प्राचीन भारत में राज्य केवल तलवार के बल पर नहीं चलते थे। कौटिल्य अर्थशास्त्र की परंपरा में राजा को यह तय करना होता था कि कब अकेले लड़ना है, कब किसी के साथ मिलकर चलना है, और कब किसी ऐसे सहयोगी को साथ लेना है जो कमजोर है लेकिन किसी विशेष काम में उपयोगी है। कामन्दकीय नीतिसार इसी विवेक का ग्रंथ है। उसमें सर्ग 11 में युद्ध, संधि और यान नीति का विस्तार से विवेचन मिलता है।
इस लेख का केंद्रीय विषय सम्भूयगमन है। यह शब्द उस स्थिति को बताता है जब एक से अधिक राजनीतिक शक्तियाँ किसी साझा उद्देश्य के लिए मिलकर आगे बढ़ती हैं; इसे सम्भूय यान या संयुक्त अभियान कहा जा सकता है। कामन्दकीय नीतिसार के सर्ग 11 में श्लोक 6, 7 और 8 इस अवधारणा के तीन अलग रूप सामने रखते हैं। ये तीनों श्लोक एक ही सवाल का उत्तर देते हैं: जब अकेले चलना संभव न हो, तब क्या करना चाहिए? किसे साथ लेना चाहिए, किस आधार पर लेना चाहिए, और साथ आने वाले को क्या देना चाहिए?
इस संदर्भ में विजिगीषु राजा, सामन्त, सामवायिक सहयोगी और सप्तप्रकृति के संतुलन को देखकर निर्णय लेता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी इस प्रकार के संयुक्त अभियान की पृष्ठभूमि मिलती है, जहाँ मित्र, शत्रु और उदासीन शक्तियों का आकलन आवश्यक माना गया है। इस लेख में पहले यान और विजिगीषु जैसी मूल बातें समझेंगे। फिर तीनों श्लोकों को एक-एक करके देखेंगे। हर श्लोक के साथ मूल पाठ, अर्थ और नीतिगत अर्थ दिया जाएगा। पाठांतरों की चर्चा अलग टिप्पणी में रहेगी, ताकि मुख्य धारा बाधित न हो। अंत में यह भी देखेंगे कि आज के गठबंधनों और साझेदारियों में इस प्राचीन नीति की क्या प्रासंगिकता बचती है।
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| सम्भूयगमन: विभिन्न शक्तियों को एक उद्देश्य के लिए संगठित कर आगे बढ़ने की नीति |
सम्भूयगमन को समझने से पहले यान और विजिगीषु को क्यों समझना चाहिए?
प्राचीन भारतीय राजनीति में राज्य के छह प्रमुख उपाय बताए गए हैं। इन्हें षाड्गुण्य कहा जाता है। ये हैं सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय। इनमें यान का अर्थ केवल चल पड़ने से नहीं है। यान का अर्थ है किसी राजनीतिक या सैन्य उद्देश्य के लिए आगे बढ़ना।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के सप्तम अधिकरण में यान और संयुक्त अभियान पर विस्तार से चर्चा मिलती है (कौटिल्य, अर्थशास्त्र 7.6)। वहाँ स्पष्ट किया गया है कि अभियान तब किया जाता है जब राजा स्वयं को शत्रु से अधिक मजबूत मानता हो या उसे अभियान करना आवश्यक हो। लेकिन जब वह अकेले पर्याप्त न हो, तब वह दूसरी शक्तियों के साथ मिलकर आगे बढ़ सकता है।
विजिगीषु उस राजा को कहा जाता है जो विजय चाहता है। उसके सामने केवल एक शत्रु नहीं होता। उसके आसपास मित्र, शत्रु, तटस्थ और मध्यस्थ शक्तियों का पूरा मण्डल होता है। इन्हीं में से कुछ को साथ लेकर वह अभियान चलाता है। सम्भूयगमन इसी यान का एक विशेष रूप है।
श्लोक 6 में संयुक्त अभियान की पहली संरचना कैसे सामने आती है?
मूल पाठ:एकीभूय यदेकत्र सामन्तैः सामवायिकैः।
शक्तिशौचयुतैर्यानं सम्भूयगमनं हि तत्॥ ६ ॥
अर्थ: जब विजिगीषु सामन्तों और सामवायिक सहयोगियों के साथ, जो शक्ति और शुचिता से युक्त हैं, एक जगह एकत्र होकर अभियान चलाता है, तो उसे सम्भूयगमन कहा जाता है।
नीतिगत अर्थ: सम्भूयगमन का पहला रूप संगठन पर टिका है। अलग-अलग सामन्तों की सेनाएँ और संसाधन एक साझा लक्ष्य के लिए जोड़े जाते हैं। यहाँ सहयोगी की क्षमता और विश्वसनीयता दोनों महत्वपूर्ण हैं। सहयोग का आधार पहले से बनी मित्रता नहीं, बल्कि साझा अभियान की आवश्यकता है।
सामन्त शब्द को आज के साधारण अर्थ में नहीं समझना चाहिए। प्राचीन राज्यव्यवस्था में सामन्त एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति था। उसके पास अपने संसाधन, क्षेत्र और सेना होती थी। वह बड़े अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। सामवायिक शब्द का अर्थ है संबद्ध या साथ आने वाली शक्तियाँ।
‘शक्तिशौचयुतैः’ पद दो गुणों की ओर संकेत करता है। शक्ति का अर्थ है सैन्य और भौतिक सामर्थ्य। शौच का अर्थ है शुद्धता, निष्ठा और विश्वसनीयता। जयमङ्गला टीका कहती है:
शक्तिमान् हि पार्ष्णिग्रहणे साहाय्यदाने च शक्तः, शुद्धश्च सिद्धौ च यथास्थितकारी भवतीत्येकः प्रकारः॥
अर्थ: शक्तिमान सहयोगी पीछे से सहायता देने में समर्थ होता है। शुद्ध सहयोगी सफलता के बाद भी अपनी स्थिति में टिका रहता है, पक्ष नहीं बदलता।
शौच यहाँ केवल नैतिक शुद्धता नहीं, व्यावहारिक विश्वसनीयता है। विजय के बाद भी सहयोगी पक्ष न बदले, यही उसका व्यावहारिक अर्थ है।
इस श्लोक का मुख्य विचार यह है कि अकेली शक्ति को संयुक्त शक्ति में बदलना ही सम्भूयगमन का पहला काम है। चुनौती केवल सेनाएँ इकट्ठा करने में नहीं, अलग-अलग हितों वाली शक्तियों को एक दिशा में चलाने में है।
श्लोक 7 में साझा शत्रु और परस्पर हित का नया रूप क्या है?
मूल पाठ:उभयारौ तु वा यानं द्वयोः प्रकृतिनाशने।
सम्भूयगमनं प्रोक्तं हनूमत्सूर्ययोरिव॥ ७ ॥
अर्थ: जब दो शक्तियाँ मिलकर उस साझा शत्रु की प्रकृति का नाश करने के लिए अभियान चलाती हैं, तो उसे सम्भूयगमन कहा जाता है। हनुमान और सूर्य का उदाहरण इसका प्रमाण है।
नीतिगत अर्थ: यहाँ सहयोग का आधार बदल जाता है। सहयोग केवल संगठन से नहीं आता। सहयोग साझा शत्रु से आता है। जब एक ही शत्रु दोनों शक्तियों के लिए खतरा बन जाता है, तब वे मिलकर उसकी प्रकृति का नाश करने के लिए आगे बढ़ती हैं।
यहाँ ‘द्वयोः’ का संबंध दोनों सहयोगी शक्तियों से है, जो मिलकर उस साझा शत्रु की प्रकृति का नाश करती हैं। ‘द्वयोः’ कर्ता की ओर संकेत करता है, कर्म की ओर नहीं।
जयमङ्गला टीका इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट करती है:
अरेर्विजिगीषोश्चोभयोर्यः शत्रुस्तस्मिन् द्वयोरपि सम्भूय यानम्।
अर्थ: जो शत्रु विजिगीषु और उसके प्रतिद्वंद्वी दोनों का साझा शत्रु है, उसके विरुद्ध दोनों मिलकर चलते हैं।
टीका में ‘उभयारिप्रकृतिविलोप’ शब्द भी आता है। इसका अर्थ है उस साझा शत्रु की प्रकृति का विनाश। यानी ‘प्रकृतिनाशन’ उस शत्रु की प्रकृति के विनाश की ओर संकेत करता है, जिसे दोनों सहयोगी शक्तियाँ मिलकर करती हैं। यह शत्रु द्वारा दोनों पर किया गया आघात नहीं है।
सहयोग का आधार पुरानी मित्रता नहीं, परिस्थिति है। साझा शत्रु और उससे उत्पन्न खतरा ही दोनों को एक मंच पर लाता है। संकट टलने के बाद यह सहयोग टिकेगा या नहीं, यह अलग प्रश्न है।
इस श्लोक का एक और पाठ भी मिलता है, जिसमें हनुमान-सूर्य की जगह राम-सुग्रीव का उदाहरण आता है। राम को सीता की खोज में सहायता चाहिए। सुग्रीव को बाली के विरुद्ध सहायता चाहिए। दोनों की समस्याएँ अलग हैं, लेकिन सहयोग से दोनों अपने उद्देश्य की ओर बढ़ सकते हैं। यहाँ सहयोग का आधार परस्पर हित है।
दोनों उदाहरणों को केवल ‘दो मित्रों का मिलकर युद्ध’ कह देना इस श्लोक की राजनीतिक गहराई को मिटा देना है। एक ओर साझा शत्रु सहयोग का आधार है। दूसरी ओर परस्पर हित सहयोग का आधार है। दोनों में सहयोग की राजनीति है, भावुकता नहीं।
‘प्रकृतिनाशन’ का अर्थ क्या है और हनुमान-सूर्य का उदाहरण क्या बताता है?
प्रकृति शब्द यहाँ साधारण अर्थ में नहीं है। प्राचीन राज्यशास्त्र में सप्तप्रकृति राज्य के सात अंगों को कहा जाता है। ये हैं स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र। कामन्दकीय परम्परा में भी राज्य की यही सात अंगों वाली संरचना मानी गई है।
श्लोक 7 में प्रकृतिनाशन का अर्थ है उस साझा शत्रु की प्रकृति का विनाश, जो दोनों सहयोगी शक्तियाँ मिलकर करती हैं। यह दोनों शक्तियों पर आया संकट नहीं है। यह शत्रु पर किया गया आघात है।
हनुमान और सूर्य का उदाहरण इस अर्थ को स्पष्ट करता है। परम्परागत व्याख्या में राहु को सूर्य का शत्रु माना गया है। राहु सूर्य की प्रकृति को नष्ट करने की स्थिति में है। हनुमान और सूर्य की सत्ताएँ अलग हैं। लेकिन एक साझा शत्रु उनके हितों को एक बिंदु पर ले आता है। इसलिए वे मिलकर राहु की प्रकृति का नाश करने के लिए आगे बढ़ते हैं।
यह उदाहरण यह भी दिखाता है कि सहयोग के लिए पूर्व मित्रता जरूरी नहीं। जब दो अलग शक्तियों के सामने एक ही शत्रु खड़ा हो, तो वे अस्थायी रूप से एक साथ आ सकती हैं। लेकिन ऐसा सहयोग शत्रु के स्वरूप पर टिका होता है। शत्रु बदलते ही सहयोग की दिशा भी बदल सकती है।
श्लोक 8 में अल्पसार सहयोगियों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
मूल पाठ:अल्पसारानुपादाय प्रतिज्ञाय फलोदयम्।
गम्यते यत् पराञ् जेतुं सम्भूयगमनं हि तत्॥ ८ ॥
अर्थ: जब विजिगीषु अल्पसार सहयोगियों को साथ लेता है, उन्हें विजय पर प्रतिफल का आश्वासन देता है, और उनके साथ मिलकर शत्रुओं को जीतने के लिए आगे बढ़ता है, तो उसे भी सम्भूयगमन कहा जाता है।
नीतिगत अर्थ: यहाँ सम्भूयगमन का तीसरा रूप सामने आता है। पहले रूप में संगठन था, जहाँ सहयोगी शक्ति और शुचिता से युक्त थे। दूसरे में साझा शत्रु और परस्पर हित था। अब तीसरे रूप में असमान शक्ति का सहयोग है।
अल्पसार का अर्थ केवल कम सैनिक नहीं है। किसी शक्ति का सार उसके सैन्य बल, आर्थिक संसाधन, राजनीतिक प्रभाव, स्थानीय जानकारी और भौगोलिक स्थिति से बनता है। कोई सहयोगी सैन्य दृष्टि से कमजोर हो सकता है, लेकिन उसके पास ऐसी जानकारी या स्थिति हो सकती है जो अभियान के लिए अनिवार्य हो। इसलिए अल्पसार सहयोगी को केवल कमजोर न समझें। उसे उसकी विशेष उपयोगिता के आधार पर साथ लिया जाता है।
‘प्रतिज्ञाय फलोदयम्’ का महत्व यहाँ स्पष्ट है। सहयोगी को बताया जाता है कि अभियान सफल होने पर उसे क्या मिलेगा। यह प्रतिफल धन, भूमि, राजस्व में हिस्सा, सुरक्षा या राजनीतिक समर्थन हो सकता है। लेकिन श्लोक यह नहीं बताता कि प्रतिफल का यह वादा कैसे पूरा होगा। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस पर चर्चा मिलती है, जहाँ संयुक्त अभियान के लाभ-विभाजन को शक्ति, प्रयत्न और योगदान से जोड़ा गया है (कौटिल्य, अर्थशास्त्र 7.6)।
इस श्लोक का मुख्य बिंदु यह है कि सम्भूयगमन में शक्ति का स्तर समान होना जरूरी नहीं। असमान शक्ति वाले पक्ष भी साझा उद्देश्य और स्पष्ट प्रतिफल के आधार पर साथ आ सकते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र से सम्भूयगमन की तुलना कैसे की जा सकती है?
कामन्दकीय नीतिसार को समझने में कौटिल्य का अर्थशास्त्र उपयोगी पृष्ठभूमि देता है। दोनों ग्रंथों की अपनी पाठ-परम्परा है। यह कहना उचित नहीं होगा कि कामन्दक ने हर श्लोक सीधे कौटिल्य से लिया है। लेकिन दोनों में राजनीतिक विचार की कई समान धाराएँ दिखती हैं।
कौटिल्य के सप्तम अधिकरण में यान और संयुक्त अभियान पर विस्तृत चर्चा मिलती है। वहाँ ऐसी स्थिति का उल्लेख है जिसमें राजा अकेले शत्रु का सामना करने में असमर्थ हो। ऐसी स्थिति में वह अपने से हीन, समान या श्रेष्ठ शक्ति वाले राजाओं के साथ मिलकर अभियान कर सकता है। अभियान के लाभ के विभाजन को पहले से तय करने की बात भी वहाँ आती है।
कौटिल्य का विवेचन यह भी दिखाता है कि संयुक्त शक्ति अपने आप में पर्याप्त नहीं है। सहयोगियों की निष्ठा, उनका योगदान और विजय के बाद उनका व्यवहार महत्वपूर्ण हैं। संयुक्त शक्तियों के संदर्भ में कौटिल्य सहयोगियों की बदलती निष्ठा और लाभ-संबंधी तनावों की संभावना पर भी चर्चा करते हैं।
यह बात श्लोक 8 को समझने में विशेष रूप से काम आती है। किसी कमजोर सहयोगी को प्रतिफल का वादा करके साथ ले लेना समस्या का अंत नहीं है। प्रश्न यह भी है कि वादा पूरा होगा या नहीं, सहयोगी अभियान के दौरान कितना योगदान देगा, और विजय के बाद संबंध किस दिशा में जाएगा। कौटिल्य के यहाँ लाभ-विभाजन को शक्ति, प्रयत्न और प्राप्त लाभ जैसे आधारों से जोड़ा गया है। प्राचीन भारतीय राज्यशास्त्र में गठबंधन को केवल भावनात्मक मित्रता के आधार पर नहीं देखा गया था। उसमें हितों का गणित और योगदान का प्रश्न भी मौजूद था।
आज के संदर्भ में सम्भूयगमन की अवधारणा कहाँ दिखाई देती है?
सम्भूयगमन को आधुनिक संस्थाओं पर सीधे लागू करना सही नहीं होगा। प्राचीन राज्यव्यवस्था और आधुनिक संस्थाओं की संरचना अलग है। लेकिन इसकी मूल संरचना को समझने के लिए एक-दो समानताएँ उपयोगी हो सकती हैं।
मान लीजिए कोई बड़ी कंपनी किसी छोटे तकनीकी साझेदार के साथ मिलकर किसी परियोजना पर काम करती है। छोटे पक्ष के पास बड़ा आर्थिक संसाधन नहीं है। लेकिन उसके पास ऐसी तकनीकी क्षमता है जिसकी बड़ी कंपनी को आवश्यकता है। बड़ी कंपनी संसाधन देती है और छोटा पक्ष विशिष्ट क्षमता देता है। दोनों का सहयोग साझा लक्ष्य से जुड़ता है। यह सम्भूयगमन का सीधा आधुनिक रूप नहीं है। लेकिन इसमें वही संरचना दिखती है जो श्लोक 8 में है।
आपदा-प्रबंधन में भी यही संरचना दिखती है। सरकार, स्थानीय प्रशासन, निजी संस्थाएँ और स्वयंसेवी संगठन अपनी अलग-अलग क्षमताओं को जोड़ते हैं। लक्ष्य किसी क्षेत्र पर विजय नहीं होता, लेकिन अलग क्षमताओं का साझा उद्देश्य के लिए संयोजन इसी सिद्धांत की याद दिलाता है। ये प्राचीन अवधारणा के समान नहीं, केवल संरचनात्मक समानताएँ हैं।
संयुक्त शक्ति की इस नीति की सीमाएँ और नैतिक प्रश्न क्या हैं?
सम्भूयगमन की शक्ति साझेदारी में है। उसकी कमजोरी भी वहीं है।
पहली समस्या विश्वास की है। जब कई शक्तियाँ एक अभियान में शामिल होती हैं, तो उनके उद्देश्य पूरी तरह समान नहीं होते। कोई तत्काल लाभ चाहता हो सकता है, कोई दीर्घकालिक सुरक्षा चाहता हो सकता है, और कोई केवल अपने क्षेत्रीय हित की रक्षा चाहता हो सकता है।
दूसरी समस्या प्रतिफल के वादे की है। श्लोक 8 में सहयोगियों को फल का आश्वासन दिया जाता है। यदि विजय के बाद यह वादा पूरा नहीं किया गया, तो तत्काल अभियान सफल हो सकता है। लेकिन भविष्य के सहयोग की नींव कमजोर पड़ सकती है।
तीसरी समस्या कमजोर सहयोगी की निर्भरता है। अल्पसार सहयोगी यदि मुख्य शक्ति पर अत्यधिक निर्भर हो जाए, तो संबंध बराबरी का न रहकर आश्रित संबंध में बदल सकता है। दूसरी ओर, यदि मुख्य शक्ति सहयोगी की क्षमता को कम आँके, तो अभियान में अपेक्षित सहयोग न मिलने की स्थिति बन सकती है।
चौथी समस्या सूचना और निष्ठा की है। अनेक पक्षों वाले अभियान में जानकारी का रिसाव, असहमति, देर से सहयोग, पक्ष-परिवर्तन या संकट के समय पीछे हटने जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।
सम्भूयगमन को केवल शक्ति बढ़ाने की तकनीक समझना अधूरा होगा। यह मूलतः समन्वय की समस्या भी है। यहीं से एक नैतिक प्रश्न भी उठता है। यदि सहयोग केवल उपयोग के लिए बनाया गया है और विजय के बाद सहयोगी को उसका वचनबद्ध लाभ नहीं दिया जाता, तो अल्पकालीन सफलता दीर्घकालीन विश्वास को नष्ट कर सकती है। प्राचीन नीति-ग्रंथों में वचन, लाभ और मित्रता को अलग-अलग नहीं देखा जाता। उनके राजनीतिक परिणामों पर विचार किया जाता है।
तीनों श्लोकों को साथ पढ़ने पर कामन्दक की मूल नीति क्या सामने आती है?
तीनों श्लोकों को अलग-अलग पढ़ने पर वे संयुक्त अभियान के तीन उदाहरण लगते हैं। लेकिन साथ पढ़ने पर एक क्रम दिखाई देता है।
पहला स्तर शक्ति का संगठन है। अलग-अलग सामन्त और संबद्ध शक्तियाँ एकत्र होती हैं। चुनौती यह है कि विविध शक्तियों को एक अभियान में कैसे बदला जाए। यहाँ सहयोगी शक्तिशौचयुत हैं, अर्थात शक्ति और विश्वसनीयता से युक्त।
दूसरा स्तर साझा शत्रु का है। दो शक्तियाँ मिलकर उस साझा शत्रु की प्रकृति का नाश करती हैं, जो दोनों के लिए खतरा बन गया है। यहाँ सहयोग का आधार पुराना संबंध नहीं, परिस्थिति है।
तीसरा स्तर असमान शक्ति के सहयोग का है। अल्पसार सहयोगियों को प्रतिफल के आश्वासन के साथ अभियान में जोड़ा जाता है। यहाँ नेतृत्व और निर्भरता का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
इन तीनों स्तरों को एक सूत्र में समझें तो सम्भूयगमन तीन प्रश्नों पर टिका दिखता है। किसे साथ लिया जाए? किस उद्देश्य से साथ लिया जाए? साथ आने वाले पक्ष के हित को कैसे जोड़ा जाए?
सम्भूयगमन केवल सैन्य चाल नहीं है। यह संसाधनों के संयोजन, हितों के समायोजन और राजनीतिक उद्देश्य को साझा अभियान में बदलने की कला है। कामन्दक की दृष्टि में विजय केवल रणभूमि पर शक्ति के टकराव से नहीं बनती। विजय के पीछे यह भी महत्वपूर्ण है कि उपलब्ध शक्तियों को किस प्रकार संगठित किया गया, किसके साथ सहयोग किया गया, और सहयोग का आधार क्या था।
निष्कर्ष: सम्भूयगमन केवल साथ चलना क्यों नहीं है?
कामन्दकीय नीतिसार के सर्ग 11 के तीनों श्लोक सम्भूयगमन को एक बहुस्तरीय अवधारणा के रूप में सामने रखते हैं। श्लोक 6 में शक्ति-संगठन है। श्लोक 7 में साझा शत्रु और परस्पर हित है। श्लोक 8 में अल्पसार सहयोगियों को प्रतिफल के आश्वासन के साथ जोड़ने की स्थिति है।
सम्भूयगमन का सार केवल मिलकर जाना नहीं है। असली प्रश्न यह है कि अलग-अलग शक्तियों को किसी निश्चित राजनीतिक उद्देश्य के लिए किस प्रकार एक अभियान में बदला जाए।
सम्भूयगमन की असली शक्ति अकेली सेना या संसाधन में नहीं है। असली शक्ति अलग-अलग हितों को एक साझा उद्देश्य में जोड़ने की क्षमता में है। कामन्दक के तीन श्लोक यह दिखाते हैं कि सहयोग कभी संगठन से बनता है, कभी साझा शत्रु से, और कभी प्रतिफल के आश्वासन से। लेकिन हर सहयोग के साथ एक प्रश्न बना रहता है: विजय के बाद भी क्या वह संबंध टिकेगा?
सम्भूयगमन की यही विशेषता इसे आज भी विचारणीय बनाती है। यह हमें शक्ति से ज्यादा शक्ति के संयोजन का प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है।
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अगले लेख में हम कामन्दकीय नीतिसार के सर्ग 11 के श्लोक 9 से आगे बढ़ेंगे। सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय जैसे सिद्धांतों को इसी पद्धति से समझते रहेंगे: मूल श्लोक, अर्थ, नीतिगत अर्थ और अलग टिप्पणी में पाठांतर।
पाठांतर और टिप्पणी
इस लेख में मुख्य पाठ के रूप में कामन्दकीय नीतिसार का वह पाठ दिया गया है जो टी. गणपति शास्त्री के संस्करण (Government of Travancore Press, 1912) में जयमङ्गला-व्याख्या के साथ मुद्रित है। जहाँ भिन्न संस्करणों में पाठ-भेद मिलता है, उसका संकेत नीचे दिया जा रहा है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नीचे दिए कुछ पाठांतरों का स्रोत स्पष्ट नहीं है। परन्तु भिन्न संस्करणों और टीकाओं में ये पाठ उद्धृत मिलते हैं। लेखक ने स्वयं उन सभी पांडुलिपियों को नहीं देखा है।
श्लोक 6 में:गणपति शास्त्री (1912) के जयमङ्गला-सहित संस्करण में मुख्य पाठ ‘यदेकत्र’, ‘सामन्तैः सामवायिकैः’ और ‘शक्तिशौचयुतैः’ मिलता है। जयमङ्गला टीका ‘शक्तिशौचयुतैः’ की व्याख्या करते हुए कहती है कि सहयोगी शक्तिमान होना चाहिए, जिससे वह पीछे से सहायता देने में समर्थ हो, और शुद्ध होना चाहिए, जिससे सफलता के बाद भी वह अपनी स्थिति में टिका रहे। गर्ग (2016) के हिन्दी-व्याख्या संस्करण में भी यही पाठ मिलता है। भिन्न संस्करणों में ‘शक्तिशौर्यच्युतैः’ पाठ भी उद्धृत मिलता है, जिसका सामान्य अर्थ होता है शक्ति और शौर्य से रहित। यदि यह पाठ स्वीकार किया जाए, तो सहयोगी कमजोर सिद्ध होते हैं, जो श्लोक 8 के अल्पसार सहयोगियों से मिलते-जुलते हैं। इससे तीनों श्लोकों के बीच का अंतर धुँधला पड़ जाता है। इसी कारण जयमङ्गला का ‘शक्तिशौचयुतैः’ पाठ प्रसंग के अधिक अनुकूल माना जाता है।
श्लोक 7 में:गणपति शास्त्री (1912) के संस्करण में मुख्य पाठ ‘उभयारौ तु वा यानं’ और ‘सम्भूयगमनं प्रोक्तं’ मिलता है, साथ में हनुमान-सूर्य का उदाहरण। जयमङ्गला टीका स्पष्ट कहती है: अरेर्विजिगीषोश्चोभयोर्यः शत्रुस्तस्मिन् द्वयोरपि सम्भूय यानम्। यानी दोनों का साझा शत्रु। गर्ग (2016) के हिन्दी-व्याख्या संस्करण में भी यही पाठ मिलता है। भिन्न संस्करणों में ‘उभयोरपि यद्यानं’ और ‘सम्भूययानं तत्प्रोक्तं’ पाठ भी उद्धृत मिलता है। इस पाठ में शत्रु का तत्व गायब हो जाता है और अर्थ केवल ‘दोनों के’ तक सीमित रह जाता है। भिन्न संस्करणों में ‘उभयारौ तु या यात्रा’ और ‘रामसुग्रीवयोरिव’ पाठ मिलता है, जिसमें राम-सुग्रीव का उदाहरण आता है। ‘उभयारौ’ में ‘अरि’ अर्थात शत्रु स्पष्ट है। इसलिए दोनों पाठों को अलग-अलग रखना और उनके अर्थ को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
श्लोक 8 में:गणपति शास्त्री (1912) के संस्करण में ‘फलोदयम्’ और ‘पराञ् जेतुं’ पाठ मिलता है। ‘फलोदयम्’ का अर्थ है फल का उदय या प्रतिफल का आश्वासन। गर्ग (2016) के हिन्दी-व्याख्या संस्करण में भी ‘फलोदयम्’ और ‘पराञ् जेतुं’ का ही समर्थन मिलता है। ‘पराञ्’ का अर्थ है शत्रुओं को। भिन्न संस्करणों में ‘फलेद्वयम्’ पाठ भी उद्धृत मिलता है, जिसका अर्थ दो फल होगा। यह इस प्रसंग में कम उपयुक्त लगता है, क्योंकि श्लोक का विषय एक साझा अभियान और एक साझा प्रतिफल है, दो नहीं।
सामान्य टिप्पणी:कामन्दकीय नीतिसार के विभिन्न संस्करणों में पाठ-भेद की परम्परा पुरानी है। जयमङ्गला, नन्दिनी और अन्य टीकाएँ कहीं-कहीं अलग पाठ पढ़ती हैं और उनके अर्थ भी अलग निकलते हैं। इसलिए किसी भी श्लोक का अर्थ तय करने से पहले यह देखना चाहिए कि मुख्य पाठ किस संस्करण का है और उस पर कौन-सी टीका है। इस लेख में जयमङ्गला-सहित गणपति शास्त्री संस्करण को मुख्य आधार बनाया गया है।