना चाहिए?
नहीं। बिलकुल नहीं। और यह बात मैं पूरी साफ़गोई से कहना चाहता हूँ, क्योंकि इस सीख को ग़लत समझना बहुत आसान है ख़तरनाक हद तक आसान।
अगर कामन्दक की बात का उलटा-सीधा मतलब निकालें तो लगेगा किसी पर भरोसा ही मत करो। हर इंसान को शक की नज़र से देखो। अपने चारों तरफ़ दीवारें खड़ी कर लो। मगर ऐसा समाज न ठीक से चल सकता है, न सुखी रह सकता है। ऐसा इंसान भी नहीं।
हम अपने घरवालों पर भरोसा करते हैं उस भरोसे पर पूरा घर टिका होता है। दोस्तों पर, साथ काम करने वालों पर। डॉक्टर पर जब वह चीरा लगाता है, टीचर पर जब वह बच्चे को सँभालता है, वकील पर जब वह हमारा पक्ष रखता है, कैब चलाने वाले पर जब हम पिछली सीट पर आँखें बंद करके बैठते हैं अगर हर किसी पर शक करने बैठ जाएँ तो जीना दूभर हो जाएगा। ज़िंदगी एक काँटों की सेज बन जाएगी।
कामन्दक की सीख अंधा अविश्वास नहीं है। यह विवेकपूर्ण विश्वास है। भरोसा कीजिए, मगर सामने वाले के किरदार और बर्ताव को परखकर। माफ़ कीजिए, मगर ऐसा न हो कि वही ग़लती दोबारा झेलने की मजबूरी बन जाए। यह संतुलन है और संतुलन बनाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।
भरोसा करो, मगर आँखें खुली रखो
हमारे यहाँ भरोसे को कई बार इतना ऊँचा चढ़ा दिया जाता है कि सावधानी को शक समझ लिया जाता है। जैसे भरोसा करना पुण्य है और सवाल उठाना पाप। अगर मैं किसी से कहूँ "उसकी बात पर फ़ौरन यक़ीन मत कर लो, थोड़ा रुको, थोड़ा देखो" तो लोग समझेंगे कि मैं नकारात्मक हो रहा हूँ। कि मेरे दिल में कड़वाहट है।
मगर ज़रा ठहरकर सोचिए सावधानी नकारात्मकता नहीं है। सड़क पार करते वक्त दाएँ-बाएँ देखना नकारात्मकता नहीं यह अक्ल की बात है, यह ज़िंदा रहने की शर्त है। अपना बैंक का पासवर्ड किसी को न बताना नकारात्मकता नहीं यह समझदारी है। किसी नए धंधे में पैसा डालने से पहले जाँच-पड़ताल करना नकारात्मकता नहीं यह चौकसी है, यह वह फ़र्ज़ है जो आप अपने प्रति निभाते हैं।
बिलकुल वैसे ही, किसी पुराने विरोधी के साथ समझौता करते वक्त चौकन्ना रहना भी सामान्य विवेक है। इसमें न कोई बुराई है, न कोई कमज़ोरी।
भरोसा और सावधानी एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। असली, पका हुआ भरोसा वही है जिसमें आपको सामने वाले पर यक़ीन भी हो, मगर आप हक़ीक़त से मुँह भी न मोड़ें। जो भरोसा आँखें बंद करके किया जाए, वह भरोसा नहीं वह लापरवाही है।
अपनी ज़िंदगी में इस सूत्र को कैसे उतारें?
यह प्राचीन सीख कोई बोझ नहीं है कोई भारी पत्थर नहीं जिसे उठाकर चलना पड़े। बस पाँच बातें गाँठ बाँध लीजिए पाँच ऐसे सूत्र जो ज़िंदगी को थोड़ा आसान बना सकते हैं:
- बातों से ज़्यादा बर्ताव देखिए। लोग कहानियाँ गढ़ने में उस्ताद होते हैं। शब्दों का जादू चलाने में माहिर। मगर उनके काम ही उनकी असली कहानी सुनाते हैं वह कहानी जो मुँह से नहीं, हाथों से लिखी जाती है।
- पुराने बर्ताव को पूरी तरह अनदेखा मत कीजिए। अगर किसी ने बार-बार भरोसा तोड़ा है एक बार नहीं, दो बार नहीं, बार-बार तो सिर्फ़ एक ताज़ा वादे के बूते उसे पूरी ज़िम्मेदारी सौंप देना ग़लती होगी। बड़ी ग़लती।
- सीमाएँ तय कीजिए। हर रिश्ते में हदें ज़रूरी हैं वे हदें जो बताती हैं कि प्यार कहाँ तक है और लापरवाही कहाँ शुरू होती है। ख़ासतौर पर वहाँ जहाँ पहले कभी टूटन या धोखा हो चुका हो।
- वक्त को इम्तिहान बनने दीजिए। किसी के बदलाव को एक दिन में मत आँकिए। एक हफ़्ते में भी नहीं। महीनों और बरसों के व्यवहार में उसे पहचानिए। सच्चा बदलाव धीमा होता है, मगर टिकाऊ।
- बदला लेना और सावधान रहना दोनों अलग चीज़ें हैं। बदले की आग आपको ख़ुद जलाएगी भीतर से, धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के। मगर वही नुकसान दोबारा न हो, इसके लिए चौकन्ना रहना अक्लमंदी है। यह आत्मरक्षा है, बदला नहीं।
वह एक बात जो मैं कभी नहीं भूल पाया
कामन्दकीय नीतिसार का यह श्लोक जब भी पढ़ता हूँ चाहे सुबह की चाय के साथ हो या रात की ख़ामोशी में एक बात याद दिला जाता है। वह बात जो ज़िंदगी की भागदौड़ में, रोज़ की आपाधापी में, मैं अक्सर भूल बैठता हूँ।
समझौता हो जाना और भरोसा लौट आना ये एक चीज़ नहीं हैं।
दुश्मन के साथ संधि करना ज़रूरी हो सकता है। कई बार तो यही सबसे अक्लमंद रास्ता होता है वह रास्ता जो तलवार से नहीं, दिमाग से निकलता है। मगर संधि के बाद अपनी समझ, अपनी सुरक्षा, अपने हित इन्हें हवा में उड़ा देना भारी भूल होगी। वह भूल जिसकी क़ीमत कभी-कभी पूरी ज़िंदगी चुकानी पड़ती है।
इंद्र और वृत्रासुर की कहानी बस एक पुरानी कथा नहीं यह इंसानी स्वभाव का आईना है। उस आईने में अपना चेहरा भी दिखता है और सामने वाले का भी।
आज के दौर में इस सीख का मतलब बस इतना है:
- भरोसा करो, मगर होश में रहकर।
- माफ़ करो, मगर तजुर्बे को मत भूलो।
- साझेदारी करो, मगर हदें जानो।
- और सबसे बड़ी बात किसी की मीठी बातों से ज़्यादा उसके रोज़मर्रा के बर्ताव पर नज़र रखो। क्योंकि बातें धोखा दे सकती हैं, बर्ताव नहीं।
आख़िरी सवाल आपके साथ क्या हुआ?
मैंने अपनी कहानी तो सुना दी उस पुराने सहयोगी की, जिसने धोखा दिया और फिर लौटकर आया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। मगर यह नहीं बताया कि आख़िर मैंने किया क्या। शायद जानबूझकर रोके रखा कि पहले बात पूरी हो जाए, फिर अपना हिस्सा सुनाऊँ।
सच बताऊँ तो मैंने उसे मौका दिया। मगर पूरा भरोसा नहीं किया। सीमाएँ तय कर लीं साफ़, स्पष्ट, बिना किसी लाग-लपेट के। अपनी ग्राहक सूची नहीं बाँटी, अपने सारे पत्ते नहीं खोले, अपनी रणनीति का नक्शा उसकी मेज़ पर नहीं रखा। सहयोग किया, मगर आँखें खुली रखीं। दिल खुला रखा, मगर दिमाग भी जगा रखा।
आज हमारी साझेदारी चल रही है। और मैं दिल से चाहता हूँ कि चलती रहे लंबी चले, अच्छी चले। मगर कामन्दक की वह सीख हमेशा कान में गूँजती रहती है जैसे कोई पुराना राग जो एक बार सुन लो तो भूलता नहीं।
अब आपकी बारी।
क्या आपकी ज़िंदगी में कभी ऐसा हुआ? किसी पुराने विरोधी ने दोबारा भरोसा जीतने की कोशिश की हो? किसी ने माफ़ी माँगकर नई शुरुआत का हाथ बढ़ाया हो? फिर आपने क्या किया आँख मूँदकर यक़ीन कर लिया या वक्त देकर बर्ताव परखा? या कुछ और किया जो इन दोनों से अलग था?
चाहें तो अपना अनुभव बाँटिए। हो सकता है आपकी कहानी किसी और को सही फ़ैसला लेने में मदद कर दे। कभी-कभी एक अजनबी का तजुर्बा वह रोशनी दे जाता है जो अपनों से नहीं मिलती।
अगर नीतिशास्त्र की ऐसी ज़मीनी सीखें आपको पसंद आई हैं, तो इसे अपने दोस्तों और घरवालों तक पहुँचाइए। और ऐसे ही विचारों के लिए जुड़े रहिए।