बलवान का विश्वास कैसे जीतें?

कामंदकीय नीतिसार भारतीय नीतिशास्त्र का एक प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसमें राजनीति, प्रशासन और व्यवहार-कुशलता के सूत्र संकलित हैं। इसका नवम सर्ग संधि-संबंधी निर्देशों को समर्पित है। इस सर्ग का चौंसठवाँ श्लोक विशेष रूप से उस स्थिति का वर्णन करता है जब कोई अपने से अधिक शक्तिशाली पक्ष के साथ समझौता करने को विवश होता है। यह श्लोक केवल संधि करने की बात नहीं करता, वरन संधि के बाद के आचरण का भी मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है; और यही इसकी विशिष्टता है।

मूल श्लोक एवं पदच्छेद

बलीयसाभिसन्धाय तं प्रविश्य प्रयत्नवान् ।
तथासावुपगन्तव्यो यथा विस्रम्भम् आप्नुयात् ॥ ६४ ॥
कामंदकीय नीतिसार नवम सर्ग श्लोक 64 - ताड़पत्र पर संस्कृत पाठ एवं पारंपरिक दीपक
कामंदकीय नीति का मूल सूत्र: बलवान पक्ष से संधि और विश्वास-प्राप्ति का मार्ग

पदच्छेद

  • बलीयसाभिसन्धाय - बलीयसा + अभिसन्धाय
  • तं प्रविश्य - तम् + प्रविश्य
  • प्रयत्नवान् - प्रयत्नवान्
  • तथासौ - तथा + असौ
  • उपगन्तव्यः - उपगन्तव्यः
  • यथा - यथा
  • विस्रम्भम् - विस्रम्भम्
  • आप्नुयात् - आप्नुयात्

शब्दार्थ और व्याकरणिक विवेचन

श्लोक के प्रत्येक पद का अर्थ एवं व्याकरणिक स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है, क्योंकि नीति-सूत्रों का आशय अक्सर व्याकरणिक बारीकियों में छिपा होता है। संक्षेप में शब्दार्थ इस प्रकार हैं-

  • बलीयसा - अधिक बलवान के साथ
  • अभिसन्धाय - संधि करके
  • तम् - उस (बलवान पक्ष) को
  • प्रविश्य - प्रवेश करके, निकट जाकर
  • प्रयत्नवान् - प्रयास में तत्पर, प्रयत्नशील
  • तथा - उस प्रकार
  • असौ - वह (बलवान पक्ष)
  • उपगन्तव्यः - संपर्क में जाना चाहिए, पहुँचना चाहिए
  • यथा - जिससे
  • विस्रम्भम् - विश्वास, भरोसा
  • आप्नुयात् - प्राप्त करे

भावार्थ

श्लोक का आशय संक्षेप में यह है-

जब कोई प्रयत्नशील व्यक्ति या राजा अपने से अधिक बलशाली पक्ष के साथ संधि कर लेता है, तो उसे संधि के बाद उस बलवान पक्ष के पास जाना चाहिए, उसके परिवेश में प्रवेश करना चाहिए और इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए कि वह बलवान पक्ष का विश्वास प्राप्त कर सके।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्लोक संधि को अंतिम कदम नहीं मानता; वह तो केवल प्रारम्भ है। मुख्य लक्ष्य तो ‘विस्रम्भ’ अर्थात विश्वास की प्राप्ति है, जो निरंतर प्रयास और उचित आचरण से ही संभव होती है।

प्रमुख पदों का विश्लेषण

‘बलीयसा’ - शक्ति-अंतर की पहचान

श्लोक का आरम्भ ‘बलीयसा’ से होता है। यह पद तुलनात्मक दृष्टि से अधिक शक्तिशाली पक्ष को इंगित करता है। इसमें निहित है कि यहाँ दो पक्षों के बीच सामर्थ्य की असमानता है। यह कोई सामान्य संधि का प्रकरण नहीं, वरन विषम परिस्थिति का प्रकरण है, जहाँ एक पक्ष दूसरे पर आश्रित या उसके अधीन होने की स्थिति में है।

‘बलीयस्’ प्रत्यय (ईयसुन्) तुलनात्मक अर्थ में आता है; जैसे ‘गरीयान्’ (अधिक गुरु), ‘लघीयान्’ (अधिक लघु)। यहाँ ‘बलीयस्’ का अर्थ है ‘अधिक बल वाला’। यह पद केवल शक्ति का बोध नहीं कराता, वरन उस स्थिति की गम्भीरता को भी रेखांकित करता है, जहाँ नीति-निर्धारण में विशेष सावधानी अपेक्षित है।

‘अभिसन्धाय’ - सोच-समझकर किया गया समझौता

‘अभिसन्धाय’ में ‘अभि’ और ‘सम्’ उपसर्ग लगकर ‘धा’ धातु से ‘ल्यप्’ प्रत्यय हुआ है। ‘ल्यप्’ प्रत्यय पूर्वकालिक क्रिया को दर्शाता है, अर्थात पहले संधि करना, फिर आगे की क्रियाएँ।

‘अभि’ उपसर्ग विशेष अर्थ में ‘सामने’ या ‘उद्देश्यपूर्वक’ का बोध कराता है। अतः ‘अभिसन्धाय’ का अर्थ केवल ‘संधि करके’ नहीं, वरन ‘किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखकर संधि करके’ होता है। यह सूचित करता है कि संधि आँख मूँदकर नहीं, वरन विवेकपूर्वक की जानी चाहिए।

‘प्रविश्य’ और ‘उपगन्तव्यः’ - निकटता का निर्देश

ये दोनों पद मिलकर एक विशेष निर्देश देते हैं; संधि के बाद भी दूरी नहीं बनानी चाहिए, वरन निकटता बढ़ानी चाहिए।

‘प्रविश्य’ (प्र + विश्) का अर्थ है, अंदर जाकर, निकट पहुँचकर। यह केवल शारीरिक निकटता की बात नहीं, वरन संबंधों की निकटता का भी द्योतक है।

‘उपगन्तव्यः’ (उप + गम् + तव्यत्) में विधि-अर्थ है; ‘जाना चाहिए’ या ‘संपर्क में रहना चाहिए’। ‘तव्यत्’ प्रत्यय से कर्तव्य-बोध होता है, अर्थात यह कोई विकल्प नहीं, आवश्यकता है।

इन दोनों पदों का सह-अस्तित्व बताता है कि बलवान पक्ष के साथ संधि के बाद उससे दूरी बनाकर नहीं, वरन निरंतर संपर्क में रहकर ही संबंध सुदृढ़ किए जा सकते हैं।

‘प्रयत्नवान्’ - सतत प्रयास की अनिवार्यता

श्लोक में कर्ता के लिए ‘प्रयत्नवान्’ विशेषण आया है। ‘प्रयत्न’ का अर्थ है, प्रयास, उद्योग, सावधानी। ‘मतुप्’ प्रत्यय से युक्त यह विशेषण बताता है कि जो इस आचरण को अपनाए, उसमें प्रयत्न का भाव होना चाहिए; वह प्रयत्नशील हो।

यह पद बहुत कुछ कह जाता है, बलवान पक्ष का विश्वास अर्जित करना कोई सहज कार्य नहीं। यह आलस्य, प्रमाद या उपेक्षा से संभव नहीं। इसके लिए निरंतर, सजग और सूक्ष्म प्रयास की आवश्यकता है। ‘प्रयत्नवान्’ होने का अर्थ है कि व्यक्ति अपने आचरण, वाणी और व्यवहार में निरंतर सतर्क रहे।

‘विस्रम्भम् आप्नुयात्’ - विश्वास ही अंतिम लक्ष्य

‘विस्रम्भ’ का शाब्दिक अर्थ है विश्वास, भरोसा, निष्कपटता से उत्पन्न आत्मीय भाव। यह केवल बाहरी सहमति नहीं, वरन मानसिक और भावनात्मक स्तर पर स्थापित होने वाला संबंध है।

‘आप्नुयात्’ विधिलिङ् में है; ‘प्राप्त करे’ अर्थात यह वांछनीय और अपेक्षित है कि यह स्थिति बने।

श्लोक का समग्र लक्ष्य ‘विस्रम्भ’ है। संधि, निकटता, प्रयास ये सब माध्यम हैं। मूल उद्देश्य बलवान पक्ष के मन में इस प्रकार का विश्वास उत्पन्न करना है कि वह शंका, संदेह या अविश्वास के स्थान पर आत्मीयता और भरोसे का अनुभव करे।

नीति का क्रमिक प्रवाह

श्लोक में वर्णित पदों का क्रम किसी आकस्मिकता का परिणाम नहीं, अपितु एक गहन सुनियोजित अनुक्रम है, जो कूटनीतिक प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप में स्पष्ट करता है। यह अनुक्रम सर्वप्रथम बलवान पक्ष के साथ ‘बलीयसा अभिसन्धाय’ अर्थात संधि स्थापित करने का निर्देश देता है, जिसके पश्चात ‘तं प्रविश्य’ उस बलवान पक्ष के निकट जाकर संबंध की प्रारंभिक नींव रखी जाती है। इसके उपरांत, ‘प्रयत्नवान्’ बनकर निरंतर ‘उपगन्तव्यः’ रहते हुए संबंधों को सक्रिय बनाए रखना आवश्यक है, और अंतिम तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है ‘यथा विस्रम्भम् आप्नुयात्’, जिसमें ऐसा आचरण करना होता है जिससे बलवान पक्ष का पूर्ण विश्वास प्राप्त हो सके। यह दर्शनीय है कि संधि मात्र एक आरंभिक बिंदु है, न कि अंतिम लक्ष्य; वास्तविक कूटनीतिक कौशल तो इसके उपरांत ही प्रारम्भ होता है, जहाँ केवल औपचारिक समझौता पर्याप्त नहीं, बल्कि उस समझौते को स्थायित्व प्रदान करने हेतु निरंतर आचरण-नियमों का पालन और विश्वास निर्माण की प्रक्रिया अपरिहार्य है। वस्तुतः, यह श्लोक राजनय के चिरकालिक सिद्धांतों को उजागर करता है, जहाँ संबंधों की गहराई और स्थायित्व हेतु सतत् प्रयत्न तथा नैतिक आचरण ही सफलता की कुंजी है।

श्लोक की व्याख्या की सीमाएँ

किसी भी शास्त्रीय सूत्र की व्याख्या में संयम आवश्यक है। इस श्लोक की सीमा यह है कि-

  • यह केवल उस स्थिति का निर्देश देता है जहाँ पहले से संधि हो चुकी हो। यह संधि करने या न करने के पक्ष-विपक्ष पर विचार नहीं करता।
  • यह ‘विस्रम्भ’ प्राप्ति के बाद के आचरण पर कुछ नहीं कहता; वह किसी अन्य सूत्र का विषय है।
  • यह केवल बलवान पक्ष के साथ व्यवहार की बात करता है; समान या कमजोर पक्ष के साथ व्यवहार की नीति अन्य श्लोकों में वर्णित है।

व्याख्या करते समय श्लोक के कथ्य-क्षेत्र से बाहर न जाना ही शास्त्रीय मर्यादा का पालन है।

निष्कर्ष

कामंदकीय नीतिसार का यह श्लोक शक्ति-विषमता की स्थिति में आचरण का एक स्पष्ट, संक्षिप्त और व्यावहारिक सूत्र प्रस्तुत करता है। यह न केवल संधि करने की बात कहता है, वरन संधि के बाद निकटता, प्रयास और विश्वास-स्थापना के माध्यम से संबंध को सुदृढ़ बनाने की अपेक्षा भी व्यक्त करता है।

‘बलीयसा’ से ‘विस्रम्भम् आप्नुयात्’ तक का यह सफर नीति-निर्धारण की एक पूरी प्रक्रिया है, जहाँ प्रारम्भ में शक्ति-अंतर की पहचान है, मध्य में निकटता और प्रयास हैं, और अंत में विश्वास की प्राप्ति है। यह श्लोक यह संदेश देता है कि विषम परिस्थितियों में केवल बाहरी समझौता ही पर्याप्त नहीं, वरन आन्तरिक विश्वास स्थापित करना ही स्थायित्व का मूल आधार है।

यह पोस्ट मूल रूप से Indian Philosophy and Ethics पर प्रकाशित हुई है।
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