नीतिसार 9.74: युद्ध टालें, शक्ति बचाएँ

राजनीति में संघर्ष कभी-कभी टाला नहीं जा सकता। लेकिन क्या हर विवाद का उत्तर संघर्ष ही होना चाहिए?कामन्दकीय नीतिसार 9.74 इसी प्रश्न को बहुत व्यावहारिक ढंग से सामने रखता है।

कामन्दक का ध्यान केवल युद्ध के परिणाम पर नहीं है। वे उस पूरे जीवन-जगत को देखते हैं जो संघर्ष के कारण संकट में आ सकता है। पत्नी, अपना शरीर, बंधु-मित्र और धन-संपत्ति-इन सबकी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। और यदि विग्रह बार-बार हो, तो इन पर भय और चिंता का भाव बना रहता है।

इसी संदर्भ में श्लोक का अंतिम शब्द महत्वपूर्ण हो जाता है: अतिविग्रही। चेतावनी केवल विग्रह करने से नहीं, बल्कि आवश्यकता से अधिक या अनुचित रूप से विग्रह की ओर बढ़ने से है।

जयमङ्गला टीका भी इसी दिशा में संकेत करती है। इसलिए इस श्लोक को केवल “युद्ध बुरा है” जैसे सामान्य कथन में सीमित करना ठीक नहीं होगा। इसका प्रश्न अधिक व्यावहारिक है: किस परिस्थिति में संघर्ष करना उचित है और कब उससे बचना ही बुद्धिमानी है?

कामन्दकीय नीतिसार 9.74 में अतिविग्रह से बचने की नीति
बार-बार के विग्रह से जीवन, संबंध, धन और सुरक्षा-सभी पर संकट आ सकता है।

कामन्दकीय नीतिसार 9.74 में अतिविग्रह को लेकर क्या चेतावनी दी गई है?

श्लोक की शुरुआत उन वस्तुओं से होती है जिनकी हानि किसी शासक के लिए सबसे गंभीर हो सकती है। अंत में उसी आधार पर विवेकपूर्ण नीति का निष्कर्ष दिया गया है।

मूल संस्कृत श्लोक

कलत्रम् आत्मा सुहृदो धनानि वृथा भवन्तीह निमेषमात्रात् ।
मुहुर् मुहुश् चाकुलितानि तानि तस्मान् न विद्वान् अतिविग्रही स्यात् ॥ ७४ ॥

शब्दार्थ

  • कलत्रम् = पत्नी, प्राणवल्लभा स्त्री

  • आत्मा = अपना शरीर, स्वकाय

  • सुहृदः = बंधु और मित्र

  • धनानि = धन-संपत्ति, रत्न आदि

  • वृथा भवन्ति = निष्फल या व्यर्थ हो जाते हैं

  • निमेषमात्रात् = एक क्षण में, पलक झपकते ही

  • मुहुः मुहुः = बार-बार

  • आकुलितानि = भय और चिंता से व्याकुल

  • तस्मात् = इसलिए

  • विद्वान् = नीतिशास्त्र का ज्ञाता, विवेकशील व्यक्ति

  • अतिविग्रही = आवश्यकता से अधिक या अनुचित रूप से विग्रह करने वाला

  • स्यात् = होना चाहिए

भावार्थ

युद्ध या विग्रह की स्थिति में पत्नी, अपना शरीर या जीवन, बंधु-मित्र और धन-संपत्ति ये सब बहुत कम समय में संकट में पड़ सकते हैं और उनका प्रयोजन निष्फल हो सकता है। बार-बार विग्रह होने पर ये सभी विग्रह के भय से लगातार व्याकुल रहते हैं। इसलिए नीतिशास्त्र का ज्ञाता व्यक्ति को अतिविग्रह करने वाला नहीं होना चाहिए।

जयमङ्गला टीका क्या स्पष्ट करती है?

टीकाकार सबसे पहले श्लोक में आए प्रमुख शब्दों का अर्थ खोलते हैं।

कलत्रम् शब्द से वे ‘प्राणवल्लभं स्त्रीजनः’ का संकेत लेते हैं, अर्थात प्रिय पत्नी या स्त्री। आत्मा का अर्थ यहाँ अमूर्त आत्मा नहीं, बल्कि स्वकाय यानी अपना शरीर किया गया है। सुहृदः से बंधु और मित्र का बोध होता है, जबकि धनानि से रत्न आदि धन-संपत्ति का बोध होता है।

इसके बाद टीका बताती है कि ये सब “वृथा भवन्ति”, अर्थात निरर्थक या निष्फल हो सकते हैं। इसके पीछे शस्त्र-प्रहार से जीवन चले जाने और संबंधित कार्यों के पूर्ण न हो पाने की स्थिति बताई गई है।

“निमेषमात्रादेव” इस हानि की तीव्रता को सामने रखता है। परिस्थिति बदलने में बहुत समय नहीं लगता। लेकिन टीका का अगला हिस्सा और भी महत्वपूर्ण है। “मुहुर्मुहुश्च विग्रहे सति आकुलितानि” में बताया गया है कि बार-बार विग्रह होने पर कलत्र आदि विग्रह के भय से बार-बार व्याकुल रहते हैं। अर्थात यहाँ केवल वास्तविक हानि की बात नहीं है। संघर्ष के भय का लगातार बने रहना भी महत्वपूर्ण है। इसी के बाद निष्कर्ष आता है:

“तस्मात् कारणात् विद्वान् नीतिशास्त्रवित् अतिविग्रही विरोधकारी स्यान्न च।”

अर्थात नीतिशास्त्र को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति अत्यधिक विरोध या विग्रह करने वाला न हो।

टीका के अंत में इसका आशय और स्पष्ट किया गया है:

“न्यायतः समायातविग्रहं परिहरेदित्यर्थः।”

इसका आशय यह है कि जो विग्रह उचित आधार से उत्पन्न न हुआ हो, उससे बचना चाहिए। इसलिए श्लोक का केंद्र संघर्ष का पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि अनावश्यक या अनुचित विग्रह से बचने का विवेक है।

कलत्र, आत्मा, सुहृद और धन को एक साथ क्यों रखा गया है?

यह केवल चार वस्तुओं की सूची नहीं है; यह शासक के जीवन के अलग-अलग आधारों को सामने रखती है।

कलत्रम् निजी और पारिवारिक जीवन से जुड़ा है। आत्मा, टीका के अनुसार, स्वकाय स्वयं शासक का शरीर का संकेत है, यानी उसके जीवन का। सुहृदः उसके बंधु-मित्रों और सहयोगी संबंधों की ओर संकेत करते हैं। धनानि शब्द आर्थिक संसाधनों का संकेत करता है।

इस तरह एक ही श्लोक में निजी जीवन, शारीरिक सुरक्षा, संबंध और संपत्ति चारों सामने आ जाते हैं। यही बात “वृथा भवन्ति” को भी अधिक अर्थपूर्ण बनाती है। युद्ध में केवल धन का नाश नहीं होता। व्यक्ति स्वयं जीवित न रहे तो उसके अनेक कार्य अधूरे रह जाते हैं। मित्र और संबंधी भी संकट में आ सकते हैं। धन-संपत्ति भी उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाती जिसके लिए वह संचित की गई थी।

इसलिए कामन्दक संघर्ष की कीमत को केवल रणभूमि की हानि में नहीं मापते। इसे एक सरल स्थिति से समझ सकते हैं। किसी शासक के सामने सीमित महत्व का विवाद है। वह उसे बातचीत या किसी अन्य राजनीतिक उपाय से सुलझा सकता है। लेकिन यदि वह हर बार शक्ति-प्रयोग का रास्ता चुनता है, तो एक छोटे विवाद की कीमत धीरे-धीरे बड़ी हो सकती है।

यहीं श्लोक का व्यावहारिक प्रश्न सामने आता है:

क्या हर संघर्ष उस लाभ के योग्य है जिसके लिए उसे शुरू किया जा रहा है?

कामन्दकीय दृष्टि में बुद्धिमान शासक को इस प्रश्न से बचना नहीं चाहिए।

विग्रह से होने वाली हानि केवल युद्धभूमि तक सीमित क्यों नहीं है?

श्लोक का एक छोटा-सा पद इस पूरे विचार को गहरा कर देता है:

“मुहुर् मुहुश् चाकुलितानि।”

इसका अर्थ है बार-बार आकुल होना। यदि बात केवल युद्ध में होने वाली मृत्यु या संपत्ति की हानि तक सीमित होती, तो श्लोक का संदेश सीधा होता। लेकिन कामन्दक बार-बार उत्पन्न होने वाले भय को भी सामने रखते हैं।

विग्रह शुरू होने से पहले भी उसके परिणामों की चिंता हो सकती है। संघर्ष जारी रहे तो यह चिंता बनी रह सकती है। और यदि संघर्ष बार-बार हो, तो अस्थिरता एक स्थायी स्थिति का रूप ले सकती है।

जयमङ्गला टीका इसी कारण विग्रहभय का उल्लेख करती है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। युद्ध की वास्तविक हानि और युद्ध का भय एक ही चीज नहीं हैं। फिर भी दोनों का राजनीतिक महत्व है। वास्तविक हानि जीवन और संसाधनों को प्रभावित करती है, जबकि लगातार भय सुरक्षा और स्थिरता को प्रभावित करता है।

यही कारण है कि “अतिविग्रही” शब्द केवल युद्धप्रियता का संकेत नहीं देता। इसमें ऐसी प्रवृत्ति का विचार है जिसमें संघर्ष आवश्यकता से अधिक बढ़ता या बार-बार दोहराया जाता है।

कामन्दक के लिए विवेकपूर्ण शासक वह नहीं है जो हर स्थिति में पीछे हट जाए। वह यह समझने वाला है कि संघर्ष की कीमत केवल उस क्षण की नहीं होती जब शस्त्र उठते हैं।

क्या यह श्लोक हर प्रकार के युद्ध का विरोध करता है?

नहीं, ऐसा निष्कर्ष उचित नहीं है। यह निष्कर्ष इस श्लोक के शब्दों और टीका, दोनों को बहुत संकीर्ण अर्थ में पढ़ने से निकल सकता है।

यहाँ ध्यान “अतिविग्रही” पर होना चाहिए। ‘अति’ शब्द स्वयं अतिरेक का संकेत देता है। इसलिए श्लोक का लक्ष्य विग्रह का हर रूप नहीं, बल्कि आवश्यकता से अधिक या अनुचित विग्रह है। जयमङ्गला टीका का अंतिम वाक्य इस दिशा में विशेष रूप से उपयोगी है:

“न्यायतः समायातविग्रहं परिहरेदित्यर्थः।”

अर्थात टीका का आशय ऐसे विग्रह से बचने का है जो उचित आधार के बिना सामने आए। इसलिए दो स्थितियों को अलग रखना जरूरी है।

पहली स्थिति है, ऐसा संघर्ष जिसे राजनीतिक परिस्थिति में आवश्यक समझा गया हो। दूसरी स्थिति यह है कि बिना पर्याप्त कारण के विरोध और विग्रह की ओर बढ़ा जाए। श्लोक की चेतावनी दूसरी प्रवृत्ति के विरुद्ध अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

इसलिए “कामन्दक युद्ध के विरोधी थे” कहना इस एक श्लोक से सिद्ध नहीं होता। अधिक सावधान निष्कर्ष यह है कि कामन्दक शासक को अतिविग्रह से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि संघर्ष का प्रभाव उसके जीवन, संबंधों और संपत्ति तक फैल सकता है। यही इस श्लोक की राजनीतिक समझ है।

क्या इस श्लोक में नियति की जगह मानवीय विवेक के लिए भी स्थान है?

यह प्रश्न संक्षेप में ही सही, फिर भी श्लोक की प्रकृति समझने के लिए उपयोगी है।

“निमेषमात्रात्” बताता है कि परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदल सकती हैं। शासक हर परिणाम को अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता। लेकिन अंतिम सलाह “विद्वान्” को दी गई है। यानी निर्णय लेने वाले व्यक्ति के विवेक को महत्व दिया गया है।

यदि परिणाम पूरी तरह पूर्वनिर्धारित होते, तो अतिविग्रह से बचने की सलाह का कोई विशेष अर्थ नहीं रहता। यहाँ विचार यह है कि अनिश्चित परिस्थितियों में भी व्यक्ति अपने निर्णयों को अधिक विवेकपूर्ण बना सकता है।

इसलिए इसे नियतिवाद का सिद्धांत कहना उचित नहीं होगा। श्लोक का व्यावहारिक संकेत इतना भर है कि जब संघर्ष के परिणाम तेजी से और गंभीर रूप से बदल सकते हों, तब बिना पर्याप्त कारण संघर्ष बढ़ाना बुद्धिमानी नहीं है।

आज के संदर्भ में अतिविग्रह से बचने की नीति को कैसे समझें?

इस श्लोक को आधुनिक संदर्भ में रखते समय सावधानी जरूरी है। इसे सीधे आज की हर संस्था, कंपनी या निजी संबंध पर लागू करना इसके मूल राजनीतिक संदर्भ को कमजोर कर सकता है।

फिर भी इसका निर्णय-संबंधी प्रश्न आज भी समझ में आता है। किसी बड़े संघर्ष के सामने पहला सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या हम जीत सकते हैं?”

इसके साथ यह भी देखना चाहिए:

  • इस संघर्ष की आवश्यकता कितनी है?

  • इसकी कीमत क्या हो सकती है?

  • इसका प्रभाव कितने समय तक रह सकता है?

  • क्या कोई कम हानिकारक रास्ता उपलब्ध है?

यह आधुनिक व्याख्या है, मूल श्लोक का शब्दशः कथन नहीं।

कामन्दक के श्लोक में पत्नी, अपना शरीर, बंधु-मित्र और धन एक साथ इसलिए आते हैं कि निर्णय की कीमत केवल निर्णय लेने वाले तक सीमित नहीं रहती। उसके आसपास का जीवन भी प्रभावित हो सकता है।

इसीलिए कभी-कभी पीछे हटना कमजोरी नहीं होता। वह परिस्थिति को देखकर लिया गया निर्णय हो सकता है। और कभी संघर्ष करना भी अनिवार्य हो सकता है। इस श्लोक का संदेश उस संभावना को नकारना नहीं है। उसका प्रश्न अधिक सीमित और अधिक व्यावहारिक है:

क्या जिस संघर्ष को हम चुन रहे हैं, वह वास्तव में इतना आवश्यक है कि उसके संभावित नुकसान को स्वीकार किया जा सके?

निष्कर्ष

कामन्दकीय नीतिसार 9.74 में संघर्ष की कीमत को बहुत ठोस रूप में सामने रखा गया है। पत्नी, अपना शरीर, बंधु-मित्र और धन-संपत्ति ये सभी विग्रह के कारण संकट में पड़ सकते हैं। बार-बार संघर्ष होने से इन पर भय और चिंता भी बनी रहती है। इसलिए जयमङ्गला टीका के आलोक में श्लोक का संदेश अनावश्यक या अनुचित विग्रह से बचने और राजनीतिक निर्णय में विवेक रखने का है।

कामन्दक की बात का सार इतना है कि शक्ति होना और हर समय शक्ति का प्रयोग करना एक बात नहीं है। बुद्धिमान शासक संघर्ष की संभावना से डरता नहीं, लेकिन उसकी कीमत को नज़रअंदाज़ भी नहीं करता। अतिविग्रह से बचना इसी विवेक का हिस्सा है।

क्या आपको लगता है कि किसी संघर्ष की सफलता से पहले उसकी कीमत पर विचार करना भी राजनीति का ज़रूरी हिस्सा है? अपनी राय टिप्पणी में साझा करें।

यह पोस्ट मूल रूप से Indian Philosophy and Ethics पर प्रकाशित हुई है।
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