कामन्दकीय नीतिसार का नवम सर्ग राजाओं के पारस्परिक संबंधों, युद्ध और संधि जैसे विषयों से जुड़ा है। इसी क्रम में यह श्लोक आता है-
ईषदायच्छमानो हि सिंहो मत्तमिव द्विपम् ।
हिनस्ति बलवांस्तस्मात् सन्धेयः शिवमिच्छता ॥ ४८ ॥
श्लोक में सिंह और हाथी का उदाहरण देकर यह बताया गया है कि किसी बलवान राजा से टकराने का परिणाम हमेशा उसकी तत्काल अपेक्षा तक सीमित नहीं रहता। इसलिए यदि परिस्थिति ऐसी हो कि संधि से अपना हित बचाया जा सके, तो वह विकल्प उचित हो सकता है। यहाँ “शिवम्” (कल्याण/हित) शब्द बताता है कि संधि का मूल्य उसके नाम में नहीं, बल्कि उसके परिणाम में है। यह अपने-आप में कोई आदर्श नहीं, बल्कि राजकीय नीति का एक उपाय है।
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| सिंह और हाथी के रूपक से बल, संघर्ष और संधि पर कामन्दक की नीति। |
IAST
īṣadāyacchamāno hi siṃho mattam iva dvipam |
hinasti balavāṃs tasmāt sandheyaḥ śivam icchatā || 48 ||
पदच्छेद
ईषदायच्छमानो = ईषत् + आयच्छमानः
सिंहो = सिंहः
मत्तमिव = मत्तम् + इव
बलवांस्तस्मात् = बलवान् + तस्मात्
शिवमिच्छता = शिवम् + इच्छता
शब्दार्थ
| पद | अर्थ |
|---|---|
| ईषत् | थोड़ा, किंचित |
| आयच्छमानः | प्राप्त करने का प्रयत्न करता हुआ |
| सिंहः | सिंह |
| मत्तम् | मदोन्मत्त |
| द्विपम् | हाथी |
| हिनस्ति | मारता/नष्ट करता है |
| तस्मात् | इसलिए |
| सन्धेयः | जिसके साथ संधि करनी चाहिए |
| शिवम् | कल्याण, हित |
| इच्छता | इच्छा रखने वाले द्वारा |
व्याकरण की दृष्टि से
ईषत् का अर्थ ‘थोड़ा’ है। आयच्छमानः वर्तमान कृदन्त है ‘प्राप्त करने का प्रयत्न करता हुआ’। इस प्रकार ईषदायच्छमानः का आशय ‘थोड़ा प्राप्त करने का प्रयत्न करने वाला’ है। यहाँ ‘थोड़ा’ को बिना टीका-प्रमाण के ‘भूभाग’ मानना उचित नहीं है। हिनस्ति (√हन्) का अर्थ ‘मारना/विनाश करना’ है, सन्धेयः ‘संधि करने योग्य’ और शिवम् यहाँ ‘कल्याण/हित’ है।
अन्वय
हि ईषदायच्छमानः सिंहः मत्तमिव द्विपं हिनस्ति। तस्मात् शिवमिच्छता सन्धेयः।
शाब्दिक अर्थ
“निश्चय ही, थोड़ा-सा प्राप्त करने का प्रयत्न करता हुआ सिंह भी मत्त हाथी को मार डालता है। इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है, उसे संधि करनी चाहिए।”
राजनीतिक दृष्टि से यहाँ सिंह और हाथी की उपमा को बलवान और अपेक्षाकृत दुर्बल पक्ष के संबंध पर लागू किया जा सकता है। यह श्लोक की राजनीतिक व्याख्या है, शाब्दिक अर्थ नहीं।
सरल हिन्दी अर्थ
यदि कोई बलवान पक्ष थोड़ा-सा प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहा हो, तो सामने वाला दुर्बल पक्ष उसे हल्के में न समझे। उसके साथ संघर्ष का परिणाम गंभीर हो सकता है। इसलिए जो राजा अपना हित चाहता है, उसे ऐसी स्थिति में संधि करना उचित समझना चाहिए।
उपमा का राजनीतिक सन्दर्भ
श्लोक में सिंहो मत्तमिव द्विपम् का प्रयोग बलवान पक्ष की मारक क्षमता दिखाने के लिए किया गया है। सिंह और हाथी की उपमा के माध्यम से यह बात सामने आती है कि शक्तिशाली प्रतिपक्ष के साथ संघर्ष का परिणाम गंभीर हो सकता है।
इस उपमा को किसी विशिष्ट प्रकार के राजा या राज्य का निश्चित प्रतीक मानने से बचना चाहिए, क्योंकि श्लोक उस स्तर पर अर्थ नहीं देता।
“ईषदायच्छमानः” का अर्थ
इस पद का अर्थ समझना इस श्लोक के लिए महत्वपूर्ण है।
ईषत् का अर्थ है, थोड़ा या थोड़ा-सा।
आयच्छमानः का अर्थ है, प्राप्त करने का प्रयत्न करने वाला।
इस प्रकार श्लोक में ऐसी स्थिति दिखाई देती है जिसमें बलवान पक्ष की तत्काल अपेक्षा बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन उसकी शक्ति इतनी अधिक है कि उसका विरोध करने वाला पक्ष गंभीर संकट में पड़ सकता है।
इसलिए “माँग छोटी हो सकती है, लेकिन उसे पूरा कराने वाले की शक्ति बड़ी हो सकती है”यह इस पद से निकलने वाली राजनीतिक व्याख्या है।
फिर भी “ईषत्” को सीधे “राज्य का थोड़ा भाग” कहना सावधानी के बिना उचित नहीं है। ऐसा अर्थ तभी निश्चित रूप से लिया जाना चाहिए जब संबंधित टीका या संदर्भ उसका समर्थन करता हो।
संधि क्यों?
श्लोक का दूसरा भाग है-
तस्मात् सन्धेयः शिवमिच्छता।
अर्थात्-
“इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है, उसे संधि करनी चाहिए।”
यहाँ संधि को किसी सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया है। बात परिस्थिति की है। यदि सामने वाला पक्ष अधिक शक्तिशाली है और उसके साथ समझौते से बड़ी हानि टाली जा सकती है, तो संधि एक उचित उपाय हो सकती है।
इस दृष्टि से सन्धेयः को “हर स्थिति में संधि करो” के अर्थ में पढ़ना ठीक नहीं होगा।
“शिवमिच्छता” का महत्व
श्लोक के अंतिम शब्द हैं
शिवमिच्छता
अर्थात्
“जो अपना कल्याण चाहता है।”
यह पद पूरे निर्देश का आधार है।
कामन्दक का जोर केवल संधि पर नहीं है। प्रश्न यह है कि राजा के लिए क्या हितकर है। यदि संधि से राज्य और शासन की रक्षा होती है, तो संधि उपयोगी है। यदि किसी दूसरी परिस्थिति में संधि से अधिक बड़ी हानि होती हो, तो इस एक श्लोक से हर बार संधि करने का नियम नहीं निकाला जा सकता।
इसलिए श्लोक का सरल सूत्र है
हित की रक्षा के लिए संधि की जा सकती है।
सन्धिविकल्प के प्रसंग में
यह श्लोक नवम सर्ग में संधि से संबंधित चर्चा के प्रसंग में आता है। यहाँ राजाओं के बीच संधि के विभिन्न रूपों और परिस्थितियों पर विचार किया जाता है।
इस संदर्भ को ध्यान में रखने पर श्लोक का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है। यह कोई सामान्य शिक्षा नहीं है कि “बलवान व्यक्ति के सामने हमेशा झुक जाना चाहिए।” यह राजकीय व्यवहार की उस स्थिति की चर्चा है जिसमें दो पक्षों की शक्ति बराबर नहीं है और एक पक्ष संघर्ष का भार उठाने की स्थिति में नहीं है।
इसलिए श्लोक को उसके आसपास के विचारों के साथ पढ़ना अधिक उचित है।
संधि और कमजोरी
संधि को केवल कमजोरी का नाम देना भी उचित नहीं है।
राजनीति में कभी-कभी युद्ध करने से अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि राज्य और शासन सुरक्षित रहें। यदि किसी समझौते से तत्काल संकट टलता है और आगे अपनी स्थिति सुधारने का अवसर मिलता है, तो वह समझौता विवेकपूर्ण हो सकता है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। यदि संधि केवल इसलिए की जाए कि सामने वाला शक्तिशाली है और उससे भविष्य में कहीं बड़ी हानि होने वाली हो, तो वही निर्णय गलत भी हो सकता है।
इसलिए इस श्लोक का अर्थ अंधी अधीनता नहीं, बल्कि परिस्थिति देखकर निर्णय लेना है।
पाठभेद की सावधानी
यहाँ प्रस्तुत पाठ “ईषदायच्छमानो” है, परंतु कुछ परंपराओं में “ईषदावध्यमानो” जैसा पाठ भी मिलता है।
दोनों पाठों का अर्थ भिन्न है। इसलिए पाठभेद का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि व्याख्या किस पाठ पर आधारित है। विशेष रूप से इस लेख की व्याख्या ईषदायच्छमानः के पाठ पर आधारित है।
आधुनिक संदर्भ और सीमाएँ
आज के संदर्भ में इस श्लोक को शक्ति-असंतुलन, जोखिम और समझौते के प्रश्न से जोड़ा जा सकता है। लेकिन यह समकालीन व्याख्या है, मूल अर्थ नहीं। इसे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय सिद्धान्तों, जैसे ‘Appeasement’ या ‘Balance of Power’, का प्राचीन रूप कहना उचित नहीं होगा।
इसी तरह, कामन्दक यहाँ शक्ति को अपने-आप में उचित नहीं ठहरा रहे हैं; वे राजकीय परिस्थिति में शक्ति के अंतर को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की बात करते हैं।
रचना-तिथि एवं ग्रंथ-संरचना
कामन्दकीय नीतिसार की निश्चित रचना-तिथि सर्वसम्मत नहीं है। इसके काल-निर्धारण को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं; इसे सामान्यतः गुप्तकाल के आसपास या उसके बाद की राजनीतिक विचार-परंपरा से जोड़ा जाता है।
ग्रंथ में 20 सर्ग हैं, किंतु प्रकरणों की संख्या 34 या 36 के रूप में अलग-अलग संस्करणों में मिलती है। इसलिए प्रकरणों की संख्या बताते समय संस्करण स्पष्ट करना बेहतर है।
निष्कर्ष
इस श्लोक में बल, संघर्ष और हिततीनों का संबंध सामने आता है। सिंह और हाथी की उपमा यह बताती है कि शक्तिशाली प्रतिपक्ष को हल्के में लेना उचित नहीं। लेकिन अंततः कामन्दक का निर्देश “शिवम्” अर्थात् कल्याण पर टिका है। संधि का महत्व इस बात में है कि उससे वास्तविक हित की रक्षा होती है या नहीं।
“सामने वाले की शक्ति और संघर्ष के परिणाम को देखकर ही तय करना चाहिए कि संघर्ष करना है या संधि।”
संदर्भ
- Kāmandakīya Nītisāra, सर्ग IX, श्लोक 48।
- Rajendralala Mitra (ed./trans.), The Nitisara or the Elements of Polity by Kamandaki, Bibliotheca Indica, Asiatic Society, Calcutta.
- Pradeep Kumar Gautam, The Nitisara by Kamandaka: Continuity and Change from Kautilya's Arthashastra, IDSA Monograph Series No. 63, 2019.
- Upinder Singh, “Politics, Violence, and War in Kāmandaka's Nītisāra,” Indian Economic and Social History Review, 47(1), 2010, pp. 29–62.
- Jesse Ross Knutson (ed./trans.), Kamandaki's Nītisāra, or The Essence of Politics, Harvard University Press, 2021.