युद्ध शुरू करना केवल रणभूमि में सेना भेजने का निर्णय नहीं है। उसके साथ मनुष्य, धन, साधन और राज्य की स्थिरता भी दाँव पर लगती है। इसलिए किसी विजय से पहले एक सवाल खड़ा होता है: इस विजय की कीमत क्या होगी?
कामन्दकीय नीतिसार 9.73 इसी प्रश्न को सामने रखता है। कामन्दक युद्ध या विग्रह के साथ आने वाले क्षय, व्यय, आयास और वध जैसे दोषों की ओर ध्यान दिलाते हैं। राजा को संघर्ष का निर्णय उसके संभावित परिणामों को देखकर ही करना चाहिए।
श्लोक की एक खास बात यह भी है कि वह बड़ी हानि से बचने के लिए कुछ कठिनाई सह लेने की संभावना को स्वीकार करता है। यदि सीमित पीड़ा के बदले युद्ध से होने वाली बड़ी क्षति टाली जा सके, तो उस विकल्प पर विचार किया जा सकता है।
हालाँकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य और प्राचीन राजतंत्र समान राजनीतिक संस्थाएँ नहीं हैं। इसलिए इस श्लोक को वर्तमान संदर्भ में रखते समय उसके मूल राजनीतिक संदर्भ को ध्यान में रखना ज़रूरी है।
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| कामन्दक के अनुसार युद्ध का निर्णय केवल विजय को देखकर नहीं, बल्कि उससे होने वाली हानि को देखकर भी किया जाना चाहिए। |
कामन्दकीय नीतिसार 9.73 का मूल संस्कृत श्लोक
क्षयव्ययायासवधादिदोष-व्यपेक्षयान्वीक्षितसाधुकृत्यः ।
कामं तु पीडाम् अपि काञ्चिद् इच्छेन् न विग्रहं तत्प्रभवा हि दोषाः ॥ ७३ ॥
शब्दार्थ
- क्षय: हानि या कमी, विशेषतः मनुष्य और साधनों की
- व्यय: धन, अन्न और दूसरे संसाधनों का खर्च
- आयास: श्रम, कष्ट और अभियान से जुड़ी कठिनाई
- वध: मृत्यु या प्राणहानि
- आदि-दोष: इनसे जुड़े दूसरे नुकसान
- व्यपेक्षया: विचार करके, ध्यान में रखकर
- अन्वीक्षित: विचार किया हुआ, परखा हुआ
- साधुकृत्यः: उचित कार्य का विचार करने वाला
- पीडा: कष्ट या कठिनाई
- विग्रह: संघर्ष, शत्रुता या युद्ध
- तत्प्रभवाः दोषाः: उससे उत्पन्न होने वाले दोष
भावार्थ
राजा को विग्रह का निर्णय करते समय उससे होने वाली हानि, खर्च, श्रम, मृत्यु और दूसरे दोषों पर विचार करना चाहिए। यदि कुछ सीमित कठिनाई स्वीकार करके बड़े संघर्ष से बचा जा सकता हो, तो उस विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है, क्योंकि अनेक हानियाँ विग्रह से ही उत्पन्न होती हैं।
यहाँ जोर हर परिस्थिति में युद्ध से बचने पर नहीं है। बात यह है कि विग्रह का निर्णय उसके परिणामों को देखकर किया जाए।
युद्ध की चार कीमतें क्या हैं?
श्लोक में आए क्षय, व्यय, आयास और वध को युद्ध की चार कीमतों के रूप में समझना सुविधाजनक है। यह एक आधुनिक व्याख्यात्मक ढाँचा है; यह श्लोक का मूल वर्गीकरण नहीं है। जयमंगला-व्याख्या इन शब्दों को अलग-अलग प्रकार की हानियों के रूप में स्पष्ट करती है।
क्षय क्या है?
जयमंगला की व्याख्या में क्षय का संबंध वाहन और पुरुष आदि की हानि से जोड़ा गया है। संघर्ष में मनुष्य और युद्ध-साधनों की कमी होना इसका प्रमुख पक्ष है।
इसका अर्थ केवल युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या गिनना नहीं है। किसी अभियान में सेना की शक्ति कम होना, वाहनों या दूसरे सैन्य साधनों का नष्ट होना भी राज्य की क्षमता को प्रभावित करता है।
विजय की गणना करते समय युद्ध में होने वाली इस क्षति को अलग नहीं किया जा सकता।
व्यय किस ओर संकेत करता है?
व्यय का संबंध धन और दूसरे भौतिक संसाधनों के खर्च से है। अन्न, धन और युद्ध के लिए आवश्यक सामग्री लंबे संघर्ष में लगातार खर्च होती है।
जयमंगला-व्याख्या में हिरण्य और धान्य आदि की कमी को व्यय के अंतर्गत समझाया गया है। युद्ध के लिए सेना को तैयार रखना, उसे आगे बढ़ाना, भोजन और सामग्री पहुँचाना तथा अभियान को जारी रखना राज्य के संसाधनों पर दबाव डालता है।
युद्ध जितना लंबा चलता है, खर्च का प्रश्न उतना गंभीर होता जाता है।
आयास का अर्थ क्या है?
आयास को केवल आर्थिक खर्च मानना उचित नहीं होगा। टीका में प्रयाण के दौरान शीत, उष्णता और वर्षा जैसी कठिनाइयों का उल्लेख मिलता है। अर्थात् अभियान अपने साथ श्रम और शारीरिक कष्ट भी लाता है।
सेना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना, कठिन भूभाग से गुजरना और लंबे समय तक अभियान चलाना अपने आप में चुनौती है। इसके साथ मानसिक दबाव भी जुड़ सकता है, हालाँकि आधुनिक मनोवैज्ञानिक अर्थों को सीधे मूल टीका पर थोपना ठीक नहीं होगा।
इसलिए आयास को व्यापक रूप से अभियान और संघर्ष से जुड़ी कठिनाई के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है।
वध को अलग दोष क्यों माना गया है?
वध सबसे सीधी और गंभीर हानि है। युद्ध में मृत्यु होती है और राज्य अपनी मानव-शक्ति खोता है।
इसे क्षय से अलग रखकर देखने पर एक बात सामने आती है। हर हानि मृत्यु नहीं होती, लेकिन मृत्यु ऐसी क्षति है जिसे किसी आर्थिक गणना से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
आधुनिक दृष्टि से देखें तो किसी अनुभवी अधिकारी या महत्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु का प्रभाव उसकी व्यक्तिगत क्षति से आगे भी जा सकता है। लेकिन यह आधुनिक विस्तार है। मूल श्लोक में वध को युद्ध से उत्पन्न होने वाले दोष के रूप में सामने रखना ही मुख्य बात है।
चारों शब्द मिलकर युद्ध की लागत का एक व्यापक चित्र देते हैं। कुछ खोता है, कुछ खर्च होता है, अभियान कठिनाइयाँ लाता है और कुछ जीवन चले जाते हैं।
युद्ध से बचने के लिए कुछ पीड़ा सहने की बात क्यों कही गई है?
श्लोक का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है। कामन्दक ऐसी स्थिति की कल्पना करते हैं जिसमें राजा कुछ पीड़ा या कठिनाई स्वीकार करके विग्रह से बचने का विकल्प चुन सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर समझौता उचित है। न ही राज्य को अपने हितों की उपेक्षा करनी चाहिए। बात तुलनात्मक निर्णय की है।
यदि एक विकल्प में सीमित और नियंत्रित नुकसान है और दूसरे में लंबा संघर्ष, भारी खर्च तथा बड़ी जनहानि की आशंका है, तो दोनों को एक ही स्तर पर नहीं रखा जा सकता।
किसी विवाद को तत्काल सैन्य संघर्ष तक ले जाने के बजाय कुछ सीमित राजनीतिक या आर्थिक रियायत देकर सुलझाने का रास्ता उपलब्ध हो, तो राजा को उस विकल्प की कीमत भी देखनी चाहिए। रियायत आसान नहीं हो सकती, लेकिन युद्ध की संभावित हानि उससे कहीं बड़ी हो तो निर्णय का संतुलन बदल जाता है।
यही कारण है कि श्लोक में पीड़ा सहने की इच्छा को कमज़ोरी की तरह नहीं रखा गया। कभी-कभी छोटी कठिनाई स्वीकार करना बड़ी क्षति से बचने का साधन बन सकता है।
क्या कामन्दक युद्ध के विरोधी हैं?
इस एक श्लोक के आधार पर कामन्दक को युद्ध-विरोधी विचारक कहना उचित नहीं होगा।
कामन्दकीय नीतिसार में युद्ध, सैन्य तैयारी, अभियान और शत्रु के विरुद्ध विभिन्न उपायों पर चर्चा मिलती है। इसलिए 9.73 को युद्ध के सार्वभौमिक निषेध के रूप में पढ़ना पूरे ग्रंथ के राजनीतिक ढाँचे से मेल नहीं खाता।
इस श्लोक में सवाल यह नहीं है कि युद्ध अपने आप में अच्छा है या बुरा। सवाल है कि विग्रह करने से क्या परिणाम होंगे और उन परिणामों की कीमत कितनी होगी।
इसी कारण “न विग्रहं” को हर परिस्थिति में “युद्ध मत करो” कहना अर्थ को बहुत संकीर्ण कर देता है। यहाँ विग्रह से बचने की इच्छा उस स्थिति में सामने आती है जहाँ उससे उत्पन्न होने वाले दोषों पर विचार किया जा चुका है।
कामन्दक की राजनीति में निर्णय परिस्थिति से अलग नहीं है। राजा को सामने मौजूद विकल्पों और उनके परिणामों को देखना होगा।
युद्ध टालना कब रणनीतिक नीति हो सकता है?
युद्ध टालना तभी नीति बनता है जब उसके पीछे कोई स्पष्ट विचार हो। केवल डर के कारण संघर्ष से पीछे हटना और संभावित हानि को देखकर संघर्ष से बचना एक ही बात नहीं है।
श्लोक में व्यपेक्षया और अन्वीक्षित जैसे शब्द निर्णय से पहले परिणामों को देखने की ओर संकेत करते हैं। यदि विग्रह से होने वाला नुकसान लक्ष्य की तुलना में बहुत अधिक है, तो दूसरा रास्ता तलाशना समझदारी का काम हो सकता है।
व्यापक राजनीतिक संदर्भ में तत्काल कठिनाई स्वीकार करना कभी-कभी राज्य के संसाधनों को बचाने में सहायक हो सकता है। इसी तरह कोई लंबा संघर्ष ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसमें जीत हासिल करने के बाद भी राज्य पहले की तुलना में कमज़ोर हो जाए।
इसलिए युद्ध टालना अपने आप में निष्क्रियता नहीं है। वह कभी-कभी संसाधनों को बचाने, बेहतर परिस्थिति की प्रतीक्षा करने या बड़े नुकसान से बचने का निर्णय हो सकता है।
विग्रह से बचना और युद्ध से डरना एक ही बात नहीं है।
आज के संदर्भ में इस श्लोक को कैसे समझें?
आज की राज्य-व्यवस्था और प्राचीन राजतंत्र की राजनीतिक परिस्थितियाँ एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। इसलिए इस श्लोक को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सीधा सिद्धांत मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी इसकी एक सामान्य नीति-दृष्टि आज भी समझ में आती है। किसी बड़े संघर्ष का मूल्यांकन करते समय उसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणामों को देखना पड़ता है।
कामन्दक के चार शब्द इस संदर्भ में एक उपयोगी ढाँचा देते हैं। क्षय को मनुष्य और साधनों की हानि के रूप में देखा जा सकता है। व्यय संसाधनों और धन के खर्च की ओर ध्यान दिलाता है। आयास लंबे अभियान से जुड़ी कठिनाइयों को सामने लाता है। वध सीधे जीवन की क्षति की याद दिलाता है।
लेकिन यह आधुनिक युद्ध-अध्ययन का सिद्धांत नहीं है। यह एक प्राचीन राजनीतिक ग्रंथ के एक श्लोक को वर्तमान अनुभव की रोशनी में पढ़ने का तरीका है।
आधुनिक पाठक के लिए इसकी उपयोगिता शायद इसी प्रश्न में है: किसी संघर्ष की सफलता मापते समय क्या केवल तत्काल परिणाम देखा जाए, या उसकी पूरी कीमत भी गिनी जाए?
राजा की बुद्धिमत्ता की कसौटी क्या है?
इस श्लोक में राजा की बुद्धिमत्ता किसी एक गुण से नहीं मापी जाती। उसे परिस्थिति को देखना है, संभावित नुकसान को समझना है और फिर उचित निर्णय लेना है।
साधुकृत्यः को बहुत दूर तक खींचकर किसी आधुनिक रणनीतिक सिद्धांत का नाम देना ठीक नहीं होगा। यहाँ इसे सरल रूप में उचित कार्य का विचार करने वाला समझना पर्याप्त है।
राजा के सामने युद्ध का विकल्प हो तो उसे यह देखना होगा कि उससे राज्य को क्या मिलेगा और क्या खोना पड़ेगा। विजय की संभावना महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेली कसौटी नहीं है।
युद्ध शुरू करने से पहले एक सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है: जीतने के बाद राज्य के पास क्या बचेगा?
यदि विजय के बाद सेना कमज़ोर हो गई, राजकोष पर भारी दबाव पड़ गया, महत्वपूर्ण लोग मारे गए और राज्य लंबे समय तक अस्थिर रहा, तो केवल विजय का तथ्य पूरी कहानी नहीं बताता।
यहीं कामन्दक की दूरदर्शिता दिखाई देती है। राज्य के साधनों को पहचानना और उन्हें अनावश्यक रूप से नष्ट न करना भी शासन-कौशल का हिस्सा है।
इस अर्थ में 9.73 किसी शांतिवादी घोषणा से अधिक निर्णय की सावधानी का श्लोक है।
निष्कर्ष
कामन्दकीय नीतिसार 9.73 युद्ध के सामने खड़े राजा को उसके संभावित लाभ के साथ उसकी कीमत भी देखने को कहता है। क्षय, व्यय, आयास और वध युद्ध से जुड़ी अलग-अलग हानियों को सामने लाते हैं।
श्लोक हर परिस्थिति में युद्ध से बचने का आदेश नहीं देता। उसका जोर विग्रह से पहले उसके परिणामों पर विचार करने पर है। यदि कुछ सीमित कठिनाई स्वीकार करके बड़ी हानि टाली जा सकती है, तो उस रास्ते पर भी विचार होना चाहिए।
किसी राज्य की शक्ति केवल युद्ध करने की क्षमता में नहीं है। दूरदर्शिता इस बात में भी है कि वह कब युद्ध को आवश्यक समझे और कब उसकी कीमत देखकर दूसरा रास्ता चुने।
कामन्दकीय नीतिसार की इस शृंखला में अगले श्लोक को भी मूल पाठ, टीका और सरल हिंदी के आधार पर समझिए।
