जब दो बराबर ताकतवर लोग जब आपस में भिड़ जाएँ तो क्या होता है? न कोई जीतता है, न कोई हारता है, बस दोनों तबाह हो जाते हैं। यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं है, यह हज़ारों साल पुराने भारतीय नीतिशास्त्र की बात है।
हम इंसान एक अजीब मुगालते में जीते हैं। हमें लगता है कि लड़ाई में हम जीत जाएँगे। सरकारें सोचती हैं कि युद्ध से "समस्या हल" हो जाएगी। कंपनियाँ मानती हैं कि प्रतिद्वंद्वी को "ख़त्म" कर देंगी। लेकिन जब दोनों पक्ष बराबर के ताकतवर हों, तो यह सोच सिर्फ़ और सिर्फ़ आत्मघाती होती है।
कामंदकीय नीतिसार के नवम सर्ग का एक छोटा-सा श्लोक इस पूरी बात को एक पौराणिक कथा के ज़रिए समझा देता है - सुन्द और उपसुन्द की कहानी। दो भाई, समान बल, समान वीरता और दोनों ने एक-दूसरे को मार डाला।
आइए, इस श्लोक को गहराई से समझते हैं, शब्द-दर-शब्द अर्थ से लेकर उसके राजनीतिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक आयामों तक। और सबसे ज़रूरी बात यह समझते हैं कि आज की दुनिया में यह श्लोक कितना ज़िंदा है।
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| "समान शक्ति वाले दो योद्धा जब आपस में भिड़ते हैं, तो विनाश दोनों का होता है" - कामंदकीय नीतिसार, 9.61 |
सुन्द और उपसुन्द - जब बराबरी के दो ताकतवर टकराते हैं
दो भाई और एक वरदान
सुन्द और उपसुन्द दो असुर भाई थे। सगे। बचपन से साथ खेले, साथ बड़े हुए, साथ लड़ना सीखा। दोनों में अद्भुत प्रेम था। दोनों की ताकत बराबर थी।
उन्होंने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और वरदान माँगा था - अमरता का। ब्रह्मा जी ने कहा, "जो जन्मा है, वह मरेगा।" तब दोनों ने चतुराई दिखाई: "हमें कोई न मार सके, सिवाय हम दोनों के, एक-दूसरे के।"
ब्रह्मा जी ने वरदान दे दिया। दोनों को लगा, हम तो भाई हैं, हम कभी एक-दूसरे को क्यों मारेंगे? हमारा प्रेम अटूट है।
लेकिन उन्होंने एक बात नहीं समझी - जब ताकत बराबर हो और बीच में कोई ऐसी चीज़ आ जाए जिसे दोनों चाहते हों, तो प्रेम, भाईचारा, रिश्ता - सब एक तरफ़ हो जाता है।
वरदान पाकर दोनों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। देवताओं ने ब्रह्मा से प्रार्थना की। ब्रह्मा ने विश्वकर्मा को आदेश दिया - सृष्टि की सबसे सुंदर अप्सरा बनाओ। तिलोत्तमा बनी। तिलोत्तमा को भेजा गया सुन्द और उपसुन्द के पास। दोनों ने उसे देखा। दोनों के मन में काम जागा। दोनों ने कहा, "यह मेरी होगी।"
और फिर जो होना था, वही हुआ। दोनों ने एक-दूसरे पर हमला किया। दोनों समान बल के थे - "समवीर्यौ"। कोई किसी से कम नहीं था। लड़ाई भीषण थी। अंत में दोनों ने एक-दूसरे को मार गिराया। कोई नहीं जीता।
श्लोक की दो पंक्तियाँ, पूरी राजनीति
यह कथा कामंदकीय नीतिसार में आती है, नवम सर्ग में। वहाँ एक छोटा-सा श्लोक है, सिर्फ़ दो पंक्तियाँ:
युद्धे विनाशो नियतः कदाचिद् उभयोर् अपि ।
सुन्दोपसुन्दाव् अन्योन्यं समवीर्यौ हतौ न किम् ॥ ६१ ॥
शब्दार्थ:
- युद्धे - युद्ध में
- विनाशः - विनाश
- नियतः - नियत, निश्चित रूप से घटित होने वाला
- कदाचित् - कभी-कभी
- उभयोः अपि - दोनों का भी
- सुन्द-उपसुन्दौ - सुन्द और उपसुन्द
- अन्योन्यम् - एक-दूसरे को
- समवीर्यौ - समान पराक्रम वाले
- हतौ - मारे गए
- न किम् - क्या नहीं?
अनुवाद:
"युद्ध में कभी-कभी ऐसी स्थिति आ जाती है जहाँ विनाश दोनों पक्षों को निगल जाता है। क्या समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द ने एक-दूसरे को नहीं मारा?"
कामंदक ने बात सीधे आदेश की तरह नहीं कही। उन्होंने एक उदाहरण सामने रख दिया, सुन्द और उपसुन्द का, और फिर पूछा: "न किम्?" क्या ऐसा नहीं हुआ? सवाल छोटा है, लेकिन उसके पीछे पूरी राजनीति खड़ी है।
'नियतः' और 'कदाचित्' - भाषा की सूक्ष्मता
"नियतः" - यह शब्द बहुत कुछ कहता है। नियत का मतलब है तय, निश्चित। कामंदक कह रहे हैं कि युद्ध का स्वभाव ही ऐसा है कि उसमें विनाश से बचना कठिन होता है।
लेकिन "कदाचित्" उस निश्चितता को तुरंत घेर लेता है। कभी-कभी, किसी समय। कामंदक यह नहीं कह रहे कि हमेशा दोनों का विनाश होता है। वे कह रहे हैं कि "कभी-कभी" दोनों का भी विनाश हो जाता है।
यह बारीकी जानबूझकर रखी गई है। अगर कामंदक कहते कि "हमेशा दोनों का विनाश होता है," तो पाठक मानता नहीं, क्योंकि इतिहास में ऐसे उदाहरण हैं जहाँ एक पक्ष जीता। लेकिन "कभी-कभी" कहकर वे बात को विश्वसनीय बनाते हैं और साथ ही उस जोखिम को रेखांकित करते हैं।
युद्ध में उतरते वक़्त दोनों पक्ष सोचते हैं कि विनाश "दूसरे" का होगा। कामंदक कहते हैं, रुको, एक पल सोचो क्या हो अगर दोनों का हो?
'समवीर्य' - एक व्याख्या
यह श्लोक युद्ध की संभावना और उसके अनिश्चित परिणामों पर चल रही चर्चा के बीच आता है, और ठीक इसी कारण 'समवीर्य' का उदाहरण यहाँ इतना अर्थपूर्ण हो जाता है। कामंदक राजा को समझा रहे हैं कि युद्ध का निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। ख़ासकर तब, जब प्रतिद्वंद्वी बराबर की ताकत रखता हो।
"समवीर्यौ" - यह शब्द कुंजी है। मेरी समझ में इसका अर्थ केवल 'बिल्कुल बराबर' नहीं है, बल्कि 'इतना शक्तिशाली कि उसे आसानी से निर्णायक रूप से हराया न जा सके'। जब सामने वाला भी इतना ही सक्षम हो, तो युद्ध का परिणाम अनिश्चित हो जाता है, और इसी अनिश्चितता में सबसे बड़ा खतरा है।
कामंदक युद्ध को न तो निषिद्ध मानते हैं, न हर परिस्थिति में उचित। वे उसे परिस्थिति-सापेक्ष देखते हैं। लेकिन जब सामने 'समवीर्य' प्रतिद्वंद्वी हो, तो युद्ध के परिणाम का गणित धुँधला हो जाता है और यहीं धुँधलाहट उनकी चेतावनी का केंद्र है।
बराबरी - जब दोनों पलड़े गिर जाते हैं
इस श्लोक को पश्चिमी राजनीतिक दर्शन के "बैलेंस ऑफ पावर" सिद्धांत से जोड़कर देखा जा सकता है। कामंदक का तर्क आधुनिक सिद्धांत के समान नहीं है, लेकिन दोनों में एक साझा चिंता दिखाई देती है - प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का आकलन किए बिना संघर्ष में उतरना महँगा पड़ सकता है।
कामंदक का श्लोक इस सिद्धांत के सबसे ख़तरनाक पहलू को उजागर करता है: जब दो शक्तियाँ बराबर हों और टकरा जाएँ, तो संतुलन टूटता नहीं, दोनों पलड़े गिर जाते हैं।
थूसीडाइडीज़ के इतिहास में एक प्रसंग है, मेलियन डायलॉग। एथेंस के प्रतिनिधि मेलोस द्वीप के लोगों से कहते हैं: "ताकतवर वही करता है जो कर सकता है, और कमज़ोर वही सहता है जो सहना पड़ता है।" यह एकतरफ़ा ताकत की बात है। कामंदक द्विपक्षीय बराबरी की बात करते हैं। जब दोनों के पास बराबर ताकत हो, तब कौन "करता है" और कौन "सहता है"? जवाब है, दोनों सहते हैं, दोनों मरते हैं।
इतिहास गवाह है
महाभारत - कौरव और पांडव। दोनों पक्षों के पास विशाल सेनाएँ थीं, महान योद्धा थे, दैवीय अस्त्र-शस्त्र थे। अठारह दिन का युद्ध, अठारह अक्षौहिणी सेना का विनाश। कौरव पक्ष पूरी तरह समाप्त हुआ। पांडव "जीते" लेकिन किस क़ीमत पर? उनके पुत्र मारे गए, गुरु मारे गए, सगे-संबंधी मारे गए। युधिष्ठिर ने जब राजगद्दी पर बैठकर चारों ओर देखा, तो क्या देखा? ख़ाली सिंहासन, विधवाओं का रुदन, अनाथ बच्चे। यह "जीत" थी?
1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ। यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ - ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस - सब अपनी-अपनी क्षमताओं में एक-दूसरे को निर्णायक रूप से हराने में असमर्थ थीं। चार साल का युद्ध। एक करोड़ से ज़्यादा सैनिक मारे गए। चार साम्राज्य ध्वस्त हो गए। "जीतने" वाले भी इतने कमज़ोर हो गए कि बीस साल बाद फिर एक और विश्व युद्ध हुआ।
परमाणु युग का 'समवीर्य'
शीत युद्ध इस श्लोक का सबसे जीवंत आधुनिक उदाहरण है। अमेरिका और सोवियत संघ के पास एक-दूसरे को मिटाने की क्षमता थी - रणनीतिक भाषा में इसे 'Mutually Assured Destruction' (MAD) कहा गया। इसी भय ने दो महाशक्तियों को सीधे युद्ध से रोके रखा।
1998 के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। कारगिल, संसद हमला, मुंबई हमला, बालाकोट - हर बार युद्ध की आशंका बनी। परमाणु हथियारों ने प्रत्यक्ष युद्ध की कीमत को असाधारण रूप से बढ़ा दिया है। इस जोखिम ने हर बार निर्णयकर्ताओं को संयम बरतने के लिए मजबूर किया।
एक निजी हार
मैं एक क़िस्सा साझा करना चाहता हूँ, अपना ही। कुछ साल पहले मेरा एक क़रीबी दोस्त से झगड़ा हुआ। बात छोटी थी - किसी प्रोजेक्ट में क्रेडिट किसको मिले। दोनों ने बराबर मेहनत की थी, दोनों को लगता था कि "मेरा योगदान ज़्यादा है।" कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था।
बात बढ़ती गई। ईमेल्स कड़वे हुए, फ़ोन कॉल्स बंद हुईं, आख़िर में बोलचाल ही बंद हो गई। प्रोजेक्ट ठीक से पूरा नहीं हुआ, और दोस्ती भी ख़त्म।
बाद में जब मैंने कामंदकीय नीतिसार का यह श्लोक पढ़ा, तो मुझे अपनी कहानी दिखी। "समवीर्यौ" - दोनों बराबर के ज़िद्दी। "अन्योन्यं हतौ" - दोनों ने एक-दूसरे को तोड़ा। कोई नहीं जीता। बस एक अच्छी दोस्ती मरी।
अगर उस वक़्त मैंने यह श्लोक पढ़ा होता, तो शायद मैं पीछे हट जाता। शायद मैं कहता, "ठीक है, तेरा क्रेडिट, मुझे दोस्ती ज़्यादा क़ीमती है।" लेकिन अहंकार ने नहीं होने दिया।
यही कामंदक की बात का असली मतलब है - यह सिर्फ़ राजाओं और सेनाओं के लिए नहीं है। यह हम सबके लिए है।
अहंकार का खेल
बराबरी का संकट अक्सर शक्ति से कम और आत्म-मूल्यांकन से अधिक पैदा होता है। दोनों पक्ष अपने बल को बढ़ाकर और दूसरे के बल को घटाकर देखते हैं। युद्ध शुरू होने से पहले यही सबसे खतरनाक भूल होती है।
सुन्द और उपसुन्द दोनों को लगा, "मैं ज़्यादा ताकतवर हूँ, मैं जीतूँगा।" लेकिन वे "समवीर्य" थे - बराबर के। अहंकार कहता है, "मैं क्यों छोड़ूँ?" बुद्धि कहती है, "अगर नहीं छोड़ा, तो दोनों ख़त्म।"
बल का प्रयोग - कब और क्यों
भारतीय नीतिशास्त्र साम, दाम, दंड, भेद की बात करता है। बल का प्रयोग आमतौर पर उन उपायों के बाद आता है, पर ऐसी स्थिति में, जब सामने वाला 'समवीर्य' हो, केवल बल पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो जाता है। संधि करना कमज़ोरी नहीं है, यह बुद्धिमत्ता है। इतिहास में जो राजा संधि करके बचे, उन्होंने बाद में और ज़्यादा ताकतवर होकर वापसी की। और जो "मैं नहीं झुकूँगा" कहकर लड़े, उनमें से कई का नामोनिशान मिट गया।
सदियाँ बीतीं, पर प्रश्न वही है
कुछ लोग कहते हैं कि ये पुराने ग्रंथ अब आउटडेटेड हो गए हैं। तकनीक बदली है - तलवार की जगह मिसाइल आ गई, गदा की जगह ड्रोन। लेकिन युद्ध के कारण नहीं बदले - वही ज़मीन, वही अहंकार, वही भय।
सुन्द और उपसुन्द गदा और तलवार से लड़े। आज के 'सुन्द और उपसुन्द' परमाणु बम और साइबर हथियारों से लड़ सकते हैं, लेकिन नतीजे की अनिश्चितता, और दोतरफ़ा तबाही की संभावना, वही है।
'न किम्?' - असली सवाल
कामंदक का यह छोटा-सा श्लोक एक विशाल सत्य को समेटे हुए है - युद्ध का परिणाम हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता, और जब दोनों पक्ष बराबर के हों, तो जोखिम दोगुना हो जाता है। वे सिर्फ़ डराते नहीं, रास्ता भी दिखाते हैं - संधि, कूटनीति, विवेक। यह श्लोक उस पूरी चर्चा का एक हिस्सा है: एक चेतावनी जो बाक़ी उपायों को और ज़्यादा ज़रूरी बना देती है।
आज की दुनिया में जहाँ परमाणु हथियार हैं, जहाँ आर्थिक और साइबर युद्ध हैं, यह श्लोक पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है। क्योंकि अगर आज के "सुन्द और उपसुन्द" लड़े, तो सिर्फ़ वे दो नहीं मरेंगे।
मैं इस लेख को एक सवाल के साथ ख़त्म करता हूँ - वही सवाल जो कामंदक ने पूछा:
"सुन्दोपसुन्दाव् अन्योन्यं समवीर्यौ हतौ न किम्?"
"क्या समान बल वाले सुन्द और उपसुन्द ने एक-दूसरे को नहीं मारा?"
जवाब हम सबको पता है।
सवाल यह है, क्या हम अपनी किसी लड़ाई में उस उत्तर को याद रख पाएँगे?
क्योंकि कभी-कभी एक क़दम पीछे हटना हार नहीं होता।
कभी-कभी वही चीज़ बची हुई पूरी दुनिया होती है।
