नीतिशास्त्र का अध्ययन करते हुए कई बार ऐसा होता है कि कोई एक श्लोक आपको अचानक ठहरने पर मजबूर कर देता है। आप पन्ने पर आँखें गड़ाए सोचते रह जाते हैं, यह बात तो पहले कभी सोची ही नहीं थी।
कामन्दकीय नीतिसार के नौवें सर्ग में भी हमें ऐसा ही एक श्लोक मिलता है। यह पूरा सर्ग उन जटिल परिस्थितियों को उजागर करता है जहाँ शत्रु और मित्र के बीच की सीमाएँ धुँधली पड़ने लगती हैं, कब युद्ध करना उचित है, कब विराम लेना चाहिए, और कब वह व्यक्ति, जिसे आप अब तक दुश्मन मानते आए हैं, उससे हाथ मिलाना ही बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय हो सकता है।
विहीनोऽपि हि सन्धेयो व्यसने रिपुर् आगतः ।
पतन्दुनोति हिमवत्तोयबिन्दुर् इव क्षते ॥ ६२ ॥
इसे पढ़कर मन में पहली बात यही उठती है, क्या कह रहे हैं ये? शत्रु मुसीबत में है, तो उससे संधि क्यों करें? यही तो वक्त है उसे निपटाने का। लेकिन कामन्दक इतने सीधे नहीं हैं। वे एक ऐसी उपमा देते हैं जो दिमाग में घर कर जाती है, घाव पर गिरती बर्फ की बूँद।
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| कच्चे घाव पर ठंडी बूँद का पड़ना जितना राहत देता है, उतना ही चुभता भी है, बिल्कुल उस संधि की तरह जो संकटग्रस्त शत्रु के साथ की जाती है। |
शब्दार्थ
श्लोक के शब्द अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं-
- विहीनः - जिसके पास कुछ न बचा हो, साधन खाली हों।
- सन्धेयः - जिससे संधि की जा सके।
- व्यसनम् - विपत्ति, वह मुसीबत जो अपने आप आ गिरी हो।
- रिपुः - शत्रु। और गौर करें, कामन्दक ने 'प्रतिद्वंद्वी' या 'विरोधी' जैसा कोई मुलायम शब्द नहीं चुना, साफ-साफ 'रिपु' कहा है।
- आगतः - आया हुआ, यानी खुद चलकर आया है।
- हिमवत्-तोय-बिन्दुः - पारंपरिक अर्थ में हिमालय/बर्फीले पर्वत के जल की बूँद; कम से कम इतना तय है कि यह असामान्य रूप से ठंडी बूँद है।
- क्षते - घाव पर।
- दुनोति - पीड़ा देता है, चुभता है।
अब इन शब्दों को जोड़िए। अर्थ कुछ यूँ बनता है-
जब शत्रु संकट में पड़ा हो, उसके पास कुछ बचा न हो, और वह खुद आकर संधि की ओर आए तब उससे संधि का विचार किया जा सकता है, लेकिन उसे निश्चिंत होकर स्वीकार करना दूसरी बात है। जैसे कच्चे घाव पर अत्यंत ठंडी जल-बूँद पड़े तो वह चुभती है और उस स्पर्श में पीड़ा होती है। बस इतनी-सी बात में कामन्दक ने कूटनीति का पूरा पाठ रख दिया है। हर सुलह में एक अजीब सी चुभन होती है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
वह उपमा जो पीछा नहीं छोड़ती
मुझे इस श्लोक ने पहली बार उसी वक्त पकड़ा था, जब मैंने यह उपमा पढ़ी, घाव और बर्फ की बूँद। घाव पर गिरती ठंडी बूँद की कल्पना अपने भीतर एक विचित्र विरोधाभास रखती है-ठंडक का स्पर्श, लेकिन घाव के कारण उसी स्पर्श में पीड़ा। उपमा का सीधा आशय तो घाव पर पड़ने वाली ठंडी बूँद की पीड़ा और चुभन से है; मुझे इसमें संकटग्रस्त शत्रु के साथ संधि की एक ऐसी स्थिति दिखाई देती है, जिसमें तत्काल राहत और भविष्य की आशंका दोनों साथ मौजूद हैं। कामन्दक कहना यह चाहते हैं कि यह विकल्प उतना सीधा नहीं, जितना दिखता है; इसमें फ़ायदा है, जोखिम भी है। दोनों साथ-साथ चलते हैं, अलग नहीं। और इसी कारण यह उपमा बार-बार मन में घूमती है क्योंकि यह किसी एक जवाब पर नहीं ठहरती, बल्कि हर बार नया अर्थ देती है।
'विहीनोऽपि'- इसी में छिपी है बात
श्लोक की शुरुआत 'विहीनोऽपि' से होती है-भले ही वह विहीन हो, उसके पास कुछ न बचा हो तब भी। यह 'तब भी' बहुत गहरा है। कामन्दक यह नहीं कहते कि हर कमज़ोर दुश्मन से संधि कर लो। वे कहते हैं कमज़ोरी देखकर लापरवाह मत हो जाओ। कमज़ोर और मरा हुआ एक बात नहीं है। इसीलिए जब कामन्दक 'विहीनोऽपि' कहते हैं, तो वे यह चेतावनी दे रहे हैं: कमज़ोरी का मतलब शक्तिहीनता नहीं है। जो आज टूटा दिख रहा है, वह कल जुड़ सकता है और जुड़ने के बाद वही घाव पर बर्फ़ की बूँद जैसा चुभ सकता है। इसलिए संधि करते वक्त भी पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।
संधि कमज़ोरी नहीं, एक साधन है
बहुतों को लगता है कि दुश्मन से हाथ मिलाना हार मान लेना है। कामन्दक की दुनिया में बिल्कुल नहीं। नवम सर्ग संधि को युद्ध की ही तरह राजनीति का एक साधन मानता है, कई बार युद्ध से अधिक उपयुक्त, बशर्ते वह सही समय पर की जाए। युद्ध और संधि दोनों के अपने जोखिम हैं, बस उनका स्वरूप अलग है। एक में खुला संघर्ष है, दूसरे में चुपचाप तौलना। और कामन्दक कहते हैं कि बुद्धिमान वही है जो दोनों के बीच का भेद पहचाने, न कि एक को हमेशा सही और दूसरे को हमेशा गलत मान ले।
संकट में पड़ा शत्रु
आइए, अब इसी बात को थोड़ा और खोलें।
संकट में पड़ा शत्रु सबसे आसान शत्रु दिखाई देता है। शायद इसी जगह सबसे अधिक सावधानी चाहिए। उसकी आज की दुर्बलता को उसकी स्थायी दुर्बलता मान लेना नीति की भूल हो सकती है। कामन्दक नवम सर्ग में जिस बड़ी कला की बात करते हैं, वह यह पहचानना है कि इस क्षण लड़ना ज़रूरी है, या रुककर संधि करना या बस प्रतीक्षा करना अधिक समझदारी होगी। कामन्दक का आग्रह किसी एक रास्ते पर अड़े रहने का नहीं, परिस्थिति को समझकर रास्ता चुनने का है।
जब यह घाव आज दिखता है
संकट में जल्दबाज़ी मत करो-यही एक बात है जो मैं इस श्लोक से आज की ज़िंदगी में उठाकर ला सकता हूँ। दबाव होता है, मैं जानता हूँ। लेकिन जो फैसला आज की घबराहट में लेंगे, उसके नतीजे कल भुगतने पड़ सकते हैं। समझौता करना हार नहीं है, कई बार एक कदम पीछे हटना आगे की बड़ी छलाँग की तैयारी होती है। बस इतना-सा आज का अर्थ-हर फ़ैसले का असर कल पर पड़ता है, और आज की घबराहट कल के विवेक को हरा नहीं सकती। बाकी कामन्दक ने कहा, मैंने सुना, और सोचता रहा।
आखिरी बात, और एक सवाल
घाव पर गिरती बर्फ की बूँद-यह उपमा मुझे बार-बार याद आती है। कामन्दक जवाब नहीं देते, वे सही सवाल पूछना सिखाते हैं।
सोचिए, अगर आपका कोई पुराना विरोधी, जिससे बरसों की कड़वाहट रही हो, आज किसी मुश्किल में फँसकर आपके पास आए और कहे, "चलो, मिलकर चलते हैं," तो आप क्या करेंगे? पुरानी कड़वाहट याद रखेंगे, या आज की परिस्थिति तौलेंगे?
संधि करेंगे, लड़ेंगे, या चुपचाप देखते रहेंगे?
मुझे लगता है, इसी का नाम नीति है-सही जवाब नहीं, सही सवाल पूछने की कला।
