जब किसी राज्य के सामने केवल दो ही मार्ग शेष रह जाते हैं; युद्ध या संधि तब सही निर्णय केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसकी सैन्य शक्ति कितनी विशाल है। मूल प्रश्न यह होता है कि युद्ध का परिणाम कितना निश्चित है, और उससे प्राप्त होने वाला संभावित लाभ उसकी भारी विनाशकारी कीमत की तुलना में कितना सार्थक है, यह पहले तौलना आवश्यक है।
आचार्य कामंदक रचित नीतिसार में इसी सामरिक धर्मसंकट पर एक अत्यंत गूढ़ नीति प्रस्तुत की गई है। इसके नवम सर्ग के 59वें श्लोक में देवगुरु बृहस्पति के मत का संदर्भ देते हुए कहा गया है यदि शत्रु समान बल वाला हो और युद्ध में विजय का परिणाम अनिश्चित हो, तो संधि का मार्ग चुनना ही श्रेयस्कर है।
यह सिद्धांत प्रथम दृष्टया अत्यंत व्यावहारिक और साधारण प्रतीत होता है, परंतु इसके गंभीर अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि यह केवल युद्ध से पलायन की कोई सुलभ सलाह नहीं है। इसके नेपथ्य में जोखिम का सूक्ष्म आकलन, अपनी वास्तविक क्षमता का बोध और सही समय पर सटीक निर्णय लेने की सधी हुई दूरदर्शिता निहित है।
इस लेख में हम इसी श्लोक के निहितार्थ को उसके संपूर्ण संदर्भ में समझने का प्रयास करेंगे। साथ ही यह भी विश्लेषित करेंगे कि समान बल वाले प्रतिद्वंद्वी के समक्ष संधि का प्रस्ताव रखना दुर्बलता नहीं, अपितु एक अत्यंत परिपक्व रणनीतिक चाल क्यों माना जाना चाहिए।
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| समान शक्ति वाले पक्षों के बीच अनिश्चित युद्ध की जगह संधि पर विचार करने की नीति। |
श्लोक और उसका शाब्दिक अर्थ
मूल संस्कृत श्लोक
सन्धिम् इच्छेत् समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि।
न हि संशयितं कुर्याद् इत्य् उवाच बृहस्पतिः ॥ ५९ ॥
इस श्लोक का मूल भाव यह है कि यदि विरोधी पक्ष समान बलशाली हो और समरभूमि में विजय-पराजय का निर्णय स्पष्ट न दिख रहा हो, तो संधि की अभिलाषा रखना ही बुद्धिमान राजा का धर्म है। यहाँ युद्ध का पूर्ण त्याग नहीं सिखाया जा रहा, बल्कि अनिर्णित और संशयपूर्ण संघर्षों में विवेक व सावधानी बरतने का निर्देश दिया गया है।
श्लोक का सरल हिंदी अर्थ
अर्थात्, यदि शत्रु शक्ति में हमारे समकक्षी भी है, तब भी उससे संधि का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि ऐसे युद्ध का परिणाम सदैव संदिग्ध रहता है। महर्षि बृहस्पति के इस कथन का गूढ़ अर्थ यह है कि जिस कार्य की सफलता स्वयं संशय के घेरे में हो, उसमें बिना सोचे-समझे प्रवृत्त होना आत्मघाती हो सकता है।
यहाँ एक बिंदु विशेष रूप से ध्यातव्य है, इस श्लोक को केवल "युद्ध से बचने" की दुर्बल सलाह मानकर देखना इसके मूल मर्म को संकुचित कर देना होगा। वस्तुतः इसमें परिणाम की अनिश्चितता को प्राथमिकता दी गई है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम युद्ध लड़ने में सक्षम हैं या नहीं; वास्तविक प्रश्न यह है कि उस युद्ध का परिणाम कितना विश्वसनीय होगा और उसकी अंतिम कीमत क्या होगी।
बृहस्पति नीति का गूढ़ भावार्थ
युद्ध का जोखिम और अनिश्चितता
युद्ध का प्रारंभ एक फौरी निर्णय हो सकता है, परंतु उसका नियंत्रण और समापन कितना दुसाध्य होता है, इतिहास इसका साक्षी रहा है। किसी भी संघर्ष के आरंभ में हमारे पास उपलब्ध सूचनाएँ प्रायः अपूर्ण होती हैं। एक शासक अपनी सेना की संख्या, राजकोष की स्थिति और सहयोगियों की शक्ति का आकलन तो कर सकता है, परंतु शत्रु की गुप्त योजनाओं, उसके सैनिकों के मनोबल और अप्रत्याशित रणनीतियों का शत-प्रतिशत सटीक अनुमान लगाना असंभव ही रहता है।
युद्ध इसी अनिश्चितता के अंधकार में लड़ा जाता है। नीतिसार के इस श्लोक की महत्ता यही है कि वह केवल भौतिक शक्ति को ही नहीं, बल्कि उस शक्ति के प्रयोग से उत्पन्न होने वाले अनिश्चित परिणामों को भी समान गंभीरता से रेखांकित करता है।
यदि दो राज्यों की सैन्य शक्ति लगभग समान है, तो दोनों युद्ध करने में सक्षम तो हैं, किंतु किसी के पास भी ऐसी निर्णायक बढ़त नहीं होती जिससे विजय सुनिश्चित की जा सके। ऐसी स्थिति में एक छोटी सी रणनीतिक भूल भी पासा पलट सकती है; रसद आपूर्ति में बाधा, सहयोगियों का विश्वासघात या संघर्ष का लंबा खिंच जाना राजकोष और राज्य के अस्तित्व को संकट में डाल सकता है।
अतः केवल यह सोच लेना कि "हम युद्ध करने में समर्थ हैं" पर्याप्त नहीं है; रणनीतिक परिपक्वता इस प्रश्न में निहित है कि क्या वास्तव में इस समय युद्ध लड़ना राज्यहित में है? यही विचार इस श्लोक को एक सामान्य युद्ध-विरोधी विचार से पृथक कर नीतिशास्त्र के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करता है।
'समेन संधि' का वास्तविक अर्थ
यहाँ "समेन" शब्द का तात्पर्य समान या समकक्ष शक्ति वाले प्रतिपक्षी से है। ऐसे समकक्षी शत्रु के साथ संधि करने का अर्थ कदापि आत्मसमर्पण नहीं, अपितु एक सम्मानजनक और संतुलित समझौता है। दो शक्तिशाली राज्य भी परस्पर संधिबद्ध होते हैं, विशेषकर तब जब दोनों को इस बात का स्पष्ट बोध हो कि युद्ध केवल अपार जन-धन की हानि देगा, निर्णायक परिणाम नहीं।
एक दूरदर्शी शासक यह भली-भांति जानता है कि उसके पास युद्ध करने का सामर्थ्य हो सकता है, परंतु वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध में उतरना बुद्धिमत्ता नहीं होगी। यह भेद अत्यंत सूक्ष्म और आवश्यक है युद्ध करने की क्षमता होना और युद्ध करने की आवश्यकता होना, दो सर्वथा भिन्न विषय हैं। इस परिप्रेक्ष्य में संधि का मार्ग कायरता नहीं, बल्कि उपलब्ध विकल्पों में से सबसे विवेकपूर्ण चयन है।
कामंदकीय नीतिसार के नवम सर्ग का रणनीतिक महत्व
साम, दाम, दंड और भेद में संधि का स्थान
भारतीय कूटनीतिक परंपरा में राज्य संचालन हेतु साम, दाम, भेद और दंड का विधान किया गया है। परंतु इन्हें परस्पर निरपेक्ष या अलग-थलग मान लेना भूल होगी। राजनीति में किसी एक उपाय का एकांगी प्रयोग सार्वकालिक नहीं हो सकता; परिस्थिति के अनुसार कभी संवाद, कभी प्रलोभन, कभी कूटनीतिक भेद और कभी सैन्य शक्ति का प्रयोग प्रासंगिक होता है।
संधि भी इसी बहुआयामी कूटनीति का एक अपरिहार्य अंग है। उदाहरणार्थ, यदि किसी राज्य पर एक साथ दो विपरीत दिशाओं से संकट आ पड़े, और वह एक समान बलशाली पड़ोसी से युद्ध छेड़ दे, तो उसके समस्त संसाधन उसी एक मोर्चे पर भस्म हो जाएँगे। इसके विपरीत, यदि वह उस पड़ोसी से अस्थायी संधि करके शांति स्थापित कर ले, तो वह अपनी संपूर्ण शक्ति को दूसरे अधिक भयावह संकट पर केंद्रित कर सकता है। यहाँ संधि निष्क्रियता नहीं, अपितु समय और संसाधनों का कुशल प्रबंधन है।
बराबर वाले शत्रु से संधि क्यों आवश्यक है?
समान बल वाले प्रतिद्वंद्वी से युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसमें त्वरित और स्पष्ट विजय की संभावना नगण्य होती है। जब दोनों पक्ष संसाधनों से संपन्न हों, तो युद्ध दीर्घकालिक हो जाता है। और लंबा खिंचता युद्ध केवल सेनाओं को ही नहीं थकाता, बल्कि संपूर्ण राज्य की आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जर्जर कर देता है; राजकोष रिक्त होने लगता है, व्यापार अवरुद्ध हो जाता है, और तृतीय शत्रु को आक्रमण का सुअवसर मिल जाता है।
इसीलिए शक्ति का सच्चा प्रदर्शन केवल आक्रमण करने में नहीं, बल्कि कभी-कभी संयम रखकर उस शक्ति को उचित समय के लिए बचाए रखने में होता है।
युद्ध या संधि? निर्णय लेने की कसौटी
कामंदक के इस श्लोक का अध्ययन करते समय यह व्यावहारिक प्रश्न उपस्थित होता है कि वास्तविक धरातल पर इस नीति का प्रयोग कैसे किया जाए? यद्यपि श्लोक में कोई आधुनिक सूत्र नहीं दिया गया है, तथापि इसके मूल दर्शन से निर्णय-प्रक्रिया की एक सुदृढ़ रूपरेखा उभरती है।
पहला प्रश्न : प्रतिपक्षी की वास्तविक शक्ति का धरातल क्या है? शक्ति का तात्पर्य केवल सैनिकों की संख्या नहीं होता; किसी राज्य का वास्तविक बल उसके कोष, दुर्ग, मित्र राष्ट्रों के सहयोग, भौगोलिक स्थिति और विषम परिस्थितियों को झेलने की क्षमता से आंका जाता है। युद्ध में रसद और आपूर्ति व्यवस्था निर्णायक होती है। अतः निर्णय से पूर्व अपनी क्षमता के साथ-साथ शत्रु की क्षमता का भी निष्पक्ष मूल्यांकन अनिवार्य है।
दूसरा प्रश्न : इस युद्ध से अंततः क्या अर्जित होगा? युद्ध स्वयं में कोई साध्य नहीं, बल्कि एक साधन मात्र है। क्या हम किसी सीमा की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, किसी अस्तित्वगत खतरे को टालने के लिए, या केवल राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए? यदि उद्देश्य ही स्पष्ट नहीं है, तो युद्ध केवल निरर्थक शक्ति-प्रदर्शन बनकर रह जाएगा। प्रायः राज्य या व्यक्ति केवल अपने मिथ्या अहंकार के कारण संघर्ष में कूद पड़ते हैं, किंतु वास्तविक रणनीति प्रतिष्ठा के आवेग से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर चलती है कि इस निर्णय से दीर्घकालिक राज्यहित कितना सुरक्षित होगा।
तीसरा प्रश्न : विजय की संभावना कितनी प्रबल है? यही इस नीति का केंद्रीय बिंदु है; सन्धिम् इच्छेत् समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि। यदि विरोधी समकक्षी है और परिणाम अनिश्चित है, तो संधि का मार्ग ही श्रेयस्कर है। यहाँ "संदिग्ध" शब्द अत्यंत अर्थपूर्ण है। युद्ध के मैदान में श्रेष्ठ से श्रेष्ठ योजनाएँ भी अनपेक्षित घटनाओं की भेंट चढ़ जाती हैं, मौसम का बदलना, रसद मार्ग का कट जाना या मित्र पक्षों का मुकर जाना सब कुछ बदल सकता है।
चौथा प्रश्न : पराजय ही नहीं, विजय का मूल्य भी आंका गया है क्या? यदि अत्यधिक क्षति सहकर विजय मिल भी गई, तो क्या राज्य उस विजय को संभालने की स्थिति में बचेगा? यदि हमारी सेना और अर्थव्यवस्था इतनी क्षीण हो जाए कि हम किसी नए संकट का सामना न कर सकें, तो ऐसी विजय पराजय से भी अधिक घातक सिद्ध होती है। इसे ही इतिहास में 'पिरिक विजय' (Pyrrhic Victory) कहा गया है। कामंदक यद्यपि इस शब्दावली का प्रयोग नहीं करते, किंतु युद्ध की अपरिमित लागत पर उनका बल इसी ओर संकेत करता है।
पाँचवाँ प्रश्न : क्या संधि से अनुकूल समय प्राप्त किया जा सकता है? यदि युद्ध का परिणाम संशय में हो, तो संधि का सबसे बड़ा लाभ होता है, "समय की प्राप्ति"। इस विराम अवधि का उपयोग सेना के पुनर्गठन, अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण और नई कूटनीतिक संधियों को आकार देने में किया जा सकता है। इस दृष्टि से संधि अंत नहीं, बल्कि एक रणनीतिक विराम है।
छठा प्रश्न : संधि के पश्चात का परिदृश्य क्या होगा? केवल संधि कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, उसके पीछे का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। क्या यह समझौता हमें सुदृढ़ होने का अवसर दे रहा है? यदि संधि केवल भयवश की गई है और उससे भविष्य के लिए कोई लाभ नहीं निकलता, तो वही समझौता आगे चलकर विनाश का कारण बन सकता है।
अतः मूल प्रश्न यह नहीं है कि, "युद्ध करें या संधि?" बल्कि वास्तविक प्रश्न यह होना चाहिए "वर्तमान परिस्थिति में हमारे दीर्घकालिक हितों की रक्षा किस विकल्प से न्यूनतम जोखिम के साथ संभव है?" यही इस नीति का व्यावहारिक मर्म है।
निर्णय-प्रक्रिया को सहज रूप में समझें
आचार्य कामंदक के इस विचार को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए संपूर्ण निर्णय-क्रम को इस प्रकार देखा जा सकता है, सर्वप्रथम विवाद के मूल कारण का भावनात्मक आवेग से पृथक होकर तटस्थता से विश्लेषण किया जाए। तत्पश्चात् अपनी एवं विरोधी की वास्तविक क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन हो। इसके बाद युद्ध की अनिश्चितता और उससे होने वाली जन-धन की संभावित क्षति का आकलन आवश्यक है। यदि परिणाम अत्यधिक संशयपूर्ण हो और संधि के माध्यम से राज्यहित की पूर्ति संभव हो, तो संधि का मार्ग चुनना ही परम विवेकशीलता है।
यह प्रक्रिया प्राचीन ग्रंथों के शाश्वत विचारों को आज के पाठकों के लिए सुगम और सुव्यवस्थित रूप में समझने की एक तार्किक चेष्टा मात्र है।
संधि का अर्थ हार मान लेना नहीं
लोकमानस में संधि शब्द को प्रायः पराजय या पीछे हटने के भाव से जोड़कर देखा जाता है, परंतु उच्च राजनीति और कूटनीति में ऐसा नहीं होता। दो समान शक्तियों के मध्य समझौता इस यथार्थ की स्वीकारोक्ति है कि अनावश्यक संघर्ष दोनों पक्षों को केवल क्षति पहुँचाएगा। ऐसी संधि में दोनों पक्ष अपने स्वाभिमान और शक्ति को बनाए रखते हुए विनाशकारी टकराव को टाल देते हैं।
यही कारण है कि कामंदक के इस विचार को कायरता का नाम देना नितांत भूल होगी। यहाँ विषय पराक्रम का नहीं, बल्कि निर्णय की बुद्धिमत्ता का है। जो शासक प्रत्येक चुनौती का उत्तर केवल युद्ध से देने का हठ करता है, वह भले ही साहसी प्रतीत हो, परंतु यदि उसका निर्णय दूरदर्शिता और लागत के गणित से रहित है, तो उसका वह दुस्साहस संपूर्ण राज्य को तबाही की ओर ले जा सकता है। इसके विपरीत, सही समय पर संधि का मार्ग चुनने वाला शासक भले ही तात्कालिक रूप से रणनीतिक विराम लेता दिखे, किंतु वह अपने राज्य के दीर्घकालिक भविष्य को सुरक्षित कर रहा होता है।
क्या कामंदक युद्ध के विरुद्ध हैं?
यहाँ एक स्पष्टीकरण अत्यंत आवश्यक है। इस एकल श्लोक के आधार पर कामंदक को पूर्णतः युद्ध-विरोधी या अहिंसावादी विचारक मान लेना एकांगी दृष्टिकोण होगा। नीतिसार का संपूर्ण कलेवर राज्य संचालन, सैन्य संगठन, कूटनीतिक चालों और समर-नीति के विविध पहलुओं को समाहित किए हुए है।
इस श्लोक का संदर्भ नितांत विशिष्ट और परिभाषित है, जब शत्रु समान बलशाली हो और युद्ध में विजय का परिणाम अनिश्चित हो, तभी संधि की संस्तुति की गई है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हर परिस्थिति में युद्ध वर्जित है। यथार्थ यह है कि युद्ध राज्यहित साधने का एक साधन मात्र है, स्वयं में साध्य नहीं। जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों और युद्ध से राज्य के उच्च उद्देश्यों की पूर्ति हो रही हो, तब संघर्ष ही धर्म बन जाता है। किंतु जहाँ विजय संदिग्ध हो, वहाँ संधि ही एकमात्र नीतिगत विकल्प है।
संधि कब कमजोरी बन सकती है?
इस पक्ष पर विचार करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि कोई राज्य या नेतृत्व निरंतर केवल भय और आशंका के कारण समझौते करता रहे, तो संधि उसकी रणनीति नहीं, बल्कि उसकी विवशता बन जाती है। संधि की सार्थकता तभी है जब उसके पीछे कोई दूरगामी रणनीतिक सोच हो; यदि वह केवल संकट को टालने का अस्थायी प्रयास है और भविष्य को अधिक जोखिम में डालती है, तो ऐसी संधि निरर्थक है। राजनीति में न तो युद्ध सर्वथा त्याज्य है और न ही संधि सर्वथा वंदनीय सब कुछ परिस्थिति, काल, बल और भावी परिणामों के संतुलन पर निर्भर करता है।
आधुनिक जीवन और कूटनीति में इस नीति की उपयोगिता
प्राचीन काल के राज्यों की संरचना और आज का आधुनिक विश्व सर्वथा भिन्न हैं, इसलिए प्राचीन नीतियों को ज्यों-का-त्यों आधुनिक जीवन पर आरोपित नहीं किया जा सकता। किंतु उस नीति के मूल में छिपा जीवन-दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। क्या प्रत्येक विवाद में अंतिम सीमा तक लड़ना आवश्यक है? क्या हर प्रतिस्पर्धा में सामने वाले का पूर्ण विनाश ही सफलता का एकमात्र मापदंड है? निर्णय लेते समय संभावित लाभ के साथ-साथ संभावित क्षति का सटीक आकलन करना आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना शताब्दियों पूर्व था।
कॉरपोरेट और व्यावसायिक रणनीति में प्रयोग
व्यावसायिक जगत में जब दो समान क्षमता वाली कंपनियाँ एक ही बाजार में आमने-सामने होती हैं, तो एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए छेड़ा गया 'मूल्य-युद्ध' (Price War) अंततः दोनों के लाभ को समाप्त कर देता है। ऐसे समय में परस्पर होड़ के स्थान पर रणनीतिक साझेदारी, विलय (Merger) या बाजार के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर सहमति बनाना दोनों के व्यावसायिक हित में होता है।
यहाँ भी वही शाश्वत प्रश्न उपस्थित होता है, क्या प्रत्येक संघर्ष वास्तव में लड़ने योग्य है? क्योंकि व्यावसायिक दुनिया में भी पूँजी, समय और मानवीय संसाधन सीमित होते हैं। व्यर्थ के टकराव में ऊर्जा नष्ट करने के स्थान पर नवाचार और नए बाजारों की खोज में संसाधन लगाना अधिक लाभप्रद सिद्ध होता है।
व्यक्तिगत विवादों में व्यावहारिक सीख
व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी ऐसे अनेक अवसर आते हैं जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह शक्तिशाली और सही प्रतीत होते हैं। यदि परिवार, व्यापारिक साझेदारी या कार्यस्थल पर दोनों पक्ष अपने हठ पर अड़े रहें, तो एक साधारण मतभेद स्थायी शत्रुता में बदल जाता है। ऐसी स्थिति में संवाद और समझौते का हाथ बढ़ाना पराजय नहीं है। यदि किसी व्यर्थ की बहस को जीतने की कीमत मानसिक शांति, समय या किसी प्रिय संबंध का अंत है, तो ऐसी जीत वास्तव में पराजय ही है। कई बार संबंध को बचा लेना बहस जीतने से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।
समय भी एक राजनीतिक संसाधन है
कामंदकीय नीति का अनुशीलन करते समय "काल" (समय) के महत्त्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता। युद्ध में प्रायः वर्तमान क्षण के बल को ही सब कुछ मान लिया जाता है, किंतु कूटनीति में भविष्य का दृष्टिकोण सर्वोपरि होता है। आज किसी संघर्ष को स्थगित करने से यदि राज्य को स्वयं को संगठित करने का अवसर मिलता है, तो वह टला हुआ युद्ध भविष्य की महान विजय की नींव बन सकता है। संधि से प्राप्त समय का उपयोग आंतरिक दुर्बलताओं को दूर करने में किया जा सकता है। अतः संधि को केवल पीछे हटना न मानकर भविष्य के लिए बेहतर विकल्प सुरक्षित रखने की रणनीति मानना चाहिए।
आज के समय में इस श्लोक को कैसे पढ़ें?
प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन में बहुधा यह त्रुटि होती है कि हम ऐतिहासिक संदर्भों को विस्मृत कर आधुनिक धारणाओं को उन पर थोपने लगते हैं। कामंदक का युग, शासन-तंत्र, राज्य-संरचना और युद्ध-पद्धति की दृष्टि से आज के लोकतांत्रिक और वैश्वीकृत विश्व से भिन्न था। फिर भी, उच्च दार्शनिक विचारों की प्रासंगिकता कालजयी होती है।
इस श्लोक से आज के युग के लिए जो सार्वभौमिक सिद्धांत निकलता है, वह यह है: जब परिस्थितियाँ अनिश्चित हों, तो केवल अपनी विजय की अभिलाषा मत देखिए; संभावित क्षति के भयावह पक्ष को भी उतनी ही गंभीरता से तौलिए। यही विवेक राजनीति, व्यापार और व्यक्तिगत जीवन में समान रूप से मार्गदर्शक है। जीवन का सबसे कठिन निर्णय यह तय करना नहीं होता कि कैसे लड़ा जाए, बल्कि यह पहचानना होता है कि किस संघर्ष से पीछे हट जाना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है।
इस नीति की सबसे बड़ी सीख
कामंदकीय नीतिसार का यह श्लोक युद्ध और संधि को किसी रूढ़िवादी चश्मे से नहीं देखता; इसका संपूर्ण ध्यान परिस्थिति के यथार्थ पर केंद्रित है। यदि विरोधी समान बलशाली है और युद्ध का परिणाम अनिश्चित है, तो संधि का विचार ही दूरदर्शिता है। इस संपूर्ण विवेचन का सार तीन मूलभूत सिद्धांतों में निहित है प्रथम, अपने बल का अति-आकलन न करना; द्वितीय, प्रतिपक्षी की क्षमता को कम न आंकना; और तृतीय, विजय की अभिलाषा के साथ युद्ध के संभावित विनाश को भी तराजू पर तौलना।
यह नीति युद्ध से पलायन की प्रेरणा नहीं देती, अपितु संशयपूर्ण युद्ध में उतरने से पूर्व ठहरकर आत्मचिंतन करने का विवेक प्रदान करती है।
निष्कर्ष
आचार्य कामंदक द्वारा उद्धृत देवगुरु बृहस्पति की यह नीति अपने लघु रूप में एक अत्यंत गंभीर प्रश्न प्रस्तुत करती है जब दो पक्ष समान बलशाली हों और विजय का परिणाम संशय के घेरे में हो, तो क्या केवल अपनी सैन्य क्षमता के अहंकार में युद्ध छेड़ देना उचित है? नीतिसार का उत्तर स्पष्ट और सचेत करने वाला है: सन्धिम् इच्छेत् समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि। अर्थात् ऐसी स्थिति में संधि की अभिलाषा रखना ही धर्म और नीति के अनुकूल है।
किंतु इस मर्म को समझने के लिए हमें संधि को दुर्बलता और युद्ध को वीरता मानने वाली संकीर्ण सोच का परित्याग करना होगा। युद्ध के लिए अदम्य साहस चाहिए, किंतु उस साहस को दिशा देने के लिए सटीक आकलन भी आवश्यक है। अंततः वास्तविक विजय उसकी नहीं होती जो केवल भावावेश में लड़ना जानता है, बल्कि विजय उसकी होती है जो परिस्थिति की विसंगतियों को समझकर सही समय पर सही निर्णय लेता है।
अंतिम विचार
सफलता का मापदंड केवल प्रत्येक संघर्ष को जीतना नहीं होता। कभी अपनी ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट होने से बचा लेना भी विजय है, कभी अनुकूल समय की प्रतीक्षा करना भी विजय है, और कभी ऐसा विवेकपूर्ण समझौता कर लेना जो भविष्य के द्वार खोले रखे तात्कालिक विजय से कहीं अधिक हितकर सिद्ध होता है।
कामंदक के इस विचार को आज के परिप्रेक्ष्य में आत्मसात करने का सबसे सार्थक मार्ग यही है कि इसे केवल युद्ध-शास्त्र का नियम न मानकर अनिश्चितताओं से भरे जीवन में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की एक सार्वभौमिक नीति के रूप में देखा जाए। रणनीति केवल प्रहार करने की कला का नाम नहीं है; रणनीति यह पहचानने की सूक्ष्म दृष्टि भी है कि किस संघर्ष में उतरना श्रेयस्कर है और किसे कुशलतापूर्वक टाल देना बुद्धिमत्ता है।
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यदि दो पक्ष समान सामर्थ्य रखते हों और युद्ध का परिणाम अनिश्चित हो, तो आपके मतानुसार उत्तम रणनीति क्या होनी चाहिए, युद्ध या संधि? अपने विचार टिप्पणी में अवश्य साझा करें।