कामन्दकीय नीतिसार का नवम सर्ग (सन्धिविकल्पप्रकरणम्) भारतीय राजनय-परम्परा में संधि-विग्रह के सूक्ष्म वर्गीकरण, संधि-योग्य एवं अनुपयुक्त राजाओं की पहचान, तथा परिस्थिति-अनुसार संधि के विवेकपूर्ण प्रयोग का महत्वपूर्ण स्रोत है। इस सर्ग में कुल ७८ श्लोक हैं।
"न जातु गच्छेद् विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान् ।
अद्रोहे समयं कृत्वा वृत्रम् इन्द्रः पुरावधीत् ॥"
- कामन्दकीय नीतिसार (श्लोक ५३)
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| नवम सर्ग (सन्धिविकल्प): संधि केवल युद्ध-विराम नहीं, बल्कि राज्यहित, शक्ति-संतुलन एवं दीर्घकालीन स्थिरता का साधन है। |
प्रस्तावना
क्या केवल युद्ध और विजय से राज्य की रक्षा सम्भव है? कामन्दक इस नवम सर्ग में उत्तर देते हैं - नहीं। वास्तविक विजय संधि-विवेक में निहित है। उन्होंने ७८ श्लोकों में संधि के सोलह प्रकार, चार अन्य संधियाँ, बीस अनुपयुक्त राजा, सात संधि-योग्य राजा, तथा 'कालयापन' एवं 'सङ्गत' की नीति का विवेचन किया है।
कालयापन - संधि की आत्मा (श्लोक १)
बलिना विगृहीतः सन् नृपोऽनन्यप्रतिक्रियः ।
आपन्नः सन्धिम् अन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम् ॥१॥
शब्दार्थ: बलिना (शक्तिशाली शत्रु से), विगृहीतः (युद्ध में पराजित), अनन्यप्रतिक्रियः (जिसके पास अन्य कोई उपाय न हो), आपन्नः (संकटग्रस्त), कालयापनम् (समय-क्षेप) करता हुआ संधि चाहे।
भावार्थ: जब राजा शक्तिशाली शत्रु से पराजित होकर निःसहाय हो जाए, तो उसे संधि करके समय प्राप्त करना चाहिए - और उस अवधि में सेना, कोश एवं मित्रों को पुनः संगठित करना चाहिए। 'काल' सबसे बड़ा परिवर्तक है - जो आज शक्तिशाली है, कल दुर्बल हो सकता है।
सोलह संधियों की सूची (श्लोक २-४)
कपाल उपहारश् च सन्तानः सङ्गतस् तथा ।
उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ॥२॥
अदृष्टनर आदिष्ट आत्मामिष उपग्रहः ।
परिक्रयस् तथोच्छिन्नस् तथा च परदूषणः ॥३॥
स्कन्धोपनेयः सन्धिश् च षोडशः परिकीर्तितः ।
इति षोडशकं प्राहुः सन्धिं सन्धिविचक्षणाः ॥४॥
सोलह संधियाँ हैं - कपाल, उपहार, सन्तान, सङ्गत, उपन्यास, प्रतीकार, संयोग, पुरुषान्तर, अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मामिष, उपग्रह, परिक्रय, उच्छिन्न, परदूषण, स्कन्धोपनेय।
सोलह संधियों की क्रमिक व्याख्या (श्लोक ५-१९)
श्लोक ५ - कपाल एवं उपहार
कपालसन्धिर् विज्ञेयः केवलं समसन्धिकः ।
सम्प्रदानाद् भवति य उपहारः स उच्यते ॥५॥
कपाल-संधि केवल 'समसन्धिक' - अर्थात् नाम-मात्र की संधि है। उपहार-संधि 'सम्प्रदान' (भेंट/कर) देकर की जाती है।
श्लोक ६ - सन्तान एवं सङ्गत
सन्तानसन्धिर् विज्ञेयो दारिकादानपूर्वकः ।
सद्भिः सङ्गतसन्धिस् तु मैत्रीपूर्व उदाहृतः ॥६॥
सन्तान-संधि कन्या-दान द्वारा होती है। सङ्गत-संधि सज्जनों द्वारा मैत्रीपूर्वक की जाती है।
श्लोक ७-८ - सङ्गत की श्रेष्ठता
यावदायुःप्रमाणस्तु समानार्थप्रयोजनः ।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च कारणैर्यो न भिद्यते ॥७॥
सङ्गतः सन्धिरेवेह प्रकृष्टत्वात् सुवर्णवत् ।
अपरैः सन्धिकुशलैः काञ्चनः स उदाहृतः ॥८॥
सङ्गत-संधि जीवन-पर्यन्त (यावदायुःप्रमाण) रहती है, समान हित एवं प्रयोजन पर आधारित होती है, तथा सुख-दुःख दोनों में अटूट रहती है। इसी श्रेष्ठता के कारण इसे 'सुवर्ण' के समान कहा गया है।
श्लोक ९ - उपन्यास
भव्याम् एकार्थसिद्धि तु समुद्दिश्य क्रियते यः ।
स उपन्यासकुशलैर् उपन्यास उदाहृतः ॥९॥
जब दो राजा किसी साझा लक्ष्य (भव्य एकार्थसिद्धि) की प्राप्ति के लिए अस्थायी संधि करते हैं, वह उपन्यास है।
श्लोक १०-११ - प्रतीकार
मयास्योपकृतं पूर्वम् अयं प्रतिकरिष्यति ।
इति यः क्रियते सन्धिः प्रतीकारः स उच्यते ॥१०॥
उपकारं करोम्य् अस्य ममाप्य् एष करिष्यति ।
अयं चापि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोर् इव ॥११॥
प्रतीकार-संधि पूर्व-उपकार की स्मृति पर आधारित होती है। राम-सुग्रीव का दृष्टान्त इसका उदाहरण है।
श्लोक १२ - संयोग
एकार्थाम् सम्यग् उद्दिश्य यात्रां यत्र हि गच्छतः ।
स संहतप्रयाणस् तु सन्धिः संयोग उच्यते ॥१२॥
जब दो राजा साझा लक्ष्य लेकर संयुक्त सैन्य-अभियान पर एक साथ जाते हैं - वह संयोग है।
श्लोक १३ - पुरुषान्तर
आवयोर् योधमुख्याभ्यां मदर्थः साध्यताम् इति ।
यस्मिन् पणः प्रक्रियते स सन्धिः पुरुषान्तरः ॥१३॥
पुरुषान्तर में दोनों राजा अपने योधमुख्यों (प्रमुख योद्धाओं) द्वारा कार्य-साधन की शर्त निर्धारित करते हैं।
श्लोक १४ - अदृष्टनर
त्वयैकेन मदीयार्थः सम्प्रसाध्यस् त्व् असाव् इति ।
यत्र शत्रुः पणं कुर्यात् सोऽदृष्टपुरुषः स्मृतः ॥१४॥
अदृष्टनर में शत्रु-राज्य में स्थित किसी गुप्त व्यक्ति द्वारा संधि की शर्त पूरी करवाई जाती है।
श्लोक १५ - आदिष्ट
यत्र भूम्येकदेशेन पणेन रिपुर् ऊर्जितः ।
सन्धीयते सन्धिविद्भिर् आदिष्टः स उदाहृतः ॥१५॥
आदिष्ट में भूमि के एक भाग को देकर शक्तिशाली शत्रु से संधि की जाती है।
श्लोक १६ - आत्मामिष एवं उपग्रह
स्वसैन्येन तु सन्धानम् आत्मामिष इति स्मृतः ।
क्रियते प्राणरक्षार्थं सर्वदानम् उपग्रहः ॥१६॥
आत्मामिष - 'आत्म' + 'आमिष' (मांस/भोग्य वस्तु) - अर्थात् अपनी सेना को शत्रु के लिए भोग्य वस्तु बना देना। उपग्रह में प्राण-रक्षा हेतु सर्वदान किया जाता है।
श्लोक १७ - परिक्रय
कोशांशेनाथ कृप्येन सर्वकोशेन वा पुनः ।
शेषप्रकृतिरक्षार्थं परिक्रय उदाहृतः ॥१७॥
परिक्रय में कोश के अंश, 'कृप्य' (टीका-अनुसार मूल्यवान् धातु/रत्न; शब्द-व्युत्पत्ति संदिग्ध) या सम्पूर्ण कोश को देकर शेष राज्य-अंगों की रक्षा की जाती है।
श्लोक १८ - उच्छिन्न एवं परदूषण
भुवां सारवतीनां तु दानाद् उच्छिन्न उच्यते ।
सर्वभूम्युत्थितफलदानेन परदूषणः ॥१८॥
उच्छिन्न में सारवती (उपजाऊ) भूमियों का दान किया जाता है। परदूषण में सम्पूर्ण भूमि से उत्पन्न समस्त फल (राजस्व) का दान किया जाता है, परन्तु भूमि अपने पास रखी जाती है।
श्लोक १९ - स्कन्धोपनेय
परिच्छिन्नं फलं यत्र स्कन्धस्कन्धेन नीयते ।
स्कन्धोपनेयं तं प्राहुः सन्धिं सन्धिविदो जनाः ॥१९॥
स्कन्धोपनेय में निर्धारित फल को 'स्कन्धस्कन्धेन' - अर्थात् भाग-भाग में (समूह-समूह में) - शत्रु को दिया जाता है।
चार अन्य संधियाँ (जिनमें उपहार मूल है) - श्लोक २०-२२
परस्परोपकारश् च मैत्रः सम्बन्धजस् तथा ।
उपहारश् च विज्ञेयाश् चत्वारोऽन्ये तु सन्धयः ॥२०॥
एक एवोपहारस् तु सन्धिर् एतन् मतं हि नः ।
उपहारस्य भेदास् तु सर्वेऽन्ये मैत्रवर्जिताः ॥२१॥
अभियोक्ता बली यस्माद् अलब्ध्वा न निवर्तते ।
उपहाराद् ऋते तस्मात् सन्धिर् अन्यो न विद्यते ॥२२॥
श्लोक २० में कामन्दक चार अन्य संधियों का वर्णन करते हैं - परस्परोपकार (पारस्परिक सहायता), मैत्र (सच्ची मैत्री), सम्बन्धज (विवाह/रक्त-सम्बन्ध), एवं उपहार (कर/भेंट)। परन्तु श्लोक २१-२२ में वे अपना स्पष्ट मत प्रस्तुत करते हैं - वास्तविकता में केवल 'उपहार' ही मूल संधि है; शेष सभी (सोलह + चार) उसी 'उपहार' के भेद हैं - केवल 'मैत्र' (सच्ची मित्रता) इस नियम से मुक्त है।
कामन्दक का तर्क है कि शक्तिशाली आक्रमणकारी बिना कुछ प्राप्त किए वापस नहीं लौटता। अतः दुर्बल राजा के पास 'उपहार' (कर/धन/भूमि) देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं।
बीस अनुपयुक्त राजा (श्लोक २३-२७)
बालो वृद्धो दीर्घरोगी तथा ज्ञातिबहिष्कृतः ।
भीरुको भीरुकजनो लुब्धो लुब्धजनस् तथा ॥२३॥
विरक्तप्रकृतिश् चैव विषयेष्व् अतिसक्तिमान् ।
अनेकचित्तमन्त्रश् च देवब्राह्मणनिन्दकः ॥२४॥
दैवोपहतकश् चैव दैवचिन्तक एव च ।
दुर्भिक्षव्यसनोपेता बलव्यसनसङ्कलः ॥२५॥
अदेशस्थो बहुरिपुर युक्तः कालेन यश च सः ।
सत्यधर्मव्यपेतश् च विंशतिः पुरुषा अमी ॥२६॥
एतैः सन्धिं न कुर्वीत विगृह्णीयात् तु केवलम् ।
एते विगृह्यमाणा हि ध्रुवं यान्ति रिपोर्वशम् ॥२७॥
श्लोक २३-२६ में बीस प्रकार के राजा गिनाए गए हैं, जिनसे संधि नहीं करनी चाहिए। श्लोक २७ में स्पष्ट आदेश है - इनसे विग्रह (युद्ध) करना चाहिए।
| # | राजा का प्रकार | स्वरूप |
|---|---|---|
| १ | बाल | अल्पवयस्क |
| २ | वृद्ध | अत्यन्त वृद्ध |
| ३ | दीर्घरोगी | चिररोगी |
| ४ | ज्ञातिबहिष्कृत | स्वजनों से बहिष्कृत |
| ५ | भीरुक | कायर |
| ६ | भीरुकजन | जिसके अनुयायी कायर हों |
| ७ | लुब्ध | लोभी |
| ८ | लुब्धजन | जिसके अनुयायी लोभी हों |
| ९ | विरक्तप्रकृति | जिसकी प्रकृतियाँ विमुख हों |
| १० | विषयासक्त | भोग-आसक्त |
| ११ | अनेकचित्तमन्त्र | अस्थिर-बुद्धि |
| १२ | देवब्राह्मणनिन्दक | धर्म-प्रतीकों का निन्दक |
| १३ | दैवोपहतक | दैव से आहत |
| १४ | दैवचिन्तक | केवल दैव पर निर्भर |
| १५ | दुर्भिक्षव्यसनोपेत | अकाल-पीड़ित |
| १६ | बलव्यसनसङ्कलः | सेना-व्यसन-ग्रस्त |
| १७ | अदेशस्थ | अपने स्थान से बाहर |
| १८ | बहुरिपु | अनेक शत्रुओं से घिरा |
| १९ | कालेन युक्त | प्रतिकूल-काल में |
| २० | सत्यधर्मव्यपेत | सत्य-धर्म-रहित |
बीस अनुपयुक्त राजाओं की विस्तृत व्याख्या (श्लोक २८-४१)
श्लोक २८ - बाल राजा
बालस्य ह्य् अप्रभावत्वान् न लोको योद्धम् इच्छति ।
योद्धम् स्वयम् अशक्तस्य परार्थे को हि युध्यते ॥२८॥
बाल-राजा में 'अप्रभावत्व' (प्रभाव/सामर्थ्य का अभाव) होता है; उसकी प्रजा एवं सेना उसके लिए युद्ध करने को तैयार नहीं होती। जो स्वयं युद्ध-असमर्थ है, वह दूसरों के लिए क्यों लड़ेगा?
श्लोक २९ - वृद्ध एवं दीर्घरोगी
उत्साहशक्तिहीनत्वाद् वृद्धो दीर्घमयस् तथा ।
स्वैर् एव परिभूयेते द्वाव् अप्य् एताव् असमासायम् ॥२९॥
वृद्ध एवं दीर्घरोगी राजा उत्साह-शक्ति से हीन होते हैं, अतः अपने ही अनुयायियों द्वारा पराभूत हो जाते हैं - बिना बाह्य शत्रु के।
श्लोक ३० - ज्ञातिबहिष्कृत
सुखोच्छेद्यो हि भवति सर्वज्ञातिबहिष्कृतः ।
त एवैनं विनिघ्नन्ति ज्ञातयस् त्व् आत्मसात्कृताः ॥३०॥
जो सभी ज्ञातियों से बहिष्कृत हो, वह सुखपूर्वक नष्ट किया जाता है; और जब शत्रु उसके स्वजनों को 'आत्मसात्' (अपने पक्ष में) कर लेता है, तो वे ही स्वजन उसे मार डालते हैं।
श्लोक ३१ - भीरु एवं भीरु-अनुयायी
भीरुर् युद्धपरित्यागात् क्षिप्रम् एव विनश्यति ।
वीरोऽप्य् अवीरपुरुषः सङ्ग्रामे तैर् विमुच्यते ॥३१॥
भीरु राजा युद्ध-त्याग से शीघ्र नष्ट होता है; वीर राजा भी यदि कायर-सेना वाला हो, तो युद्ध में अकेला छूट जाता है।
श्लोक ३२ - लुब्ध एवं लुब्ध-अनुयायी
लुब्धस्यासंविभागित्वान् न युध्यन्तेऽनुजीविनः ।
लुब्धानुजीवी तैर् एव दानभिन्नैर् निहन्यते ॥३२॥
लोभी राजा के अनुजीवी (सेवक) युद्ध नहीं करते, क्योंकि वह उनके साथ धन-सम्मान साझा नहीं करता। शत्रु उन्हें दान देकर अपने पक्ष में कर लेता है, और वे ही उसे मार डालते हैं।
श्लोक ३३ - विरक्तप्रकृति एवं विषयासक्त
सन्त्यज्यते प्रकृतिभिर् विरक्तप्रकृतिर् युधि ।
सुखाभियोगो भवति विषयेष्व् अतिसक्तिमान् ॥३३॥
विरक्त-प्रकृति राजा युद्ध में अपनी ही प्रकृतियों (मंत्री/सेना) द्वारा त्याग दिया जाता है; विषयासक्त राजा पर सुखपूर्वक आक्रमण किया जा सकता है।
श्लोक ३४ - अनेकचित्तमन्त्र
अनेकचित्तमन्त्रश् च द्वेष्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अनवस्थितचित्तत्वात् कार्ये तैः समुपेक्ष्यते ॥३४॥
अस्थिर-बुद्धि राजा अपने मंत्रियों के लिए द्वेष्य होता है; वे उसके कार्य में उपेक्षा करते हैं।
श्लोक ३५ - देवब्राह्मणनिन्दक एवं दैवोपहतक
सदा धर्मबलीयस्त्वाद् देवब्राह्मणनिन्दकः ।
विशीर्यते स्वयम् ह्य् एव दैवोपहतकस् तथा ॥३५॥
देव-ब्राह्मण-निन्दक धर्म की प्रबलता से स्वयं नष्ट होता है; दैवोपहतक (दैव/भाग्य से आहत) भी स्वयं ही ध्वस्त होता है।
श्लोक ३६ - दैवचिन्तक
सम्पत्तौ च विपत्तौ च दैवम् एव हि कारणम् ।
इति दैवपरो ध्यायन्न् आत्मना न विचेष्टते ॥३६॥
जो सुख-दुःख दोनों में दैव को ही कारण मानकर स्वयं प्रयत्न नहीं करता - वह दैवचिन्तक है।
श्लोक ३७ - दुर्भिक्षव्यसनी एवं बलव्यसनयुक्त
दुर्भिक्षव्यसनी चैव स्वयम् एवावसीदति ।
बलव्यसनयुक्तस्य योद्धुम् शक्तिर् न विद्यते ॥३७॥
अकाल-पीड़ित राज्य स्वयं पतित होता है; सेना-व्यसन-ग्रस्त राजा में युद्ध-शक्ति नहीं होती।
श्लोक ३८ - अदेशस्थ (मगर-हाथी दृष्टान्त)
अदेशस्थो हि रिपुणा स्वल्पकेनापि हन्यते ।
ग्राहोऽल्पीयान् अपि जले गजेन्द्रम् अपकर्षति ॥३८॥
अपने स्थान से बाहर राजा अत्यन्त छोटे शत्रु द्वारा भी मारा जाता है - जैसे जल में छोटा मगरमच्छ विशाल हाथी को खींचकर मार डालता है।
श्लोक ३९ - बहुरिपु (कबूतर-दृष्टान्त)
बह्वमित्रस् तु सन्नस्तः श्येनमध्ये कपोतवत् ।
येनैव गच्छति पथा तेनैवाशु विनश्यति ॥३९॥
बहु-शत्रुओं से घिरा राजा बाजों के मध्य कबूतर के समान भयभीत रहता है; जिस भी मार्ग से जाता है, उसी में शीघ्र नष्ट होता है।
श्लोक ४० - कालेन युक्त (उल्लू-कौआ दृष्टान्त)
अकालयुक्तसैन्यस् तु हन्यते कालयोधिना ।
कौशिकेन हतज्योतिर् निशीथ इव वायसः ॥४०॥
प्रतिकूल-समय में युद्ध करने वाला राजा अनुकूल-समय-योद्धा शत्रु द्वारा मारा जाता है - जैसे रात्रि में कौआ उल्लू द्वारा मारा जाता है।
श्लोक ४१ - सत्यधर्मव्यपेत
सत्यधर्मव्यपेतेन न सन्धध्यात् कथञ्चन ।
स सन्धितोऽप्य् असाधुत्वाद् अचिराद् याति विक्रियाम् ॥४१॥
सत्य एवं धर्म से रहित राजा के साथ किसी भी प्रकार से संधि न करें; वह संधि-बद्ध होकर भी अपनी असाधुता के कारण शीघ्र ही संधि-भंग कर देता है।
सात संधि-योग्य राजा (श्लोक ४२)
सत्यार्यौ धार्मिकानार्यौ भ्रातृसङ्घातवान् बली ।
अनेकविजयी चेति सन्धेयाः सप्त कीर्तिताः ॥४२॥
सात प्रकार के राजा संधि-योग्य हैं - (१) सत्य, (२) आर्य, (३) धार्मिक, (४) अनार्य, (५) भ्रातृसङ्घातवान्, (६) बली, (७) अनेकविजयी।
सात संधि-योग्य राजाओं की विस्तृत व्याख्या (श्लोक ४३-४९)
श्लोक ४३ - सत्य-पालक राजा
सत्योऽनुपालयन् सत्यं सन्धितो नैति विक्रियाम् ।
प्राणभेदेष्व् अपि व्यक्तम् आर्यो नायात्य् अनार्यताम् ॥४३॥
सत्य-पालक राजा संधि-बद्ध होकर उसे नहीं तोड़ता - चाहे प्राणों पर संकट आ जाए। आर्य (शिष्ट) राजा कभी 'अनार्यता' (असभ्यता/छल) को नहीं अपनाता।
श्लोक ४४ - धार्मिक राजा
धार्मिकस्याभियुक्तस्य सर्वा एव हि युध्यते ।
प्रजानुरागाद् धर्माच् च दुःखोच्छेद्यो हि धार्मिकः ॥४४॥
धार्मिक राजा पर आक्रमण होने पर उसकी सारी प्रजा (प्रजानुराग) एवं धर्म के कारण युद्ध करती है, अतः वह कठिनाई से नष्ट किया जा सकता है।
श्लोक ४५ - अनार्य राजा
सन्धिः कार्यो ह्य् अनार्येण सम्प्राप्योत्सादयेद् हि सः ।
रेणुकायाः सुत इव मूलेष्व् अपि न तिष्ठति ॥४५॥
भावार्थ: अनार्य (आर्य-गुण-रहित, किन्तु शत्रु-नाश में समर्थ एवं प्रभावी) राजा के साथ संधि करनी चाहिए - क्योंकि वह शत्रु-राज्य को समूल नष्ट कर देता है, जैसे परशुराम ने क्षत्रियों को जड़ से नहीं रहने दिया।
श्लोक ४६ - भ्रातृसङ्घातवान् (बाँस-दृष्टान्त)
सङ्घातवान् यथा वेणुर् निबिडः कण्टकैर् वृतः ।
न शक्यते समुच्छेत्तुम् भ्रातृसङ्घातवांस् तथा ॥४६॥
संगठित-भाइयों-वाला राजा घने बाँस-वन के समान है, जो काँटों से घिरा हो - उसे समूल-नष्ट नहीं किया जा सकता।
श्लोक ४७ - बली (सिंह-हरिण दृष्टान्त)
समाक्रान्तस्य बलिना सर्वयत्नवतोऽपि हि ।
हरिणस्येव सिंहेन शरणम् नाविद्यते ॥४७॥
बलवान राजा द्वारा आक्रान्त पीड़ित के पास, सम्पूर्ण-प्रयत्न करने पर भी, बचाव नहीं होता - जैसे सिंह से घिरे हरिण को।
श्लोक ४८ - अनेकविजयी (सिंह-हाथी दृष्टान्त)
ईषद् आयच्छमानोऽपि सिंहो मत्तान् अपि द्विपान् ।
निहन्ति बलवांस् तस्मात् सन्धेयः शिवम् इच्छता ॥४८॥
अनेक-विजयी राजा सिंह-तुल्य है - थोड़े-से प्रयास से मद-मस्त हाथियों को मार डालता है; अतः कल्याण चाहने वाले राजा को उससे संधि करनी चाहिए।
श्लोक ४९ - बलवान से युद्ध-निषेध (वायु-मेघ दृष्टान्त)
बलिना सह योद्धव्यम् इति नास्ति निदर्शनम् ।
प्रतिवातम् न हि घनः कदाचिद् उपसर्पति ॥४९॥
बलवान से युद्ध करने का कोई उदाहरण नहीं; बादल कभी वायु के विपरीत नहीं बढ़ता - अतः दुर्बल को बलवान से संधि करनी चाहिए।
स्वतंत्र नीति-सूत्र - नम्रता एवं प्रताप (श्लोक ५०-५२)
ये तीन श्लोक सात संधि-योग्य राजाओं की सूची का भाग नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र नीति-सूत्र हैं - बलवान के प्रति नम्रता एवं अनेक-विजयी के प्रताप के बारे में।
बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमताम् अपि ।
सम्पदो नापगच्छन्ति प्रतिपम् इव निम्नगाः ॥५०॥
जमदग्नेः सुतस्येव सर्वः सर्वत्र सर्वदा ।
अनेकयुद्धजयिनः प्रतापाद् एव भिध्यते ॥५१॥
अनेकयुद्धविजयी सन्धानम् यस्य गच्छति ।
तत्प्रतापेन तस्याशु वशम् गच्छन्ति विद्विषः ॥५२॥
बलवान को समय पर प्रणाम करने वालों की सम्पदा नष्ट नहीं होती - जैसे नदियाँ विपरीत दिशा में नहीं बहतीं। अनेक-विजयी राजा के प्रताप से सभी शत्रु भयभीत होकर उसके वश हो जाते हैं - जैसे परशुराम के प्रताप से समस्त क्षत्रिय।
संधि के बाद सावधानी (श्लोक ५३)
न जातु गच्छेद् विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान् ।
अद्रोहे समयं कृत्वा वृत्रम् इन्द्रः पुरावधीत् ॥५३॥
बुद्धिमान् राजा संधि कर लेने पर भी कभी पूर्ण-विश्वास न करें - जैसे इन्द्र ने वृत्र से 'अद्रोह' (द्रोह न करने) की प्रतिज्ञा करके भी उसे मार डाला।
यह श्लोक पूरे सर्ग का संतुलन प्रदान करता है - 'सङ्गत' की प्रशंसा और राजनीतिक सावधानी, दोनों साथ चलते हैं।
शक्ति एवं संधि (श्लोक ५४-५८)
विकारम् याति पुत्रोऽपि राज्यलीढस् तथा पिता ।
तत् लोकवृत्तान् नृपतेर् अन्यद् वृत्तम् प्रचक्षते ॥५४॥
अभियुक्तो बलवता तिष्ठन् दुर्गे प्रयत्नवान् ।
तद्बलीयस्तराह्वानम् कुर्वीतात्मविमुक्तये ॥५५॥
स्वशक्त्युत्साहम् उद्वीक्ष्य विगृह्णीयान् महत्तरम् ।
केसरीव द्विपम् इति भरद्वाजः प्रभाषते ॥५६॥
एकोऽपि सिंहः साहसं यूथम् मथ्नाति दन्तिनाम् ।
तस्मात् सिंह इवोदग्राम् आत्मानम् विश्व सम्पतेत् ॥५७॥
ज्यायांसमल्पसैन्यस्य बलाद् विक्रम्य निघ्नतः ।
प्रतापसिद्धाः सर्वत्र भवन्ति रिपवो वशे ॥५८॥
श्लोक ५४: राज्य-सत्ता का स्वाद लेने पर पुत्र-पिता भी विकृत हो जाते हैं - यह सत्ता-मोह की भयानकता है।
श्लोक ५५: बलवान शत्रु से आक्रान्त राजा दुर्ग में स्थित रहे, प्रयत्नशील रहे, और अधिक-बलवान मित्र का आह्वान करे।
श्लोक ५६-५८ (भरद्वाज-मत): स्व-शक्ति एवं उत्साह देखकर बड़े शत्रु से भी युद्ध करें - जैसे सिंह हाथी पर आक्रमण करता है। यह आत्म-विश्वास एवं साहस को प्रधानता देने वाला विशिष्ट मत है।
समान-बल में संधि: बृहस्पति-मत (श्लोक ५९-६१)
सन्धिम इच्छेत् समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि ।
न हि संशयितम् कुयाद् इत्य् उवाच बृहस्पतिः ॥५९॥
आ सम्प्रावृद्धिर् अभिवृद्धिकामः समेन सन्धानम् इहोपगच्छेत् ।
अपक्वयोर् वा घटयोर् अवश्यम् अन्योन्यभेदी समसन्निपातः ॥६०॥
युद्धे विनाशो नियतः कदाचिद् उभयोर् अपि ।
सुन्दोपसुन्दाव् अन्योन्यम् समवीर्यो हतौ न किम् ॥६१॥
बृहस्पति-मत के अनुसार, समान-बल वाले से भी संधि करनी चाहिए, क्योंकि युद्ध में विजय अनिश्चित है। 'अपक्व-घट' का दृष्टान्त - दो कच्चे घड़ों का टकराव दोनों को तोड़ता है। 'सुन्द-उपसुन्द' का दृष्टान्त - समान-बल वाले दो भाई आपस में लड़कर दोनों मारे गए।
यह 'बृहस्पति-मत' समान-बल की विशिष्ट परिस्थिति का मत है - जहाँ युद्ध में दोनों का विनाश संभव है, वहाँ संधि करनी चाहिए।
संधि की जटिल परिस्थितियाँ (श्लोक ६२-७२)
श्लोक ६२ - व्यसनी शत्रु से संधि
विहीनोऽपि हि सन्धेयो व्यसने रिपुर् आगतः ।
पतन् दुनोति हिमवत् तोयबिन्दुर् इव क्षते ॥६२॥
भावार्थ: संकट-ग्रस्त शत्रु, चाहे दुर्बल ही क्यों न हो, संधि-योग्य है - क्योंकि वह घाव पर गिरती ठंडी जल-बूँद के समान पीड़ा देता है (अर्थात् और संकट में पड़कर कष्टकारी हो सकता है, अतः उसे संधि द्वारा वश में कर लेना चाहिए)।
श्लोक ६३-६६ - विश्वास-घात की नीति
न सन्धिम् इच्छेद् धीनश् चेत् तत्र हेतुर् असंशयः ।
तस्य विस्रम्भम् आलभ्य प्रहरेत् तत्र निःस्पृहः ॥६३॥
बलीयसाभिसन्धाय तम् प्रविश्य प्रयत्नवान् ।
तथासाव् उपगन्तव्यो यथा विस्रम्भम् आप्नुयात् ॥६४॥
विस्रम्भे नित्यम् उद्युक्तो निगूढाकारचेष्टितः ।
प्रियाण्य् एवाभिभाषेत यत् कार्यम् कार्यम् एव तत् ॥६५॥
विस्रम्भात् प्रियताम् एति विस्रम्भात् कार्यम् ऋच्छति ।
विस्रम्भेण हि देवेन्द्रो दितेर् गर्भम् अपाटयत् ॥६६॥
यदि शत्रु दुर्बल है, तो संधि न करें - उसका विश्वास प्राप्त करके प्रहार करें। यदि बलवान है, तो संधि करके उसका विश्वास अर्जित करें, और फिर मार डालें। इन्द्र ने दिति के गर्भ को नष्ट किया - यही विश्वास-घात की नीति है।
श्लोक ६७-६९ - आन्तरिक विद्रोह एवं मंत्री-दूषण
युवराजेन सन्धाय प्रधानपुरुषेण वा ।
अन्तःप्रकोपम् जनयेद् अभियोक्तुः स्थिरात्मनः ॥६७॥
अर्थोत्सर्गेण महता लेखैश् चाप्य् आत्मसंहितैः ।
प्रधानपुरुषस्येह प्रकुर्यीतार्थदूषणम् ॥६८॥
दूषिते हि महामात्रे रिपुर् उग्रोऽपि धीमता ।
स्वपक्षे यात्य् अविश्वासम् इत्यम्भूतश् च निष्क्रियः ॥६९॥
स्थिर-आत्मा शत्रु को बाहर से न हराकर, उसके युवराज या प्रधान-पुरुष से सम्पर्क करके आन्तरिक-विद्रोह उत्पन्न करें। भारी धन-त्याग एवं गुप्त-लेखों द्वारा शत्रु के प्रधान-पुरुष का 'अर्थ-दूषण' करें।
श्लोक ७०-७२ - गुप्त-हत्या एवं मनोवैज्ञानिक-युद्ध
अरेर् अमात्यान् सन्धाय तदारम्भम् शमम् नयेत् ।
भिषग्भेदेन वा शत्रुम् रसदानेन शातयेत् ॥७०॥
अरेः सर्वप्रयत्नेन पश्चात्कोपम् प्रकल्पयेत् ।
पश्चात्कोपम् अथानिष्टम् अनुसृत्य प्रधर्षयेत् ॥७१॥
तद्देशकृतसंवासैश् चारैर् नैमित्तिकैर् अपि ।
उपोढव्यसनादेशम् कारयेत् सिद्धलक्षणैः ॥७२॥
शत्रु के अमात्यों से संधि करके उसके आक्रमण को शान्त करें; अथवा वैद्य-वेश या विष-युक्त-भोजन द्वारा शत्रु को नष्ट करें। पीछे विद्रोह उत्पन्न करें, और सामने से आक्रमण करें। गुप्तचरों द्वारा मनोवैज्ञानिक-आतंक उत्पन्न करें।
विग्रह से बचने की नीति (श्लोक ७३-७७)
क्षयव्ययायासवधादिदोषव्यपेक्षयान्वीक्षितसाधुकृत्यः ।
कामम् तु पीडाम् अपि काञ्चिद् इच्छेन् न विग्रहम् तत्प्रभवा हि दोषाः ॥७३॥
कलत्रम् आत्मा सुहृदो धनानि वृथा भवन्तीह निमेषमात्रात् ।
मुहुर् मुहुश् चाकुलितानि तानि तस्मान् न विद्वान् अतिविग्रही स्यात् ॥७४॥
सुहृद्धनम् तथा राज्यम् आत्मानम् कीर्तिम् एव च ।
युधि सन्देहदोलास्थम् को हि कुयाद् अबालिशः ॥७५॥
साम्ना प्रदानेन विभेदनेन सन्धापयेत् साध्व् अभियुज्यमानः ।
सन्धित्सुर आरात् समसैन्यचक्रम् सामन्तम् आयान्तम् अपेतसन्धिम् ॥७६॥
स्वगुप्तिम् आधाय सुसंहतेन बलेन धीरो विचरन्न् अरातिम् ।
सन्तापयेद् येन सुसम्प्रतप्तस् तप्तेन सन्धानम् उपैति तप्तः ॥७७॥
श्लोक ७३: राजा को युद्ध के दोषों (क्षय, व्यय, आयास, वध) का मूल्यांकन करके उचित-नीति निर्धारित करनी चाहिए; थोड़ी-सी पीड़ा सहन करनी चाहिए, परन्तु युद्ध नहीं करना चाहिए।
श्लोक ७४: पत्नी, प्राण, मित्र, धन - ये सब क्षण-मात्र में नष्ट हो सकते हैं; अतः बुद्धिमान् अति-युद्ध-प्रिय न हो।
श्लोक ७५: मित्र, धन, राज्य, प्राण, कीर्ति - इन सबको युद्ध की संदेह-दोला पर कौन बुद्धिमान् रखेगा?
श्लोक ७६: आक्रमण-ग्रस्त होने पर 'साम', 'दान', और 'भेद' द्वारा संधि करवानी चाहिए।
श्लोक ७७: सुसंगठित सेना से शत्रु को संतापित (परेशान) करना चाहिए - जिससे वह संधि के लिए विवश हो जाए।
अन्तिम विवेक (श्लोक ७८)
"इति स्म सन्धिं खलु सन्धिवित्तमा बभाषिरे पूर्वतना महर्षयः ।
तद एतद एवं विनयेन् नरेश्वरः संवीक्ष्य कार्यं गुरु चेतरद् द्विधा ॥"
- कामन्दकीय नीतिसार (श्लोक ७८)
प्राचीन महर्षियों ने इस प्रकार संधि-शास्त्र का उपदेश दिया है। राजा को इस शास्त्र का अनुसरण तो करना चाहिए, परन्तु सर्वप्रथम अपने कर्तव्यों (कार्य) की भली-भाँति विवेचना (संवीक्ष्य) करके 'गुरु' (अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रबल कार्य) और 'इतर' (सामान्य कार्य) में विभाजन करे। तत्पश्चात्, अपनी बुद्धि (विवेक) से उचित निर्णय करे।
'संवीक्ष्य कार्यम्' विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है - अर्थात् नीति का प्रयोग परिस्थिति के परीक्षण के बाद किया जाना चाहिए। 'शास्त्र' मार्गदर्शक है, अन्तिम-निर्णय राजा के विवेक का है।
कौटिल्य अर्थशास्त्र से तुलना
| विषय | कौटिल्य (अर्थशास्त्र, सप्तम अधिकरण) | कामन्दक (नीतिसार, नवम सर्ग) |
|---|---|---|
| संधि के प्रकार | १६ संधियों का उल्लेख (सप्तम अधिकरण, अध्याय १) | १६ + ४ = २० संधियों का विस्तृत वर्गीकरण |
| श्रेष्ठ संधि | संधि-विग्रह का संतुलन (अध्याय २) | 'सङ्गत' (सच्ची मैत्री) को श्रेष्ठतम कहा |
| सम-हीन-ज्यायस् | सम, हीन एवं ज्यायस् से व्यवहार (अध्याय ३) | बृहस्पति-मत (श्लोक ५९-६१) |
| अनुपयुक्त राजा | संधि-योग्यता के संकेत (अध्याय १५-१८) | २० प्रकारों की विस्तृत सूची (श्लोक २३-४१) |
| योग्य राजा | संधि-पात्र के गुण (अध्याय १५-१८) | ७ प्रकार (श्लोक ४२-४९) |
| संधि के बाद | सावधानी का संकेत | श्लोक ५३ में स्पष्ट - पूर्ण विश्वास न करें |
| अन्तिम दृष्टि | राज्य-रक्षा ही परम धर्म | शास्त्र मार्गदर्शक, विवेक सर्वोपरि |
निष्कर्ष
नवम सर्ग (सन्धिविकल्पप्रकरणम्) कामन्दकीय नीतिसार में संधि-विवेक और राजनयिक व्यवहार का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। यह राजा को केवल संधि-कला नहीं, बल्कि समग्र-विदेश-नीति, शक्ति-संतुलन, एवं शत्रु-प्रबन्धन की सम्पूर्ण कला सिखाता है। सर्ग का केंद्रीय सन्देश - 'शास्त्र' मार्गदर्शक है, 'विवेक' सर्वोपरि।
'न जातु गच्छेद् विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान्' - संधि करना और संधि पर अंधविश्वास करना, दोनों अलग बातें हैं। यही नवम सर्ग का शाश्वत सन्देश है।
यह लेख मूल संस्कृत पाठ (कामन्दकीय नीतिसार, नवम सर्ग) एवं पारम्परिक व्याख्याओं पर आधारित है। सभी श्लोक-संदर्भ मूल पाठ से मिलाए गए हैं।
कामन्दकीय नीतिसार नवम सर्ग (सन्धिविकल्पप्रकरणम्): संधि-नीति का शास्त्रीय मार्गदर्शन. Indian Philosophy & Ethics Blog.
