कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 9.78

राजनीति और कूटनीति में हर कदम एक जोखिम होता है। एक संधि राज्य की सुरक्षा, शक्ति और राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। इसलिए संधि के निर्णय में सावधानी आवश्यक है। लेकिन संधि करने से पहले राजा को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

प्राचीन भारत के नीतिशास्त्री आचार्य कामन्दक ने सन्धिविकल्प प्रकरण के अंतिम श्लोक में संधि के उचित प्रयोग के लिए परिस्थिति-विचार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। यह श्लोक संधि के प्रकारों की चर्चा के अंत में आता है। इसमें कहा गया है कि पूर्वकाल के महर्षियों ने संधि के जो सिद्धांत बनाए हैं, राजा को उन्हें अंधाधुंध नहीं अपनाना चाहिए। पहले यह देखना चाहिए कि कार्य कितना गंभीर है और अपने तथा पर-पक्ष का बल-अबल क्या है।

इस लेख में हम इस श्लोक के मूल संस्कृत पाठ, पदच्छेद, शब्दार्थ, भावार्थ और राजनीतिक संदर्भ को समझेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि कामन्दक संधि जैसे कूटनीतिक उपायों के प्रयोग में परिस्थिति-विचार और विवेक को क्यों महत्वपूर्ण मानते हैं।

कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 78 का चित्रण, जिसमें राजा संधि से पहले विचार करता हुआ दिखाया गया है।
कामन्दकीय नीतिसार के श्लोक 78 में परिस्थिति के अनुसार संधि का प्रयोग करने की ओर संकेत किया गया है।

कामन्दकीय नीतिसार का नवम सर्ग और सन्धिविकल्प प्रकरण

कामन्दकीय नीतिसार राज्यशास्त्र का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसके रचयिता आचार्य कामन्दक हैं। इस ग्रंथ में कौटिल्य के अर्थशास्त्र से जुड़ी कई राजनीतिक अवधारणाओं और परंपराओं की निरंतरता दिखाई देती है, और इसमें कुल 20 सर्ग तथा 36 प्रकरण हैं।

नवम सर्ग का नाम सन्धिविकल्प है और इसमें संधि के विभिन्न प्रकारों तथा उनके राजनीतिक प्रयोग पर विस्तार से विचार किया गया है। इसमें राजाओं के बीच संधि के विभिन्न रूपों, परिस्थितियों और उनके परिणामों पर चर्चा मिलती है। विदेश-नीति के संदर्भ में षाड्गुण्य की अवधारणा भी यहाँ महत्वपूर्ण है। षाड्गुण्य का अर्थ है छह उपाय: संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय।

प्रकरण के आरंभ में सोलह संधि-प्रकारों का उल्लेख मिलता है और आगे चार अन्य प्रकार भी बताए गए हैं। इस प्रकार प्रकरण में कुल बीस प्रकारों की चर्चा सामने आती है। लेकिन इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका उपसंहार है, जो श्लोक 78 में मिलता है। यह श्लोक सन्धिविकल्प प्रकरण का अंतिम श्लोक है और पूरे प्रकरण के निष्कर्ष के रूप में आता है।

श्लोक 78 का मूल संस्कृत पाठ और पदच्छेद

मूल पाठ:

इति स्म सन्धिं खलु सन्धिवित्तमा
बभाषिरे पूर्वतना महर्षयः ।
तद् एतद् एवं विनयेन्नरेश्वरः
संवीक्ष्य कार्यं गुरु चेतरद् द्विधा ॥ ७८ ॥

पदच्छेद:

इति स्म सन्धिम् खलु सन्धिवित्तमाः बभाषिरे पूर्वतनाः महर्षयः।
तत् एतत् एवं विनयेत् नरेश्वरः संवीक्ष्य कार्यं गुरु च इतरद् द्विधा॥

यह पाठ विकिस्रोत पर उपलब्ध कामन्दकीय नीतिसार के संस्करण के अनुसार है। यहाँ मूल पाठ और पदच्छेद के रूपों में अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है। मूल पाठ में “विनयेन्नरेश्वरः” और “चेतरद् द्विधा” जैसे संधि-रूप मिलते हैं, जबकि पदच्छेद में “सन्धिवित्तमाः”, “पूर्वतनाः”, “विनयेत् नरेश्वरः” और “च इतरद् द्विधा” जैसे रूप सामने आते हैं।

शब्दार्थ

  • इति स्म - इस प्रकार, ऐसा
  • सन्धिम् - संधि को
  • खलु - निश्चय ही, वास्तव में
  • सन्धिवित्तमाः - संधि के श्रेष्ठ ज्ञाता
  • बभाषिरे - कहा, प्रतिपादित किया
  • पूर्वतनाः महर्षयः - पूर्वकालीन महर्षियों ने
  • तद् एतद् एवं - उसी प्रकार, इस प्रकार
  • विनयेत् - उचित विधि से प्रयोग करे
  • नरेश्वरः - राजा
  • संवीक्ष्य - भली-भाँति विचार या परीक्षण करके
  • कार्यं गुरु - महत्वपूर्ण, गंभीर कार्य
  • च इतरद् द्विधा - और दूसरे पक्ष को दो प्रकार से; टीका के अनुसार अपने और पर-पक्ष के बल-अबल को ध्यान में रखकर

ध्यातव्य है कि “विनयेत्” का अर्थ “विजय” नहीं है। जयमंगला टीका में इसे “उक्त विधि के अनुसार प्रयोग करे” के रूप में समझाया गया है। इसी तरह “च इतरद् द्विधा” का अर्थ टीका में “अपने और पर के बल-अबल को जानकर” बताया गया है। इन दोनों पदों की व्याख्या जयमंगला टीका के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। आधुनिक व्याख्याओं में इनके अर्थ का कुछ विस्तार मिलता है, इसलिए टीका-आधारित अर्थ और आधुनिक व्याख्या को अलग-अलग रखना चाहिए।

श्लोक 78 का सरल भावार्थ

प्राचीन काल के संधि-शास्त्र के श्रेष्ठ ज्ञाता महर्षियों ने संधि के जिन प्रकारों का वर्णन किया है, राजा को कार्य की गंभीरता तथा अपने और पर-पक्ष की स्थिति का अच्छी तरह आकलन करके ही उनका उचित विधि से प्रयोग करना चाहिए।

कामन्दक का आशय यह है कि वे संधि को बुरा नहीं कह रहे हैं। वे संधि को एक राजनीतिक उपाय मानते हैं। इसलिए राजा को कार्य की प्रकृति तथा संबंधित पक्षों की स्थिति देखकर संधि का प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक 78 की विस्तृत व्याख्या

इस श्लोक में पूर्ववर्ती नीतिशास्त्रीय परंपरा, संधि के उचित प्रयोग और राजा द्वारा परिस्थिति के परीक्षण, तीनों बातें एक साथ सामने आती हैं।

पूर्वतनाः महर्षयः और सन्धिवित्तमाः

श्लोक की पहली पंक्ति में “पूर्वतनाः महर्षयः” शब्द का प्रयोग करके कामन्दक अपने संधि-विचार को पूर्ववर्ती महर्षियों की नीतिशास्त्रीय परंपरा से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। इस श्लोक में शुक्राचार्य या बृहस्पति जैसे किसी विशेष ऋषि का नाम नहीं आया है, केवल पूर्वकालीन महर्षियों का सामान्य उल्लेख है।

“सन्धिवित्तमाः” शब्द संधि-विषयक श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाले पूर्ववर्ती आचार्यों की ओर संकेत करता है। कामन्दक उनके द्वारा प्रतिपादित संधि-विचार को आधार बनाकर उसके उचित प्रयोग की बात करते हैं।

विनयेत्

“विनयेत्” का अर्थ टीका में दिए गए संदर्भ के अनुसार उचित विधि से प्रयोग करने के रूप में समझाया गया है। जयमंगला की व्याख्या इसे पूर्वोक्त विधि के अनुसार संधि के प्रयोग से जोड़ती है। यह शब्द बताता है कि संधि के सिद्धांतों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। संधि-विषयक ज्ञान के साथ उसके उचित प्रयोग की क्षमता भी आवश्यक है। इस प्रकार श्लोक में संधि-विषयक ज्ञान और उसके उचित प्रयोग-दोनों पक्ष साथ दिखाई देते हैं। ‘सन्धिवित्तमाः’ ज्ञान की ओर संकेत करता है, जबकि ‘विनयेत्’ उस ज्ञान को उचित विधि से लागू करने की आवश्यकता को सामने रखता है।

संवीक्ष्य

श्लोक की दूसरी पंक्ति राजा के विवेकपूर्ण कर्तव्य को रेखांकित करती है। कामन्दक “संवीक्ष्य” शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है भली-भाँति विचार या परीक्षण करके। यह शब्द बताता है कि राजा को किसी नीति को लागू करने से पहले संबंधित परिस्थिति का भली-भाँति परीक्षण करना चाहिए।

कार्यं गुरु

“कार्यं गुरु” में कार्य की गंभीरता या महत्त्व की ओर संकेत मिलता है। यहाँ “गुरु” शब्द केवल “बड़ा” नहीं, बल्कि महत्त्वपूर्ण या गंभीर अर्थ देता है। संधि जैसे राजकीय निर्णय में कार्य की प्रकृति को समझना इसलिए आवश्यक है।

च इतरद् द्विधा

“च इतरद् द्विधा” टीका के अनुसार अपने और पर-पक्ष के बल-अबल को ध्यान में रखकर विचार करने का संकेत देता है। यही श्लोक की व्याख्या का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। आधुनिक व्याख्या में इसे संभावित अच्छे और बुरे परिणामों के आकलन से भी जोड़ा जा सकता है। लेकिन इसे श्लोक के शाब्दिक अर्थ के रूप में नहीं, बल्कि व्याख्यात्मक विस्तार के रूप में समझना चाहिए। टीका का प्राथमिक अर्थ “अपने और पर के बल-अबल” ही है।

इस प्रकार संधि का प्रश्न केवल संधि करने या न करने का नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुरूप उसके उचित रूप और प्रयोग का है।

श्लोक 78 का तत्काल राजनीतिक संदर्भ

श्लोक 78 सन्धिविकल्प प्रकरण का अंतिम श्लोक है और यह पूरे प्रकरण के निष्कर्ष के रूप में कार्य करता है। इससे पहले के श्लोकों में कामन्दक ने संधि के विभिन्न प्रकारों, उनकी परिस्थितियों और उनके परिणामों पर विस्तार से चर्चा की है।

श्लोक 76 में साम, प्रदान और भेद जैसे उपायों के माध्यम से संधि कराने की बात आती है, जबकि श्लोक 77 में अपने बल की रक्षा करते हुए शत्रु पर दबाव डालकर संधि की स्थिति उत्पन्न करने का वर्णन है। इसके बाद श्लोक 78 इन पूर्ववर्ती विचारों का उपसंहार करते हुए संधि के उचित प्रयोग की ओर संकेत करता है।

श्लोक 78 को उसके पूर्ववर्ती विवेचन से अलग करके पढ़ना उचित नहीं होगा। सन्धिविकल्प प्रकरण में पहले संधि के अनेक प्रकारों का वर्गीकरण किया गया है और प्रकरण के अन्य श्लोकों में यह भी बताया गया है कि किन परिस्थितियों में संधि उपयुक्त या अनुपयुक्त हो सकती है। इसलिए अंतिम श्लोक का “विनयेत्” केवल सैद्धांतिक ज्ञान की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि पहले बताए गए संधि-विचार को परिस्थिति के अनुसार लागू करने की ओर संकेत करता है।

आधुनिक निर्णय-प्रक्रिया के संदर्भ में श्लोक 78

श्लोक का प्रत्यक्ष संदर्भ राजा और राजकीय नीति है। फिर भी इसमें दिखाई देने वाला परिस्थिति-विचार और पक्षों की स्थिति का आकलन आधुनिक निर्णय-प्रक्रिया के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कोई समझौता केवल तत्काल लाभ देखकर नहीं किया जाता। शक्ति-संतुलन, शर्तें और दीर्घकालिक परिणाम भी देखे जाते हैं। इस दृष्टि से श्लोक में दिखाई देने वाला परिस्थिति-विचार आधुनिक रणनीतिक निर्णय-प्रक्रिया से एक व्यापक समानता रखता है। श्लोक की टीका-आधारित व्याख्या में राजनीतिक निर्णय के लिए परिस्थिति-विचार और विवेक का महत्व स्पष्ट होता है।

श्लोक 78 से जुड़े कुछ प्रश्न

क्या संधि हमेशा बुरी होती है?

कामन्दकीय नीतिसार में संधि को परिस्थिति के अनुसार प्रयुक्त राजनीतिक उपाय के रूप में देखा गया है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि संधि अच्छी है या बुरी, बल्कि यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में कौन सी संधि और किस शर्त पर उपयुक्त होगी।

क्या राजा को हर संधि मान लेनी चाहिए?

कामन्दकीय नीति में संधि का निर्णय दूसरे पक्ष की प्रकृति, उसकी शक्ति और परिस्थिति को देखकर किया जाता है। नवम सर्ग में कुछ ऐसे राजाओं का भी उल्लेख है जिनके साथ संधि करना उचित नहीं माना गया है। राजा को पहले यह देखना चाहिए कि सामने वाला पक्ष कौन है, उसकी शक्ति और स्थिति क्या है तथा प्रस्तावित संधि से राज्य के हित किस प्रकार प्रभावित होंगे।

क्या यह श्लोक केवल राजाओं के लिए है?

प्रत्यक्ष रूप से यह श्लोक राजा और राजकीय नीति के संदर्भ में है। आधुनिक जीवन में इसका उपयोग केवल एक व्यापक व्याख्यात्मक समानता के रूप में किया जा सकता है; इसे श्लोक का मूल संदर्भ नहीं मानना चाहिए।

निष्कर्ष

कामन्दकीय नीतिसार का श्लोक 78 सन्धिविकल्प प्रकरण का संक्षिप्त उपसंहार है। इसमें पूर्ववर्ती महर्षियों द्वारा बताए गए संधि-विचार को परिस्थिति के अनुसार प्रयोग करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। राजा के लिए केवल संधि के प्रकारों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसे कार्य की प्रकृति तथा अपने और दूसरे पक्ष की स्थिति को देखकर उचित नीति अपनानी चाहिए। इसी कारण यह श्लोक केवल संधि के किसी एक प्रकार की चर्चा नहीं करता, बल्कि राजकीय निर्णय में परिस्थिति-विचार के महत्व को सामने रखता है।

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यह पोस्ट मूल रूप से Indian Philosophy and Ethics पर प्रकाशित हुई है।
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