कामन्दकीय नीतिसार, दशम सर्ग, श्लोक 6: विग्रह-प्रशमन की राजनीति
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग में विग्रह के कारणों और उनके प्रशमन पर विचार मिलता है। षष्ठ श्लोक में राज्य, स्त्री, स्थान और देश से जुड़े विवादों के संदर्भ में दान और दम को विग्रह-प्रशमन का उपाय बताया गया है। इसे केवल युद्ध या संधि के सामान्य सिद्धांत के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। इसका ध्यान उस स्थिति पर है जहाँ अधिकार, राजकीय संपत्ति, राजकुल की स्त्री, दुर्ग अथवा भूभाग को लेकर संघर्ष उत्पन्न हो चुका हो और उसे शांत करना हो। ऐसे में कामन्दक केवल बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं रहते; वे रियायत और संयम-दोनों को नीति का अंग मानते हैं।
यहाँ दान का अर्थ सामान्य धार्मिक या परोपकारी दान नहीं है। राजकीय संदर्भ में यह ऐसी रियायत, त्याग या प्रदेय है जिसके द्वारा विग्रह को शांत करने का प्रयत्न किया जाए। दूसरी ओर दम आचरण और प्रतिक्रिया पर संयम रखने का संकेत देता है; व्यापक अर्थ में इसमें नियंत्रण और अनुशासन का भाव भी है।
इस प्रकार श्लोक का केंद्रीय प्रश्न यह है-
जब किसी अधिकार को लेकर विग्रह उत्पन्न हो जाए, तब उसे किस प्रकार शांत किया जाए?
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| राज्य, स्त्री, स्थान और देश के विवाद में दान और दम-विग्रह-प्रशमन का कामन्दकीय सूत्र। |
संस्कृत श्लोक
प्रस्तुत विवेचन में ‘दमेन’ पाठ को आधार बनाया गया है:
राज्यस्त्रीस्थानदेशानां दानेन च दमेन च ।
विग्रहस्य तु युक्तिज्ञैः प्रशमनं परं स्मृतम् ॥ ६ ॥
पाठ-टिप्पणी: कुछ संस्करणों में ‘दमेन’ के स्थान पर ‘मदेन’ पाठ मिलता है, पर टीका-संदर्भ में ‘दमेन’ अधिक संगत है। अंतिम चरण में ‘प्रशमनं परं स्मृतम्’ का अर्थ है-प्रशमन श्रेष्ठ माना गया है। यदि किसी संस्करण में ‘परं’ नहीं है, तो उसका पाठ अलग होगा; उद्धरण देते समय संस्करण का अक्षरशः पालन करना चाहिए।
पदच्छेद और शब्दार्थ
राज्य-स्त्री-स्थान-देशानाम् | दानेन च दमेन च | विग्रहस्य तु | युक्तिज्ञैः | प्रशमनम् | परम् | स्मृतम्।
शब्दार्थ
राज्य - राज्य, राजसत्ता अथवा शासनाधिकार।
स्त्री - राजकुल की स्त्री। राजतंत्रीय संदर्भ में यह उत्तराधिकार, वैवाहिक संबंध अथवा राजकुल के सम्मान से जुड़ा राजनीतिक विषय हो सकती थी। इसे सीधे आधुनिक अर्थों में ‘नारी’ की व्यापक अवधारणा के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।
स्थान - ऐसा महत्त्वपूर्ण स्थान, दुर्ग अथवा सामरिक अधिकार-क्षेत्र, जिस पर विवाद हो सकता हो।
देश - भूभाग अथवा राज्य-संबंधी क्षेत्र।
दानेन - देने, त्याग करने, रियायत अथवा प्रदेय के द्वारा। राजनीतिक संदर्भ में यह समायोजन अथवा संधि-सुविधा का रूप भी ले सकता है।
दमेन - संयम, आत्मनियंत्रण अथवा अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित रखने से। यह ‘दमन’ से भिन्न है।
विग्रहस्य - विग्रह का; संघर्ष, विरोध या युद्ध की स्थिति का।
युक्तिज्ञैः - नीति और परिस्थिति की युक्ति को समझने वाले लोगों द्वारा।
प्रशमनम् - शांत करना, कम करना अथवा समाप्ति की दिशा में ले जाना।
परम् - श्रेष्ठ, उत्तम।
स्मृतम् - माना गया है, कहा गया है।
भावार्थ
राज्य, राजकुल की स्त्री, दुर्ग अथवा किसी महत्त्वपूर्ण स्थान और भूभाग से संबंधित विवाद से यदि विग्रह उत्पन्न हो जाए, तो उसे शांत करने के लिए दान और दम का सहारा लिया जा सकता है। यहाँ दान का आशय ऐसी राजनीतिक रियायत या त्याग से है, जिससे संघर्ष को सीमित या समाप्त करने का मार्ग बने। दम का आशय अपने आचरण और प्रतिक्रिया पर संयम रखने से है।
इस प्रकार श्लोक का आशय केवल इतना नहीं है कि युद्ध से बचना चाहिए। वह इससे आगे जाकर यह बताता है कि विग्रह के कारण को पहचानकर उसी के अनुरूप उसका प्रशमन करना चाहिए। इसके लिए परिस्थिति की युक्ति को समझने वाले नीतिज्ञ की आवश्यकता है।
दान और दम: दो राजनीतिक उपाय
श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण पद है-
“दानेन च दमेन च”
इन दोनों शब्दों को साथ पढ़ने पर विग्रह-प्रशमन की दो दिशाएँ सामने आती हैं।
दान: रियायत या त्याग
राजकीय संदर्भ में ‘दान’ को सामान्य उपहार के अर्थ में लेना उचित नहीं होगा। यहाँ इसका संबंध ऐसी रियायत या त्याग से है, जो विवाद को शांत करने के लिए किया जाए।
प्रस्तुत अंग्रेज़ी अनुवाद में इस विचार को और स्पष्ट किया गया है। यदि कोई शासक आक्रमण का सामना कर रहा हो और अपने शेष राज्य को बचाने के लिए किसी भूभाग का एक हिस्सा छोड़ने को तैयार हो, तो यह एक प्रकार की राजनीतिक रियायत हो सकती है। इसके विपरीत यदि कोई शासक आक्रमण करके किसी क्षेत्र पर अधिकार कर चुका हो, तो विग्रह को शांत करने का उपाय उस क्षेत्र को छोड़कर पूर्व स्थिति बहाल करना हो सकता है।
इस प्रकार ‘दान’ का राजनीतिक रूप परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है। उसका उद्देश्य किसी वस्तु का दान मात्र नहीं, बल्कि विवाद को शांत करने योग्य समायोजन करना है।
दम: आत्मसंयम और नियंत्रण
‘दम’ इस प्रक्रिया का दूसरा पक्ष है।
विवाद में केवल बाहरी रियायत पर्याप्त नहीं होती। यदि किसी पक्ष की प्रतिक्रिया लगातार तीखी होती रहे, तो किया गया समझौता भी टिक नहीं सकता। इसलिए अपने आचरण, आग्रह और प्रतिक्रिया को नियंत्रित रखना आवश्यक है।
इस अर्थ में दान और दम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दान विवाद के बाहरी कारण में रियायत का मार्ग खोलता है, जबकि दम अपने आचरण और प्रतिक्रिया पर संयम रखने की अपेक्षा करता है।
विग्रह के विषय: राज्य, स्त्री, स्थान और देश
श्लोक में चार प्रकार के विषयों का उल्लेख मिलता है-राज्य, स्त्री, स्थान और देश। इनका संबंध राजकीय अधिकार और संघर्ष की संभावित स्थितियों से है।
राज्य
राज्य पर अधिकार राजसत्ता का मूल प्रश्न था। किसी राज्य पर अधिकार, उसके अधिग्रहण या उसके शासन को लेकर उत्पन्न विवाद राजाओं के बीच संघर्ष का कारण बन सकता था। ऐसी स्थिति में संघर्ष को शांत करने के लिए अधिकार-संबंधी रियायत या पूर्व स्थिति की पुनर्स्थापना पर विचार किया जा सकता था।
स्त्री
प्रस्तुत अंग्रेज़ी अनुवाद में ‘स्त्री’ को राजपरिवार की स्त्री के रूप में समझाया गया है। राजतंत्रीय व्यवस्था में राजपरिवार से संबंधित प्रश्न राजनीतिक विवाद का कारण बन सकते थे।
इस पद को आधुनिक अर्थों में केवल ‘नारी’ के सामान्य प्रश्न के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार विवाह, उत्तराधिकार अथवा सत्ता-संबंधों जैसी विशिष्ट व्याख्याएँ तभी की जानी चाहिए जब संबंधित टीका या पाठ-परंपरा उनका स्पष्ट आधार देती हो।
स्थान
‘स्थान’ का संबंध ऐसे महत्त्वपूर्ण स्थान या दुर्ग से हो सकता है, जिसका अधिकार राजनीतिक या सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो। किसी दुर्ग अथवा रणनीतिक स्थान पर अधिकार को लेकर संघर्ष होने पर उसका त्याग या उसके संबंध में समझौता विग्रह-प्रशमन का उपाय बन सकता था।
देश
‘देश’ व्यापक भूभाग अथवा राज्य-संबंधी क्षेत्र का बोध कराता है। किसी भूभाग पर अधिकार का प्रश्न जब दो राजकीय शक्तियों के बीच संघर्ष का कारण बने, तब उसके संबंध में रियायत या पूर्व स्थिति की पुनर्स्थापना पर विचार किया जा सकता है।
इन चारों पदों को एक साथ रखने से स्पष्ट होता है कि कामन्दक की दृष्टि में विग्रह केवल व्यक्तिगत वैर का परिणाम नहीं है। उसके पीछे अधिकार और राजकीय हित भी हो सकते हैं।
आक्रांत और आक्रामक: रियायत के दो रूप
प्रस्तुत अंग्रेज़ी अनुवाद की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह विग्रह-प्रशमन की स्थिति को दोनों पक्षों से समझाता है।
यदि कोई शासक आक्रांत है, अर्थात् उस पर दूसरे पक्ष ने आक्रमण किया है, तो उसके सामने अपने शेष राज्य और सत्ता को बचाने का प्रश्न हो सकता है। ऐसी स्थिति में वह भूभाग के किसी हिस्से का त्याग करके व्यापक संघर्ष को रोकने का प्रयास कर सकता है।
दूसरी ओर, यदि कोई शासक आक्रामक है और उसके अधिग्रहण से विग्रह उत्पन्न हुआ है, तो प्रशमन की दिशा में उसका उपाय उस अधिग्रहित क्षेत्र को छोड़कर पूर्व स्थिति बहाल करना हो सकता है।
इस प्रकार एक ही ‘दान’ दोनों परिस्थितियों में एक जैसा नहीं होगा। उसके रूप का निर्धारण संघर्ष की स्थिति और पक्षों की भूमिका के अनुसार होगा। यही बात श्लोक के अंतिम पद “युक्तिज्ञैः” को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
विग्रह-प्रशमन में युक्ति का स्थान
श्लोक में केवल दान और दम का उल्लेख करके बात समाप्त नहीं होती। उसमें युक्तिज्ञ शब्द भी आता है।
यही शब्द बताता है कि कोई एक उपाय हर परिस्थिति में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। नीतिज्ञ को यह देखना होगा कि संघर्ष किस कारण से उत्पन्न हुआ है, दोनों पक्षों की स्थिति क्या है और किस प्रकार की रियायत से उसका प्रशमन संभव है।
यदि विवाद किसी भूभाग को लेकर है, तो समाधान का स्वरूप अलग होगा। यदि राजपरिवार से संबंधित कोई प्रश्न है, तो उपाय अलग हो सकता है। यदि किसी दुर्ग या सामरिक स्थान पर अधिकार विवाद का कारण है, तो वहाँ भी परिस्थिति के अनुरूप निर्णय आवश्यक होगा।
इसलिए कामन्दकीय नीति में उपाय से अधिक महत्त्व उसके युक्तिपूर्वक प्रयोग का है।
विग्रह और प्रशमन
‘विग्रह’ और ‘प्रशमन’ इस श्लोक के दो केंद्रीय शब्द हैं।
विग्रह केवल युद्ध का आरंभ नहीं है; वह उस संघर्ष की स्थिति है जिसमें राजकीय हित, अधिकार या भूभाग पर टकराव पैदा हो गया है। दूसरी ओर प्रशमन का आशय उस टकराव को कम करने या समाप्ति की दिशा में ले जाने से है।
इस दृष्टि से श्लोक का क्रम ध्यान देने योग्य है-
विवाद → विग्रह → कारण की पहचान → दान/दम → प्रशमन।
कामन्दक का जोर केवल युद्ध करने या न करने पर नहीं, बल्कि विग्रह उत्पन्न होने के बाद उसके स्वरूप को समझकर उचित उपाय चुनने पर है।
युद्ध से आगे: समझौते की आवश्यकता
विग्रह उत्पन्न हो जाने पर केवल सैन्य शक्ति के आधार पर उसका समाधान करना एकमात्र उपाय नहीं माना गया है। यदि विवाद के कारण को किसी रियायत या समायोजन से संबोधित किया जा सकता हो, तो उस संभावना पर विचार किया जा सकता है।
यहाँ रियायत का अर्थ हर परिस्थिति में पीछे हटना नहीं है। यदि कोई समझौता संघर्ष को वास्तविक रूप से शांत करने में सहायक हो, तभी उसका राजनीतिक मूल्य है। इसी कारण श्लोक में युक्तिज्ञ की भूमिका सामने आती है।
कामन्दक के लिए नीति कोई यांत्रिक नियम नहीं है कि हर विवाद में समान उपाय किया जाए। परिस्थिति को समझना और उसके अनुरूप उपाय चुनना ही नीतिज्ञता है।
आधुनिक संदर्भ में सीमित तुलना
आधुनिक राजनीति और कूटनीति में भी विवादों को शांत करने के लिए बातचीत, मध्यस्थता, सीमा-समझौते और पारस्परिक रियायत जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। लेकिन इन्हें कामन्दक के ‘दान’ का सीधा आधुनिक पर्याय मानना उचित नहीं होगा।
दोनों के बीच केवल एक सीमित तुलनात्मक बिंदु देखा जा सकता है-विवाद को कम करने के लिए कभी-कभी किसी दावे या स्थिति में समायोजन करना पड़ता है।
इसी प्रकार ‘दम’ को आधुनिक कूटनीति में संयमित प्रतिक्रिया की एक सामान्य प्रवृत्ति से तुलना की जा सकती है। किंतु यह भी केवल तुलनात्मक समझ है, श्लोक का आधुनिक अनुवाद नहीं।
इसलिए कामन्दक के ‘दान’ और ‘दम’ को आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं पर सीधे आरोपित करने के बजाय उन्हें उनके अपने राजकीय और ऐतिहासिक संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
एक उदाहरण: सीमावर्ती भूभाग का विवाद
मान लीजिए दो पड़ोसी राज्यों के बीच एक सीमावर्ती भूभाग को लेकर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। दोनों पक्ष उस क्षेत्र पर अपना अधिकार बताते हैं और स्थिति युद्ध की ओर बढ़ रही है।
यदि एक पक्ष आक्रमण का सामना कर रहा है और अपने शेष राज्य को सुरक्षित रखने के लिए विवादित भूभाग का कुछ हिस्सा छोड़ने को तैयार होता है, तो यह एक प्रकार की राजनीतिक रियायत हो सकती है।
दूसरी ओर, यदि दूसरा पक्ष आक्रमण करके उस क्षेत्र पर अधिकार कर चुका है और संघर्ष को समाप्त करना चाहता है, तो वह उस क्षेत्र को छोड़कर पूर्व स्थिति बहाल कर सकता है।
इन दोनों स्थितियों में दान का रूप अलग है, लेकिन उद्देश्य एक है-विग्रह का प्रशमन। इसके साथ दोनों पक्षों का संयम भी आवश्यक है, क्योंकि रियायत के बाद भी यदि संघर्ष बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया जारी रहती है, तो समझौता टिकाऊ नहीं होगा।
यही श्लोक के दान और दम को साथ पढ़ने का व्यावहारिक अर्थ है।
श्लोक की ऐतिहासिक सीमा
कामन्दकीय नीतिसार राजतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि में लिखा गया नीतिशास्त्रीय ग्रंथ है। इसलिए इसमें राज्य, राजा, भूभाग और राजकीय हित की जो अवधारणाएँ हैं, उन्हें आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य, नागरिक अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं के समान अर्थ में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
इसी प्रकार इस श्लोक को आधुनिक सामाजिक न्याय, अंतरराष्ट्रीय कानून या लोकतांत्रिक शासन का पूर्ण सिद्धांत मानना भी उचित नहीं होगा।
इसका अपना विषय अधिक सीमित और स्पष्ट है-राजकीय विग्रह उत्पन्न होने पर उसके प्रशमन के लिए कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं।
इस संदर्भ में ‘दान’, ‘दम’ और ‘युक्तिज्ञ’-तीनों को साथ पढ़ना आवश्यक है। केवल दान को ‘भूभाग देना’ और दम को ‘संयम’ कह देने से श्लोक की पूरी राजनीतिक संरचना सामने नहीं आती। उसके पीछे परिस्थिति का आकलन और उपाय का विवेकपूर्ण चयन भी है।
निष्कर्ष
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग का यह श्लोक विग्रह-प्रशमन की एक व्यावहारिक नीति प्रस्तुत करता है। राज्य, राजपरिवार की स्त्री, दुर्ग अथवा महत्त्वपूर्ण स्थान और भूभाग जैसे विषयों से उत्पन्न संघर्ष को शांत करने के लिए दान और दम को उपाय के रूप में रखा गया है।
यहाँ दान को विग्रह-प्रशमन के लिए की जाने वाली रियायत, त्याग या प्रदेय के रूप में समझा जा सकता है। प्रस्तुत अनुवाद के अनुसार परिस्थिति के आधार पर इसका रूप किसी भूभाग के हिस्से के त्याग या पूर्व स्थिति की पुनर्स्थापना तक पहुँच सकता है। दम अपने आचरण और प्रतिक्रिया पर संयम का संकेत देता है।
लेकिन इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत शायद “युक्तिज्ञ” में है। रियायत कब दी जाए, कितनी दी जाए और किस परिस्थिति में पूर्व स्थिति बहाल की जाए-इन प्रश्नों का उत्तर किसी यांत्रिक नियम से नहीं दिया जा सकता। उसके लिए परिस्थिति का ज्ञान और नीति-बुद्धि आवश्यक है।
इस प्रकार श्लोक का केंद्रीय सूत्र है-
विग्रह के कारण को पहचानना, परिस्थिति के अनुरूप उपाय चुनना और संघर्ष को बढ़ाने के बजाय उसके प्रशमन की दिशा में बढ़ना।
दान और दम इसी नीति के दो परस्पर जुड़े हुए पक्ष हैं। कामन्दक का यह श्लोक इसलिए केवल युद्ध-विमर्श नहीं है; यह इस बात पर विचार करता है कि राजकीय संघर्ष को उसकी जड़ से संबोधित करके किस प्रकार शांत किया जा सकता है।