कामन्दकीय नीतिसार में विग्रह का अर्थ क्या है?
संघर्ष किसी राजनीतिक व्यवस्था में केवल साहस का प्रश्न नहीं होता। उसके पीछे कारण, शक्ति, समय, संसाधन और संभावित परिणाम जुड़े होते हैं। प्राचीन भारतीय राजनीति के ग्रंथों में इसी कारण युद्ध या विग्रह को लेकर केवल विजय की चर्चा नहीं मिलती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि कोई संघर्ष शुरू करना उचित है या नहीं।
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग में कामन्दक ने विग्रह के विभिन्न रूपों और उनसे जुड़ी परिस्थितियों का विवेचन किया है। श्लोक 19 से 23 तक वे ऐसे विग्रहों की चर्चा करते हैं जिनमें परिणाम, समय, शक्ति, उद्देश्य, सहयोगियों और भविष्य के प्रभाव को देखते हुए संघर्ष से बचना चाहिए। अंतिम श्लोक इन स्थितियों को स्पष्ट रूप से “षोडशविधं”, अर्थात सोलह प्रकार का, कहता है।
यहाँ “विग्रह” का अर्थ केवल रणभूमि में होने वाला युद्ध नहीं है। राजकीय संदर्भ में यह विरोध, संघर्ष या शत्रुता की ऐसी स्थिति है जिसमें दो पक्ष एक-दूसरे के विरुद्ध सक्रिय होते हैं। इसलिए इन श्लोकों को केवल युद्ध-नीति के रूप में पढ़ना अपूर्ण होगा। इनके पीछे निर्णय लेने का एक व्यापक सिद्धांत है, किसी टकराव में उतरने से पहले उसके फल और उसकी कीमत दोनों को देखना।
श्लोक 19 वैर और उसके संभावित फल के बारे में क्या बताता है?
श्लोक 19 इस प्रकार है-
कुलापराधजे प्राहुर् वैरे द्वे एव मानवाः ।
किञ्चित् फलं निष्फलं च सन्दिग्धफलम् एव च ॥ १९ ॥
श्लोक वैर के दो प्रकारों की ओर संकेत करता है। “कुलापराधजे” की व्याख्या करते हुए टीकाकार कुलजन्य और अपराधजन्य वैर की ओर संकेत करते हैं। इसके बाद संघर्ष के फल की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं; किञ्चित्फल, निष्फल और सन्दिग्धफल।
अर्थात किसी संघर्ष से मिलने वाला परिणाम बहुत कम हो सकता है, बिल्कुल न मिलने वाला हो सकता है या उसका परिणाम ही अनिश्चित हो सकता है।
“किञ्चित्फल” का अर्थ यह नहीं कि संघर्ष से कोई लाभ मिलेगा ही नहीं। लाभ हो सकता है, लेकिन वह संघर्ष की लागत के अनुपात में बहुत छोटा हो। “निष्फल” संघर्ष वह है जिसमें प्रयास, धन, जनशक्ति और समय लगाने के बाद भी कोई सार्थक उपलब्धि न हो। “सन्दिग्धफल” में परिणाम निश्चित नहीं है, विजय मिलेगी या नहीं, लाभ होगा या हानि, यह पहले से स्पष्ट नहीं है।
कामन्दक का तर्क केवल इस बात तक सीमित नहीं रहता कि विजय संभव है या नहीं। एक दूसरा प्रश्न भी सामने आता है, विजय मिल भी जाए तो उससे प्राप्त होने वाला लाभ संघर्ष की कीमत के योग्य है या नहीं?
युद्धनीति में यह अंतर महत्वपूर्ण है। केवल शत्रु को हराने की संभावना देखकर संघर्ष शुरू करना और संघर्ष से मिलने वाले वास्तविक लाभ का आकलन करना दो अलग बातें हैं।
श्लोक 20 वर्तमान और भविष्य के दोषों को कैसे समझाता है?
श्लोक 20 इस प्रकार है-
तदात्वे दोषजननम् आयत्यां चापि निष्फलम् ।
आयत्यां च तदात्वे च दोषस्य जननं तथा ॥ २० ॥
श्लोक 19 में फल की प्रकृति का विवेचन था। श्लोक 20 उसी फल को समय के दो स्तरों पर देखने की बात करता है। इसके लिए दो शब्द विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, तदात्व (श्लोक में तदात्वे) और आयति।
“तदात्व” का संबंध वर्तमान या उसी समय दिखाई देने वाले परिणाम से है, जबकि “आयति” भविष्य में होने वाले परिणाम की ओर संकेत करता है। इसलिए किसी निर्णय को केवल तत्काल लाभ देखकर सही नहीं माना जा सकता। यह भी देखना होगा कि उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे।
श्लोक दो ऐसी स्थितियों की ओर संकेत करता है।
पहली स्थिति: वर्तमान में दोष उत्पन्न हो और भविष्य में भी वह निष्फल सिद्ध हो।
दूसरी स्थिति: वर्तमान और भविष्य दोनों में दोष उत्पन्न हो।
इन दोनों को अलग-अलग छोटे-छोटे प्रकार मानने के बजाय प्रत्येक को एक संयुक्त परिस्थिति के रूप में समझना उचित है। श्लोक 19 से 23 तक की सभी स्थितियों को एक साथ रखने पर सोलह प्रकारों की संख्या बनती है।
कोई निर्णय आज लाभदायक लग सकता है, लेकिन यदि उसके कारण भविष्य में राज्य की स्थिति कमजोर होती है, संसाधन समाप्त होते हैं या नए शत्रु पैदा होते हैं, तो उस निर्णय को केवल तत्काल परिणाम के आधार पर सफल नहीं कहा जा सकता।
श्लोक 21 किन परिस्थितियों में विग्रह से बचने को कहता है?
श्लोक 21 इस प्रकार है-
अपरिज्ञातवीर्येण परेण स्तोभितोऽपि वा ।
परार्थं स्त्रीनिमित्तं च दीर्घकालं द्विजोत्तमैः ॥ २१ ॥
इस श्लोक में छह परिस्थितियाँ सामने आती हैं, जिनमें विग्रह से बचने की बात कही गई है।
अपरिज्ञातवीर्य
ऐसे शत्रु से संघर्ष करना जिसकी वास्तविक सामर्थ्य का ठीक-ठीक पता न हो, जोखिमपूर्ण है। यहाँ “वीर्य” का अर्थ केवल व्यक्तिगत शौर्य नहीं, बल्कि शत्रु की वास्तविक शक्ति और क्षमता से है।
किसी विरोधी के बारे में अधूरी जानकारी के आधार पर संघर्ष शुरू करना निर्णय की कमजोरी बन सकता है। सेना कितनी है, संसाधन कितने हैं, सहयोगी कौन हैं और संकट की स्थिति में वह कितनी देर तक टिक सकता है, ऐसी बातें जाने बिना किया गया आकलन अधूरा रहेगा।
परेण स्तोभित
“स्तोभित” का अर्थ यहाँ उकसाए या उत्तेजित किए जाने से जुड़ता है। अर्थात ऐसा संघर्ष जो किसी दूसरे व्यक्ति या पक्ष के उकसावे में आकर शुरू किया जाए।
राजनीतिक निर्णय यदि अपने हित और विवेक के बजाय किसी तीसरे पक्ष के उकसावे से लिया जाए, तो उसके पीछे वास्तविक उद्देश्य अस्पष्ट हो सकता है। इसलिए कामन्दक ऐसी स्थिति से भी सावधान करते हैं।
परार्थ
“परार्थ” का अर्थ है किसी दूसरे के हित के लिए किया गया संघर्ष। यहाँ प्रश्न यह है कि जिस संघर्ष की कीमत स्वयं को चुकानी पड़े, उसका वास्तविक लाभ किसे मिलेगा।
राजनीतिक नीति की दृष्टि से संघर्ष के उद्देश्य और उसके लाभार्थी को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
स्त्रीनिमित्त
“स्त्रीनिमित्त” का शाब्दिक अर्थ है स्त्री के निमित्त या स्त्री के कारण उत्पन्न संघर्ष। प्राचीन राजकीय साहित्य में इसका संदर्भ स्त्री से जुड़े व्यक्तिगत, पारिवारिक या राजकीय विवादों से हो सकता है।
इसे आधुनिक सामाजिक नियम के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। यहाँ इसका स्थान उस समय की राजकीय और नैतिक व्यवस्था के भीतर समझना चाहिए। अर्थ यह है कि व्यक्तिगत आग्रह, आसक्ति या स्त्री से जुड़े विवाद को ऐसा राजकीय संघर्ष न बना दिया जाए जिसकी कीमत पूरे राज्य को चुकानी पड़े।
दीर्घकाल
लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भी इस सूची में आता है। दीर्घकालीन संघर्ष में केवल युद्ध की अवधि नहीं बढ़ती, बल्कि धन, जनशक्ति, प्रशासन और अन्य संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता है।
इसलिए किसी अभियान को शुरू करते समय केवल आरंभिक सफलता नहीं, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि संघर्ष कितने लंबे समय तक चल सकता है।
द्विजोत्तमैः
“द्विज” का पारंपरिक अर्थ उन वर्णों से है जिन्हें शास्त्रीय व्यवस्था में उपनयन संस्कार के बाद “द्विज” कहा जाता था, विशेषतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। “द्विजोत्तम” उसी संदर्भ में श्रेष्ठ या प्रतिष्ठित द्विज के लिए प्रयुक्त होता है।
इस पद को केवल “विद्वानों से विवाद” कह देना मूल पाठ को बहुत संकुचित कर देता है। बेहतर है कि इसे उस समय की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में प्रतिष्ठित श्रेष्ठ द्विजों के साथ अनावश्यक संघर्ष से बचने के रूप में समझा जाए।
इस प्रकार श्लोक 21 में छह स्थितियाँ सामने आती हैं, अज्ञात शक्ति वाला विरोधी, दूसरे के उकसावे में आया संघर्ष, परहित के लिए संघर्ष, स्त्री के निमित्त संघर्ष, दीर्घकालीन संघर्ष और द्विजोत्तमों के साथ संघर्ष।
श्लोक 22 में समय, दैव और शत्रु के सहयोगियों का क्या महत्व है?
श्लोक 22 इस प्रकार है-
अकाले दैवयुक्तेन बलोद्धृतसखेन च ।
तदात्वे फलसंयुक्तम् आयत्यां फलवर्जितम् ॥ २२ ॥
इस श्लोक में तीन महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ सामने आती हैं।
अकाले
“अकाले” का अर्थ है अनुचित या प्रतिकूल समय में शुरू किया गया संघर्ष। युद्ध में समय केवल कैलेंडर की तारीख नहीं है। मौसम, मार्ग, भूगोल, सेना की तैयारी, रसद और राजनीतिक परिस्थितियाँ भी समय को अनुकूल या प्रतिकूल बना सकती हैं।
इसलिए किसी अभियान का सही होना ही पर्याप्त नहीं है; उसका समय भी उपयुक्त होना चाहिए।
दैवयुक्त
“दैवयुक्त” का अर्थ दैव से समर्थ या अनुकूल भाग्य से जुड़ी स्थिति के रूप में लिया जा सकता है। प्राचीन राजनीतिक चिंतन में “दैव” उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत कर सकता है जिन्हें मनुष्य अपने पूर्ण नियंत्रण में नहीं रखता।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह हो सकता है कि यदि परिस्थितियाँ लगातार विरोधी पक्ष के अनुकूल जा रही हों, तो केवल अपने उत्साह के आधार पर संघर्ष में उतरना उचित नहीं माना जा सकता।
बलोद्धृतसख
यह पद ऐसे शत्रु की ओर संकेत करता है जिसके मित्र या सहयोगी शक्तिशाली हों। किसी राज्य की शक्ति केवल उसकी अपनी सेना से निर्धारित नहीं होती; उसके सहयोगी भी संघर्ष का परिणाम बदल सकते हैं।
इसलिए शत्रु का आकलन करते समय उसके मित्र-मंडल और संभावित समर्थन को अलग से देखना आवश्यक है।
इसके बाद श्लोक एक ऐसी स्थिति बताता है जिसमें संघर्ष वर्तमान में फलदायक दिखाई देता है, लेकिन भविष्य में फलहीन हो जाता है। “तदात्वे फलसंयुक्तम् आयत्यां फलवर्जितम्” इसी असंतुलन को सामने रखता है।
श्लोक 23 सोलह प्रकार के विग्रहों का निष्कर्ष कैसे देता है?
श्लोक 23 इस प्रकार है-
आयत्यां फलसंयुक्तं तदात्वे निष्फलं तथा ।
इतीमं षोडशविधं न कुर्याद् एव विग्रहम् ॥ २३ ॥
श्लोक का पहला चरण पिछली स्थिति को उलटकर सामने रखता है; ऐसा संघर्ष जो वर्तमान में निष्फल हो, लेकिन भविष्य में लाभ देने वाला दिखाई दे।
कामन्दकीय विवेचन में केवल भविष्य के संभावित लाभ को पर्याप्त नहीं माना गया। यदि वर्तमान में संघर्ष की कीमत बहुत अधिक है, तो केवल आने वाले लाभ की आशा पर उसे शुरू करना उचित नहीं माना जा सकता।
अंतिम चरण पूरे विवेचन को समेट देता है; इन सोलह प्रकार के विग्रहों को नहीं करना चाहिए।
सोलह की संख्या समझने के लिए श्लोक 19 से 23 की स्थितियों को एक साथ देखना आवश्यक है। श्लोक 20 की वर्तमान और भविष्य की संयुक्त स्थितियों को अलग-अलग करके गिनने पर संख्या कृत्रिम रूप से बढ़ जाएगी। इसी तरह श्लोक 22 और 23 की अंतिम फल से संबंधित स्थितियाँ अपने-अपने एक-एक प्रकार हैं।
कामन्दकीय नीतिसार में बताए गए 16 विग्रह
| क्रम | श्लोक | विग्रह की स्थिति | संक्षिप्त अर्थ |
|---|---|---|---|
| 1 | 19 | किञ्चित्फल | जिसका लाभ बहुत सीमित हो |
| 2 | 19 | निष्फल | जिससे कोई सार्थक फल न मिले |
| 3 | 19 | सन्दिग्धफल | जिसका परिणाम निश्चित न हो |
| 4 | 20 | तदात्वे दोषजननम्, आयत्यां निष्फलम् | वर्तमान में दोष और भविष्य में निष्फलता |
| 5 | 20 | आयत्यां तथा तदात्वे दोषस्य जननम् | वर्तमान और भविष्य दोनों में दोष |
| 6 | 21 | अपरिज्ञातवीर्य | अज्ञात वास्तविक शक्ति वाले शत्रु से संघर्ष |
| 7 | 21 | परेण स्तोभित | दूसरे के उकसावे में किया गया संघर्ष |
| 8 | 21 | परार्थ | दूसरे के हित के लिए किया गया संघर्ष |
| 9 | 21 | स्त्रीनिमित्त | स्त्री के निमित्त उत्पन्न संघर्ष |
| 10 | 21 | दीर्घकाल | बहुत लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष |
| 11 | 21 | द्विजोत्तमैः | श्रेष्ठ द्विजों के साथ संघर्ष |
| 12 | 22 | अकाले | अनुचित समय में शुरू किया गया संघर्ष |
| 13 | 22 | दैवयुक्तेन | प्रतिकूल दैव या परिस्थिति से समर्थ विरोधी के विरुद्ध संघर्ष |
| 14 | 22 | बलोद्धृतसखेन | शक्तिशाली सहयोगियों वाले शत्रु से संघर्ष |
| 15 | 22 | तदात्वे फलसंयुक्तम्, आयत्यां फलवर्जितम् | वर्तमान में लाभदायक, भविष्य में लाभहीन |
| 16 | 23 | आयत्यां फलसंयुक्तम्, तदात्वे निष्फलम् | वर्तमान में निष्फल, केवल भविष्य के लाभ की आशा |
तालिका से स्पष्ट होता है कि कामन्दक केवल “युद्ध मत करो” नहीं कहते। वे अलग-अलग कारणों से अनुचित संघर्ष की पहचान करने की कसौटियाँ देते हैं।
इन सोलह विग्रहों की आज के संदर्भ में क्या उपयोगिता है?
इन कसौटियों को मूल ग्रंथ के राजकीय संदर्भ का विकल्प नहीं मानना चाहिए। इनसे केवल यह समझा जा सकता है कि किसी गंभीर निर्णय में लाभ, लागत, समय, शक्ति और भविष्य के प्रभाव को अलग-अलग देखना क्यों आवश्यक है।
पहली कसौटी लाभ की है। किसी टकराव से वास्तविक लाभ कितना मिलेगा? यदि लाभ बहुत छोटा है और उसकी कीमत बहुत बड़ी है, तो संघर्ष पर पुनर्विचार करना चाहिए।
दूसरी कसौटी निश्चितता की है। यदि परिणाम पूरी तरह संदिग्ध है, तो केवल आवेश में निर्णय लेना जोखिम बढ़ा सकता है।
तीसरी कसौटी समय की है। सही निर्णय भी गलत समय पर लिया जाए तो उसका परिणाम बदल सकता है। किसी अभियान, प्रतिस्पर्धा या विवाद में तैयारी और परिस्थितियों का महत्व इसी से समझा जा सकता है।
चौथी कसौटी विरोधी की वास्तविक शक्ति है। केवल अपनी क्षमता देखना पर्याप्त नहीं। सामने वाले की क्षमता, संसाधन और सहयोगियों का आकलन भी आवश्यक है।
पाँचवीं कसौटी तात्कालिक और दीर्घकालीन परिणाम हैं। किसी निर्णय से आज लाभ मिल सकता है, लेकिन वही निर्णय भविष्य में नुकसान का कारण बन सकता है। इसके विपरीत भविष्य का लाभ वर्तमान की भारी कीमत को उचित ठहराए, यह भी निश्चित नहीं।
कामन्दकीय दृष्टि की विशेषता यह है कि वह निर्णय को एक ही क्षण में नहीं, बल्कि उसके परिणामों की पूरी श्रृंखला में देखती है।
इन प्रश्नों को मूल ग्रंथ के राजकीय संदर्भ का विकल्प नहीं मानना चाहिए। इनसे केवल यह समझा जा सकता है कि किसी गंभीर निर्णय में लाभ, लागत, समय, शक्ति और भविष्य के प्रभाव को अलग-अलग देखना क्यों आवश्यक है।
संघर्ष से पहले परिणाम और कीमत दोनों देखना क्यों आवश्यक है?
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग के श्लोक 19 से 23 युद्ध या विग्रह को केवल वीरता और पराक्रम का विषय नहीं मानते। यहाँ संघर्ष से पहले फल, समय, शक्ति, उद्देश्य, सहयोगी और भविष्य इन सभी को देखने की आवश्यकता सामने आती है।
श्लोक 19 लाभ की मात्रा और परिणाम की निश्चितता पर ध्यान देता है। श्लोक 20 वर्तमान और भविष्य के दोषों की ओर देखता है। श्लोक 21 शत्रु की अज्ञात शक्ति, बाहरी उकसावे, परहित, स्त्रीनिमित्त, दीर्घकाल और द्विजोत्तमों से जुड़े संघर्षों को सामने रखता है। श्लोक 22 समय, दैव और शक्तिशाली सहयोगियों वाले विरोधी की चर्चा करता है। अंततः श्लोक 23 वर्तमान और भविष्य के फल के असंतुलन को जोड़कर इन सभी को सोलह प्रकार के विग्रहों के रूप में समेट देता है।
इस विवेचन का सार युद्ध-विरोध नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय है। हर संघर्ष से बचना नीति नहीं हो सकती और हर संघर्ष में उतर जाना भी नीति नहीं। प्रश्न यह है कि संघर्ष किस उद्देश्य से किया जा रहा है, उससे क्या प्राप्त होगा, उसकी कीमत क्या होगी और उसका प्रभाव आगे कहाँ तक जाएगा।
कामन्दक की दृष्टि में समझदार निर्णय वही है जो केवल आज की जीत नहीं देखता, बल्कि उसके बाद आने वाले परिणामों को भी समझता है।
युद्ध शुरू करना साहस हो सकता है; लेकिन यह तय करना कि युद्ध करना भी चाहिए या नहीं; नीति की असली परीक्षा वहीं से शुरू होती है।