प्राचीन भारतीय राजनीतिशास्त्र और कूटनीति में राजा के कर्तव्यों तथा युद्धकला का सूक्ष्म अध्ययन मिलता है। जब कोई राज्य सीमा विस्तार या शत्रु पर आक्रमण की योजना बनाता है, तो केवल सेना भेजना पर्याप्त नहीं होता; कूटनीतिक और सामरिक चालों का सही चुनाव आवश्यक होता है। इसी संदर्भ में कामन्दक द्वारा रचित कामन्दकीय नीतिसार के एकादश सर्ग के श्लोक 2 में कामन्दकीय नीतिसार यान के पाँच प्रकारों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह वर्णन षाड्गुण्य तथा यानासनद्वैधीभावसंश्रय जैसी राजनीतिक अवधारणाओं से जुड़ा है, जिनमें विग्रह और संधि की स्थितियों के अनुसार अभियान का स्वरूप तय होता है। विगृह्ययान शत्रुता या आक्रमण की स्थिति में, सन्धाययान संधि या मित्रता के आधार पर, सम्भूययान साझा अभियान के रूप में, प्रसङ्गयान अवसर के अनुसार किसी अन्य लक्ष्य की ओर और उपेक्षायान उपेक्षा की नीति से संचालित होते हैं। इस प्रकार कामन्दकीय नीतिसार यान के पाँच प्रकार विगृह्ययान, सन्धाययान, सम्भूययान, प्रसङ्गयान और उपेक्षायान प्राचीन आचार्यों की सामरिक गतिशीलता और आज के समय में भी कूटनीतिक प्रासंगिकता को समझने का महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।
कामन्दकीय नीतिसार क्या है और एकादश सर्ग का नाम क्या बताता है?
कामन्दकीय नीतिसार संस्कृत का एक प्रमुख राजनीतिशास्त्रीय ग्रंथ है। इसे कामन्दक नाम के विद्वान ने रचा। माना जाता है कि उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र को आधार बनाकर इसे पद्य में लिखा। इस ग्रंथ में बीस सर्ग हैं। इसमें राजा के कर्तव्य, मंत्रणा, सेना, युद्ध, कूटनीति और प्रशासन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
हमारा यह लेख इसी ग्रंथ के एकादश सर्ग पर केंद्रित है। इस सर्ग का नाम है यानासनद्वैधीभावसंश्रयविकल्पनम्। यह नाम ही बता देता है कि इस सर्ग में केवल यान पर बात नहीं हो रही, बल्कि आसन, द्वैधीभाव और संश्रय पर भी विचार किया गया है।
इसमें चार विषयों पर विचार किया गया है। यान यानी अभियान, आसन यानी रुक जाना, द्वैधीभाव यानी दोहरी नीति, और संश्रय यानी किसी की शरण में जाना। यान इन चारों में से एक है। इसलिए यान को समझते समय सर्ग में उल्लिखित आसन, द्वैधीभाव और संश्रय की चर्चा को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
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| कामन्दकीय नीतिसार के एकादश सर्ग में यान के पाँच प्रकारों का शास्त्रीय वर्णन |
षाड्गुण्य क्या है और यान उसमें कहाँ बैठता है?
यान को समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि यह किस व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है। कौटिल्य और कामन्दक दोनों ने षाड्गुण्य का सिद्धांत दिया है। षाड्गुण्य का मतलब है छह गुण यानी राजा के छह तरह के व्यवहार।
पहला है संधि यानी समझौता करना। दूसरा है विग्रह यानी युद्ध या शत्रुता। तीसरा है यान यानी अभियान पर जाना। चौथा है आसन यानी शांत बैठे रहना। पाँचवाँ है द्वैधीभाव यानी दोहरी नीति अपनाना। छठा है संश्रय यानी किसी बलवान की शरण में जाना।
अब यहाँ एक सवाल उठता है। अगर यान पहले से षाड्गुण्य का एक गुण है, तो उसके भीतर फिर पाँच भेद क्यों?
षाड्गुण्य में यान एक स्वतंत्र नीतिगत उपाय है। एकादश सर्ग में इसी यान के पाँच भेद बताए गए हैं विगृह्य, सन्धाय, सम्भूय, प्रसङ्ग और उपेक्षा।
ध्यान देने योग्य अंतर: षाड्गुण्य का विग्रह और यान का विगृह्ययान समानार्थी नहीं हैं। इसी प्रकार संधि और सन्धाययान भी भिन्न अवधारणाएँ हैं। पहला व्यापक नीतिगत व्यवहार है, जबकि दूसरा यान के एक विशिष्ट रूप को व्यक्त करता है।
षाड्गुण्य में विग्रह शत्रु के प्रति संघर्ष अथवा विरोध की नीति को व्यक्त करता है। विगृह्ययान यान का वह विशिष्ट भेद है जिसमें राजा शत्रु की ओर प्रत्यक्ष अभियान करता है। विग्रह एक व्यापक स्थिति है और विगृह्ययान उस स्थिति में किया जाने वाला एक विशेष अभियान है।
इसी तरह संधि करना एक बात है, और संधि करके अभियान पर निकल पड़ना दूसरी बात। पहला केवल संधि करना है, दूसरा उसके बाद उठाया गया कदम। यही कदम सन्धाययान कहलाता है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि यान अकेला निर्णय नहीं है। यह षाड्गुण्य के भीतर एक चुना हुआ रास्ता है, और उस रास्ते के भीतर पाँच उपाय हैं।
यान के पाँच प्रकार कौन से हैं?
एकादश सर्ग के द्वितीय श्लोक में कहा गया है:
विगृह्य सन्धाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः।
उपेक्षा चेति निपुणैर्यानं पञ्चविधं स्मृतम्॥ २॥
अर्थात विद्वानों के अनुसार यान पाँच प्रकार का होता है: विगृह्य, सन्धाय, सम्भूय, प्रसङ्ग और उपेक्षा।
संस्कृत टीका में इसे और स्पष्ट किया गया है: विगृह्ययानं, सन्धाययानं, सम्भूययानं, प्रसङ्गयानं, उपेक्षायानं चेति यानं पञ्चविधम्॥
अब हम इन पाँचों को एक-एक करके समझते हैं।
विगृह्ययान क्या है?
विगृह्ययान का मतलब है वह अभियान जिसमें राजा अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल करके सीधे शत्रु पर हमला करता है। टीका के अनुसार, जब राजा अपनी अधिक शक्ति के बल पर पीछे से हमला करने वाले पार्ष्णिग्राह की चिंता छोड़कर सीधे मुख्य शत्रु की ओर बढ़ता है, तो उसे विगृह्ययान कहते हैं। (कामन्दकीय नीतिसार, एकादश सर्ग, टीका)
यहाँ पार्ष्णिग्राह शब्द समझना जरूरी है। पार्ष्णिग्राह का मतलब है वह शत्रु जो पीछे से हमला करता है। यानी जब राजा आगे बढ़ता है, तो पीछे से जो खतरा बना रहता है, उस शत्रु को पार्ष्णिग्राह कहते हैं।
मान लीजिए, एक राजा को पता है कि उसका प्रतिद्वंद्वी कमजोर पड़ गया है। उसके पास सेना कम है और उसकी स्थिति कमजोर हो रही है। ऐसे समय में अगर राजा सीधे उस पर हमला करता है, तो यह विगृह्ययान है। यहाँ राजा ने किसी पीछे वाले खतरे की परवाह नहीं की, बल्कि सीधे मुख्य शत्रु पर हमला किया।
इस नीति में सबसे बड़ी बात है कि राजा को अपनी ताकत का सही आकलन होना चाहिए। अगर वह कमजोर है और फिर भी सीधा हमला करेगा, तो नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए विगृह्ययान को समझते समय राजा की शक्ति, मुख्य शत्रु की स्थिति और पीछे से उत्पन्न होने वाले खतरे इन तीनों को साथ में देखना आवश्यक है।
सन्धाययान क्या है?
सन्धाययान का अर्थ है संधि करके अभियान पर जाना। यहाँ राजा पहले अपने पीछे की ओर के खतरों को शांत करता है। वह पार्ष्णिग्राह यानी पीछे से हमला करने वाले शत्रुओं से समझौता करता है। फिर जब पीछे की ओर से निश्चिंत हो जाता है, तब मुख्य शत्रु की ओर बढ़ता है।
शास्त्र इसे और साफ करता है। संधि केवल मित्रों से नहीं होती; संधि शत्रुओं से भी हो सकती है। अगर राजा का कोई पुराना शत्रु पीछे स्थित है और राजा को आगे अभियान पर जाना है, तो वह उस पुराने शत्रु से भी समझौता कर सकता है। वह उस शत्रु के साथ ऐसी संधि कर सकता है जिससे पीछे की ओर से तत्काल संघर्ष की आशंका न रहे और मुख्य अभियान पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
एक राजा को नए क्षेत्र में अभियान पर जाना है। लेकिन उसे भय है कि उसके पीछे के क्षेत्र में कोई और आक्रमण न कर दे। इसलिए वह पहले अपने पुराने शत्रु से भी समझौता कर सकता है। यह सुनिश्चित करता है कि पीछे की ओर से कोई संघर्ष न हो। फिर वह नए क्षेत्र में पूरी शक्ति लगाता है।
यह नीति विशेष रूप से उस परिस्थिति में प्रासंगिक होती है जहाँ राजा के सामने एक से अधिक शत्रु हों। सन्धाययान में राजा शत्रुता नहीं बढ़ाता, बल्कि आवश्यकता होने पर संधि करता है, चाहे सामने वाला पूर्व शत्रु ही क्यों न हो।
सम्भूययान क्या है?
सम्भूययान का मतलब है साथ मिलकर अभियान पर जाना। इसमें राजा अकेले नहीं जाता। वह अपने सामन्तों को साथ लेता है। यहाँ सामन्त से आशय ऐसे संबद्ध या अधीनस्थ शासकों से है जो राजा के अभियान में उसके साथ सम्मिलित होते हैं। सब मिलकर शत्रु पर चढ़ाई करते हैं।
सम्भूययान के दो पक्ष हैं। पहला पक्ष यह है कि कई कमजोर राजा मिलकर एक बलवान शत्रु का मुकाबला करते हैं। दूसरा पक्ष यह है कि कई राजा मिलकर किसी तीसरे पर हमला करते हैं, चाहे उस तीसरे से उनमें से किसी का भी सीधा बैर न हो।
यह संयुक्त अभियान होता है, और इसमें लाभ बाँटने की शर्त पहले ही तय करनी पड़ती है। सहयोगी पक्षों के हितों में असंगति होने पर संयुक्त अभियान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। यह वैसे ही है जैसे कई छोटे राज्य मिलकर एक बड़े साम्राज्य को टक्कर देते हैं। अकेले में कोई भी छोटा राज्य बड़े साम्राज्य का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन जब वे एकजुट हो जाते हैं, तो उनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
सम्भूययान की सफलता सहयोगी पक्षों के पारस्परिक हित और उनकी विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। अगर साथी राजा पीठ पीछे हमला कर दे, तो पूरा अभियान बिखर सकता है। इसलिए राजा को ऐसे सहयोगियों का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए, जो विश्वासपात्र हों और जिनका हित भी इसी अभियान में हो।
प्रसङ्गयान क्या है?
प्रसङ्गयान पाँचों भेदों में अपेक्षाकृत सूक्ष्म प्रकार का अभियान है। टीका में इसे इस तरह समझाया गया है: अन्योद्देशेन यात्राप्रसङ्गमुत्पाद्य अन्यं प्रति यानम्। (कामन्दकीय नीतिसार, एकादश सर्ग, टीका) अर्थात इसमें राजा किसी अन्य उद्देश्य की ओर प्रस्थान का प्रसंग उत्पन्न करके वास्तविक अभियान किसी दूसरे लक्ष्य की ओर करता है।
दूसरे शब्दों में, प्रत्यक्ष उद्देश्य केवल परदा होता है और असली लक्ष्य छिपा रहता है।
इसे एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए, एक राजा घोषणा करता है कि वह पूर्व दिशा में अभियान पर जा रहा है। शत्रु अपनी सेना पूर्व में जमा करता है। लेकिन राजा रास्ते में ही पलटकर पश्चिम में शत्रु के सहयोगी पर हमला कर देता है। यह प्रसङ्गयान है।
यह केवल युद्ध के मैदान में रणनीति बदलना नहीं है। प्रसङ्गयान में तो अभियान शुरू करने से पहले ही लक्ष्य को छिपाया जाता है। इस नीति का लाभ यह है कि शत्रु पहले से तैयार नहीं होता। उसे लगता है कि हमला कहीं और से आएगा। जब वास्तविक हमला होता है, तो वह पहले से सतर्क नहीं होता। लेकिन इसमें जोखिम भी है। अगर भेद खुल गया, तो अपनी ही चाल उलटी पड़ सकती है।
उपेक्षायान क्या है?
उपेक्षायान का मतलब है उपेक्षा करके यानी नजरअंदाज करके अभियान पर जाना। इसमें राजा मुख्य शत्रु को छोड़ देता है और उसके मित्र या सहयोगी पर हमला करता है।
टीका में इसे इस तरह कहा गया है: शत्रोर्बलवदमित्रवत्त्वेन तदुपेक्ष्य तदमित्रं प्रति यानम्। (कामन्दकीय नीतिसार, एकादश सर्ग, टीका) अर्थात शत्रु के पास बलवान मित्र होने के कारण उसकी उपेक्षा करके उसके मित्र पर अभियान करना।
उपेक्षायान में राजा शत्रु को भूलता नहीं है। वह उसे बाद के लिए छोड़ देता है। पहले वह शत्रु के समर्थक या सहयोगी पक्ष को कमजोर करने का प्रयास करता है। इस प्रकार शत्रु के समर्थक पक्ष को कमजोर करके उसके सामरिक समर्थन को कम करने का प्रयास किया जाता है।
उदाहरण के लिए, एक सेनापति को पता है कि शत्रु सेना का मुख्य योद्धा बहुत शक्तिशाली है। सीधे उस पर आक्रमण करना कठिन है। इसलिए सेनापति उस योद्धा के सहयोगी सैनिकों पर दबाव बनाता है। जब सहयोगी पक्ष कमजोर पड़ते हैं, तब मुख्य शत्रु की स्थिति भी अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है। यहाँ सेनापति ने मुख्य योद्धा की उपेक्षा की और उसके सहयोगी पक्ष पर हमला किया।
यान के पाँच प्रकारों में क्या समानता है?
पाँचों प्रकारों में एक महत्वपूर्ण समानता यह है कि हर यान में राजा को अपनी शक्ति, शत्रु की शक्ति और समय का आकलन करना पड़ता है। इनका प्रयोग बिना पर्याप्त आकलन के जोखिमपूर्ण हो सकता है।
इन सब में एक बात समान है हर यान में राजा को यह तय करना पड़ता है कि उसे किससे लड़ना है और किससे नहीं। विगृह्ययान में वह सीधे मुख्य शत्रु से लड़ता है। सन्धाययान में वह पीछे वाले शत्रु से समझौता करता है। सम्भूययान में वह सहयोगियों के साथ मिलकर लड़ता है। प्रसङ्गयान में वह वास्तविक अभियान के उद्देश्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किए बिना दूसरे लक्ष्य की ओर बढ़ता है। उपेक्षायान में वह मुख्य शत्रु को छोड़कर उसके मित्र से लड़ता है।
इन भेदों से यह स्पष्ट होता है कि यान का स्वरूप अभियान की परिस्थिति के अनुसार निर्धारित होता है। इसलिए इनके अध्ययन में शक्ति-संतुलन, समय और संबंधित पक्षों की स्थिति को साथ में देखना आवश्यक है।
यान के पाँच प्रकारों की सीमाएँ और जोखिम
इन पाँचों भेदों में जोखिम अलग-अलग प्रकार का है। विगृह्ययान में शक्ति के गलत आकलन का प्रश्न रहता है। अगर राजा अपनी सेना को ज्यादा और शत्रु की सेना को कम आंक ले, तो सीधा हमला आत्मघाती साबित हो सकता है।
सन्धाययान में संधि की स्थिरता का प्रश्न रहता है। पीछे वाला शत्रु आज संधि कर लेता है, लेकिन जैसे ही राजा आगे बढ़ता है, वह पीछे से हमला कर सकता है। इसलिए संधि की शर्तें और पीछे वाले पक्ष की मंशा दोनों पर नजर रखनी पड़ती है।
सम्भूययान में सहयोगियों की विश्वसनीयता का प्रश्न रहता है। जब कई राजा एक साथ मिलकर चलते हैं, तो विजय के बाद लाभ बाँटने में मतभेद हो सकता है। कभी-कभी तो साथी ही शत्रु बन जाता है।
प्रसङ्गयान में वास्तविक उद्देश्य के प्रकट हो जाने का जोखिम रहता है। अगर शत्रु को पता चल जाए कि हमला कहाँ होने वाला है, तो वह पहले से तैयार हो जाता है और चाल उलटी पड़ जाती है।
उपेक्षायान में शत्रु के सहयोगी पक्ष के सही आकलन का प्रश्न रहता है। अगर सहयोगी पक्ष को हराया न जा सके, तो शत्रु और अधिक मजबूत हो जाता है। इसलिए यह भेद विशिष्ट परिस्थिति और शक्ति-संतुलन से जुड़ा हुआ है।
इन पाँचों भेदों को देखकर एक बात साफ होती है। यान केवल आक्रमण का निर्णय नहीं है। यह जोखिम के आकलन से जुड़ी नीति है।
यान के पाँच प्रकारों का दुरुपयोग
इन नीतियों का इस्तेमाल नैतिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए। प्रसङ्गयान और उपेक्षायान जैसी नीतियाँ अगर धोखे और छल के लिए इस्तेमाल हों, तो वे रिश्तों और भरोसे को तोड़ देती हैं। इन नीतियों को उनके मूल राजनीतिक और सैन्य संदर्भ से अलग करके सामान्य जीवन के हर संबंध पर लागू करना उचित नहीं होगा। विशेष रूप से प्रसङ्गयान और उपेक्षायान जैसे भेदों को आधुनिक संदर्भों में रूपक की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन उनके मूल अर्थ को शत्रु-राज्य, शक्ति-संतुलन और अभियान की परिस्थितियों के संदर्भ में ही समझना चाहिए।
इसलिए यान के प्रकार जानना पर्याप्त नहीं है। उनके अर्थ और प्रयोग को उस राजनीतिक परिस्थिति के साथ समझना भी आवश्यक है, जिसमें ये नीतियाँ प्रस्तुत की गई हैं।
कामन्दक का झुकाव यह दिखाता है कि शास्त्र का मकसद केवल विजय नहीं, बल्कि धर्म की सीमा के भीतर विजय है। इसलिए यान के प्रकार जानना पर्याप्त नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि किस यान का प्रयोग कब और किसके खिलाफ किया जा सकता है।
क्या यान केवल सैन्य अभियान का नाम है?
मूल ग्रंथ के संदर्भ में यान राजाओं, राज्यों और उनके पारस्परिक संबंधों से जुड़ा सैन्य अभियान है। इसलिए आधुनिक परिस्थितियों में इन अवधारणाओं का रूपकात्मक प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन उसे उनके मूल शास्त्रीय अर्थ से अलग पहचानना आवश्यक है।
निष्कर्ष
कामन्दकीय नीतिसार के एकादश सर्ग का यह श्लोक यान के पाँच भेदों को स्पष्ट करता है। ये भेद षाड्गुण्य की व्यापक व्यवस्था के भीतर स्थित हैं। यान एक विकल्प है, और उसके भीतर विगृह्य, सन्धाय, सम्भूय, प्रसङ्ग और उपेक्षा ये पाँच रूप हैं।
इन पाँचों का चयन शक्ति, समय और परिस्थिति के आकलन पर निर्भर करता है। इन पाँचों भेदों में से किसी एक को सार्वकालिक रूप से श्रेष्ठ मानने के बजाय, उनका अर्थ संबंधित शक्ति, समय और राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। इस दृष्टि से यान केवल अभियान का नाम नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुसार चुनी जाने वाली एक नीतिगत व्यवस्था के रूप में सामने आता है।
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