विश्वास का रहस्य | कामंदकीय नीतिसार

किसी पर विश्वास करना मनुष्य के जीवन की सबसे स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है। विश्वास से संबंध बनते हैं, संकोच दूर होता है और काम भी सहज हो जाता है। लेकिन यही विश्वास यदि विवेक से अलग हो जाए, तो वह कमजोरी भी बन सकता है।

कामंदकीय नीतिसार के नवम सर्ग का ६६वाँ श्लोक इसी जटिलता की ओर संकेत करता है। इसमें विस्रम्भ को प्रियता और कार्यसिद्धि से जोड़ा गया है और इसके साथ इंद्र तथा दिति की कथा का उल्लेख किया गया है।

यहाँ विस्रम्भ को केवल 'विश्वास' कह देना पर्याप्त नहीं है। इसमें किसी के प्रति ऐसा घनिष्ठ भरोसा और निश्चिंतता भी शामिल है, जिसमें संदेह के लिए जगह कम रह जाती है।


विस्रम्भ यानी विश्वास – कामंदकीय नीतिसार 9.66 का चित्रण
विश्वास जहाँ प्रियता लाता है, वहीं अंधा विश्वास विनाश का द्वार भी है।

कामंदकीय नीतिसार ९.६६

विस्रम्भात् प्रियताम् एति विस्रम्भात् कार्यम् ऋच्छति ।

विस्रम्भेण हि देवेन्द्रो दितेर् गर्भम् अपातयत् ॥ ६६ ॥

सरल अर्थ है, विस्रम्भ से प्रियता प्राप्त होती है और विस्रम्भ के कारण कार्य सिद्ध होता है; इसी विस्रम्भ का सहारा लेकर देवराज इंद्र ने दिति के गर्भ को नष्ट किया।

श्लोक की विशेषता यह है कि इसमें एक ही शब्द के दो पक्ष सामने आते हैं। विश्वास व्यक्ति को निकट लाता है और उसी निकटता का उपयोग किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भी किया जा सकता है।

शब्दार्थ

  • विस्रम्भात् - विश्वास, घनिष्ठ भरोसे या निश्चिंत आत्मीयता के कारण
  • प्रियताम् - प्रियता, अपनापन
  • एति - प्राप्त करता है
  • कार्यम् - कार्य, उद्देश्य
  • ऋच्छति - प्राप्त करता है, पहुँचता है (यहाँ कार्य की प्राप्ति के अर्थ में)
  • विस्रम्भेण - विश्वास/घनिष्ठ भरोसे के द्वारा
  • हि - निश्चय ही, वास्तव में
  • देवेन्द्रः - देवताओं के राजा इंद्र
  • दितेः - दिति का
  • गर्भम् - गर्भ
  • अपातयत् - गिराया, पातित किया, नष्ट किया

यहाँ 'अपातयत्' को केवल 'गिरा दिया' समझना पर्याप्त नहीं होगा। प्रसंग में इसका अर्थ गर्भ को नष्ट करने की सक्रिय क्रिया से है, जो इंद्र ने अपनी रणनीति के तहत की।

भावार्थ

श्लोक का पहला चरण बताता है कि विश्वास मनुष्यों के बीच दूरी कम करता है। जब किसी व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि सामने वाला उस पर भरोसा करता है, तो संबंध में आत्मीयता आती है। इसी कारण विश्वास के माध्यम से किसी कार्य को पूरा करना भी आसान हो सकता है।

लेकिन दूसरे चरण में यही बात एक अलग रूप लेती है। दिति और इंद्र की कथा में इंद्र दिति के निकट रहते हैं, उसकी सेवा करते हैं और उसके विश्वास का पात्र बनते हैं। बाद में उसी निकटता से उन्हें वह अवसर मिलता है जिसकी उन्हें तलाश थी।

इसलिए श्लोक को केवल 'विश्वास अच्छा है' या 'विश्वास बुरा है' जैसे सरल निष्कर्ष में बाँधना ठीक नहीं होगा। उसका संकेत इससे अधिक सूक्ष्म है, विश्वास संबंधों को मजबूत करता है, लेकिन वही विश्वास यदि विवेक के बिना हो तो उसका दुरुपयोग भी किया जा सकता है।

इंद्र और दिति की कथा

दिति कश्यप ऋषि की पत्नी और दैत्यों की माता थीं। अपने पुत्रों के वध के बाद उनके मन में इंद्र के प्रति वैर उत्पन्न हुआ। उन्होंने ऐसे पुत्र की इच्छा की जो इंद्र का वध कर सके।

कश्यप ने उन्हें एक कठोर नियम और व्रत का पालन करने की शर्त बताई। दिति ने उस नियम का पालन आरंभ किया। इंद्र को जब इस उद्देश्य का पता चला, तो उन्होंने दिति की गतिविधियों पर नज़र रखनी शुरू कर दी।

कथा के अनुसार, इंद्र दिति की सेवा करने लगे और अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। दिति को उनकी ओर से कोई संदेह नहीं हुआ। अंततः एक दिन दिति पूरी तरह से नियम का पालन किए बिना सो गईं। इसी अवसर का लाभ उठाकर इंद्र उनके गर्भ में प्रवेश कर गए।

विष्णु पुराण के वर्णन में इंद्र वज्र से गर्भस्थ शिशु को पहले सात भागों में विभाजित करते हैं। फिर प्रत्येक भाग को सात-सात भागों में बाँट देते हैं। इस प्रकार कुल उनचास भाग होते हैं, जिन्हें आगे चलकर मरुत कहा गया।

भागवत पुराण में भी इस प्रसंग में गर्भ के सात भाग किए जाने और फिर प्रत्येक भाग को सात भागों में विभाजित करने का वर्णन मिलता है। वहाँ इनसे उनचास मरुतों की उत्पत्ति बताई गई है।

इस कथा को कामंदक के श्लोक से जोड़ने पर ध्यान विश्वास की उस शक्ति पर जाता है जिसके कारण व्यक्ति दूसरे के निकट पहुँच सकता है और उसकी सतर्कता कम हो सकती है। इंद्र ने कोई प्रत्यक्ष युद्ध नहीं किया, केवल एक माता के विश्वास को अपना हथियार बनाया – यही इस कथा का सबसे मार्मिक और चेतावनीपूर्ण पहलू है।

आज के जीवन में इसका अर्थ

कामंदक का ग्रंथ राजाओं और राज्यनीति को ध्यान में रखकर लिखा गया था, लेकिन मनुष्य के व्यवहार को लेकर उसकी कई बातें आज भी समझी जा सकती हैं।

व्यक्तिगत संबंधों में विश्वास आवश्यक है। हर संबंध संदेह के आधार पर नहीं चल सकता। लेकिन विश्वास का अर्थ यह भी नहीं कि व्यक्ति अपने विवेक का प्रयोग करना छोड़ दे।

व्यापार में किसी व्यक्ति या संस्था पर भरोसा किया जा सकता है, फिर भी महत्वपूर्ण निर्णयों की जाँच आवश्यक रहती है। डिजिटल दुनिया में भी यही बात लागू होती है; किसी परिचित नाम, फोन कॉल या संदेश को देखकर तुरंत विश्वास कर लेना हमेशा सुरक्षित नहीं है।

राजनीति में तो विश्वास की भूमिका और भी स्पष्ट है। शासन केवल शक्ति से नहीं चलता; जनता, सहयोगियों और संस्थाओं का विश्वास भी उसकी आधारशिला होता है। लेकिन राजनीति का इतिहास यह भी दिखाता है कि विश्वास और हित हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते।

राजनीति और जीवन में विश्वास की सीमा

कामंदकीय नीतिसार का संदेश यह नहीं है कि किसी पर विश्वास ही न किया जाए। ऐसा समाज न तो संभव है और न स्वस्थ।

बात विश्वास की सीमा पहचानने की है।

विश्वास कीजिए, लेकिन विवेक बनाए रखिए।

किसी को अपना मानना और उसे अपने बारे में सब कुछ बता देना दो अलग बातें हैं। किसी पर भरोसा करना और उसे बिना जाँच के हर निर्णय का अधिकार दे देना भी एक बात नहीं है।

यही अंतर शायद इस श्लोक को आज भी पढ़ने योग्य बनाता है। विश्वास मनुष्य को मनुष्य के करीब लाता है, लेकिन विवेक यह तय करता है कि उस निकटता की सीमा क्या होनी चाहिए।

निष्कर्ष

विस्रम्भ का अर्थ केवल विश्वास नहीं, बल्कि ऐसा घनिष्ठ भरोसा भी है जिसमें व्यक्ति दूसरे के प्रति निश्चिंत हो जाता है। कामंदक इसी भाव की शक्ति को सामने रखते हैं, विस्रम्भ से प्रियता मिलती है और कार्य सिद्ध होते हैं; लेकिन इंद्र और दिति की कथा यह भी दिखाती है कि विश्वास का लाभ उठाया जा सकता है।

इसलिए इस श्लोक का सबसे उपयोगी पाठ शायद यही है:

विश्वास संबंधों के लिए आवश्यक है, लेकिन विश्वास के साथ विवेक भी आवश्यक है।

किसी पर भरोसा करना कमजोरी नहीं है। कमजोरी तब बनती है, जब भरोसा इतना बढ़ जाए कि हम सामने वाले के व्यवहार को परखना ही छोड़ दें। जैसे दिति ने इंद्र की अत्यधिक सेवा को देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं, वैसे ही हमें अपने जीवन में किसी की अत्यधिक निकटता को परखना सीखना चाहिए।

यह पोस्ट मूल रूप से Indian Philosophy and Ethics पर प्रकाशित हुई है।
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