युद्ध का निर्णय केवल इस आधार पर नहीं होता कि किसके पास अधिक सेना है। उससे पहले यह देखना पड़ता है कि सामने कौन है, उसके साथ कौन खड़ा है, अपनी ओर कौन-से सहयोगी हैं और अभियान किन परिस्थितियों में चलाया जा रहा है। विगृह्य गमन की अवधारणा को समझने के लिए कामन्दकीय नीतिसार के एकादश सर्ग के तीसरे और चौथे श्लोक विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। कामन्दक ने प्राचीन भारतीय राज्यनीति में यान के पाँच प्रकार बताए हैं, जिनमें विगृह्ययान एक प्रमुख प्रकार है।
उपलब्ध डिजिटल पाठ में श्लोक 3 में “विगृह्ययानं” पद मिलता है, जबकि 1912 के संस्करण के डिजिटल स्कैन में इसी अंश का OCR कुछ स्थानों पर विकृत दिखाई देता है। श्लोक 4 में “अरेर्मित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वतो बलात्” का पाठ स्पष्ट रूप से मिलता है, लेकिन उसके बाद के पद का पाठ उपलब्ध प्रतियों में भिन्न-भिन्न मिलता है।
इन श्लोकों को ध्यान से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ अभियान केवल शत्रु की ओर बढ़ने की क्रिया नहीं है। उसके पीछे मित्रों, शत्रु-मित्रों, शक्ति और परिस्थिति का आकलन भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण विगृह्य गमन साधारण सैन्य प्रस्थान से अलग अर्थ रखता है।
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| कामन्दकीय नीतिसार में विगृह्य गमन केवल युद्ध नहीं, बल्कि शत्रु और उसके सहयोगी तंत्र को ध्यान में रखकर किया गया अभियान है। |
श्लोक 3 में विगृह्ययान से क्या अभिप्राय है?
श्लोक 3 का उपलब्ध डिजिटल पाठ इस प्रकार है:
विगृह्य याति हि यदा सर्वाञ् शत्रुगणान् बलात् ।
विगृह्ययानं यानज्ञास् तदाचार्याः प्रचक्षते ॥ ३ ॥
पाठ के कुछ डिजिटल रूपों में OCR के कारण शब्दों का रूप बिगड़ा हुआ मिलता है। इसलिए ऊपर दिए गए पाठ को अंतिम रूप से उद्धृत करने से पहले मूल संस्करण से मिलाना आवश्यक है।
सरल अर्थ यह है कि जब कोई विजिगीषु राजा संघर्ष की स्थिति में शत्रु-पक्ष के विरुद्ध बलपूर्वक अभियान करता है, तो आचार्य उस प्रकार के अभियान को विगृह्ययान कहते हैं।
यहाँ “यान” का अर्थ केवल चलना या यात्रा करना नहीं है। एकादश सर्ग में यान को विजिगीषु के अभियान के रूप में लिया गया है। पहले श्लोक में उत्कृष्ट बल और वीर्य से युक्त विजिगीषु के यान का उल्लेख आता है और दूसरे श्लोक में यान के पाँच प्रकार बताए जाते हैं।
इस क्रम को देखें तो “विगृह्ययान” किसी सामान्य यात्रा का नाम नहीं रह जाता। यह ऐसी यात्रा या सैन्य गतिविधि है जिसका संबंध पहले से उपस्थित संघर्ष से है।
श्लोक 4 में अरेर्मित्राणि और स्वमित्रैः का क्या अर्थ है?
श्लोक 4 का उपलब्ध पाठ इस प्रकार है:
अरेर्मित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वतो बलात् ।
विगृह्य वा गमनं विगृह्यगमनं स्मृतम् ॥ ४ ॥
यहाँ दो पद विशेष ध्यान देने योग्य हैं: अरेर्मित्राणि और स्वमित्रैः।
“अरेर्मित्राणि” को केवल शब्द देखकर “अरि और मित्र” समझ लेना उचित नहीं होगा। जयमङ्गला की उपलब्ध व्याख्या इसे शत्रु से संबंधित मित्रों के अर्थ में स्पष्ट करती है। अर्थात् यहाँ आशय शत्रु के मित्रों या शत्रु-पक्ष से जुड़े सहयोगी तत्वों से है। 1912 के डिजिटल OCR में टीका का यह अंश विकृत है, इसलिए उसे शब्दशः उद्धृत करने के बजाय उसका अर्थ ग्रहण करना अधिक सुरक्षित है।
दूसरा महत्वपूर्ण पद है स्वमित्रैः, अर्थात् अपने मित्रों या सहयोगी राज्यों के माध्यम से।
श्लोक का सरल अर्थ: शत्रु के सभी मित्रों को अपने मित्रों के सहयोग से, सब ओर से बलपूर्वक विगृह्य (संघर्ष करते हुए) जो गमन किया जाता है, उसे विगृह्यगमन कहा जाता है।
यहाँ श्लोक का राजनीतिक अर्थ अधिक स्पष्ट होता है। संघर्ष को केवल “मैं बनाम मेरा शत्रु” के रूप में नहीं देखा जा रहा। शत्रु के साथ जुड़े राज्यों और अपनी ओर के मित्रों को भी गणना में रखा जा रहा है।
कामन्दकीय नीतिसार के मंडल-विवेचन में भी मित्र, अरि, पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आसार और अन्य राज्यों के संबंधों का विस्तृत ढाँचा मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य के बाहरी संबंधों को उसकी राजनीतिक शक्ति से अलग नहीं देखा जाता।
विगृह्य गमन केवल सीधे युद्ध से कैसे अलग है?
विगृह्य गमन को केवल “शत्रु पर हमला” कहना उसके अर्थ को सीमित कर देता है।
कामन्दक के यहाँ युद्ध और अभियान दोनों व्यापक राजनीतिक परिस्थिति से जुड़े हैं। दशम सर्ग में विग्रह की उत्पत्ति के अनेक कारण गिनाए गए हैं। इनमें राज्य, स्थान, शक्ति, ज्ञान, मित्र, परिवार और मंडल से जुड़े हितों का विघात शामिल है।
एकादश सर्ग में प्रवेश करते ही वही संघर्ष “यान” के रूप में सामने आता है। अर्थात् विग्रह की स्थिति के बाद यह प्रश्न आता है कि आगे बढ़ने का मार्ग क्या होगा और अभियान किस प्रकार किया जाएगा।
इस क्रम को तीन स्तरों में समझा जा सकता है:
पहला, संघर्ष की स्थिति बनती है।
दूसरा, राजा यह देखता है कि उस स्थिति में अभियान आवश्यक और संभव है या नहीं।
तीसरा, यदि अभियान किया जाता है, तो यह तय करना कि वह किस प्रकार का होगा।
विगृह्य गमन इसी तीसरे स्तर का हिस्सा है।
यहाँ शक्ति का अर्थ केवल सैनिकों की संख्या नहीं है। भूगोल, मित्रों की उपलब्धता, शत्रु के सहयोगी, अपनी तैयारी और समय जैसी परिस्थितियाँ भी अभियान की वास्तविक शक्ति को प्रभावित करती हैं।
कामन्दक के यहाँ यान के पाँच प्रकार कौन-से हैं?
एकादश सर्ग के दूसरे श्लोक में यान के पाँच प्रकार बताए गए हैं:
विगृह्य सन्धाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः ।
उपेक्षा चेति निपुणैर् यानं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ २ ॥
इन पाँच रूपों को मोटे तौर पर इस प्रकार समझा जा सकता है:
विगृह्य: संघर्ष की स्थिति में किया गया अभियान।
सन्धाय: संधि या समझौते के आधार पर किया गया अभियान।
सम्भूय: दो या अधिक राजाओं के मिलकर किसी तीसरे पक्ष के विरुद्ध अभियान करने की स्थिति।
प्रसङ्गतः: किसी विशेष अवसर या उत्पन्न परिस्थिति के कारण किया गया अभियान।
उपेक्षा: ऐसी स्थिति जिसमें प्रत्यक्ष अभियान से विरत रहने का विकल्प अपनाया जाता है।
इन पाँच प्रकारों की व्याख्या करते समय मूल श्लोक के साथ उसकी टीका को भी देखना आवश्यक है, क्योंकि केवल पदों के सामान्य अर्थ के आधार पर इनके बीच के सूक्ष्म भेद पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते।
इस सूची का महत्व इसलिए है कि इससे पता चलता है कि “यान” का अर्थ एक ही प्रकार की सैन्य कार्रवाई नहीं है। अभियान की प्रकृति राजनीतिक परिस्थिति के अनुसार बदलती है।
प्रदीप कुमार गौतम ने कामन्दक के नीतिसार की तुलना कौटिल्य के अर्थशास्त्र से करते हुए राज्य-संचालन, कूटनीति और युद्ध को इसके प्रमुख विषयों के रूप में देखा है। उनके अध्ययन में कामन्दक के यान, मंडल, कूटनीतिक उपायों और युद्ध संबंधी विचारों की तुलना कौटिल्यीय परंपरा के साथ की गई है।
शक्ति का आकलन इस नीति में क्यों महत्वपूर्ण है?
विगृह्य गमन में “बल” शब्द महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे केवल सैन्य संख्या तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
प्राचीन राज्यनीति में शक्ति बहुस्तरीय थी। सेना उसकी एक प्रमुख अभिव्यक्ति थी, लेकिन मित्रों का सहयोग, राज्य की आंतरिक स्थिरता, संसाधन और रणनीतिक परिस्थिति भी अभियान की क्षमता से जुड़े थे।
कामन्दकीय नीतिसार के मंडल-विवेचन में मित्र और शत्रु के संबंधों को जिस तरह व्यवस्थित किया गया है, उससे स्पष्ट है कि बाहरी संबंधों को राज्य की शक्ति से अलग नहीं देखा जाता। अष्टम सर्ग में मंडल के विभिन्न घटकों और उनके परस्पर संबंधों का विस्तृत विवेचन मिलता है।
इसलिए श्लोक 4 में “स्वमित्रैः” का उल्लेख केवल एक अतिरिक्त शब्द नहीं है। यह संकेत करता है कि अभियान की गणना में अपने सहयोगी पक्ष को भी शामिल किया जाता है।
राजा की शक्ति केवल उसके अपने साधनों तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे राजनीतिक संबंधों का पूरा तंत्र हो सकता है। उसी तरह शत्रु भी अकेला नहीं होता। विगृह्य गमन को समझने का एक महत्वपूर्ण सूत्र यही है।
आधुनिक संदर्भ में विगृह्य गमन को कैसे समझा जा सकता है?
यहाँ आधुनिक उदाहरण को ऐतिहासिक समानता के रूप में नहीं, बल्कि रूपक के रूप में लेना चाहिए।
आज की संस्थागत प्रतिस्पर्धा में भी किसी प्रतिद्वंद्वी को समझते समय उसके साझेदारों और अपने सहयोगियों को ध्यान में रखना पड़ सकता है। केवल मुख्य प्रतिद्वंद्वी पर ध्यान देने और उससे जुड़े संबंधों को अनदेखा करने पर रणनीति की तस्वीर अधूरी रह सकती है।
इसे प्राचीन सैन्य सिद्धांत को आधुनिक परिस्थितियों पर हूबहू लागू करने का दावा नहीं समझना चाहिए। यह केवल उस व्यापक रणनीतिक सोच को समझने का एक रूपक है जिसमें प्रतिद्वंद्वी के साथ उसके संबंधों और अपने सहयोगी पक्ष दोनों को देखा जाता है।
इस अवधारणा से कामन्दकीय नीतिसार की कौन-सी विशेषता सामने आती है?
कामन्दकीय नीतिसार की एक विशेषता यह है कि वह युद्ध को अलग-थलग घटना की तरह प्रस्तुत नहीं करता। विग्रह, यान, संधि, मंडल, मित्र और शत्रु जैसे विचार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
दशम सर्ग में विग्रह की परिस्थितियों का विवेचन है। एकादश सर्ग में यान के प्रकार आते हैं। इसके आगे के विवेचन में आसन, द्वैधीभाव और संश्रय जैसे विकल्प सामने आते हैं। इस क्रम में सैन्य कार्रवाई भी व्यापक नीतिगत ढाँचे का एक हिस्सा बन जाती है।
इसीलिए विगृह्य गमन को केवल युद्ध की तकनीक के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह निर्णय, संबंध और शक्ति के बीच की कड़ी को समझने का एक माध्यम है।
कामन्दकीय नीतिसार का महत्व इसी में है कि यह केवल संघर्ष होने या न होने पर विचार नहीं करता, बल्कि संघर्ष की परिस्थिति में अपनाए जाने वाले विभिन्न मार्गों पर भी विचार करता है।
निष्कर्ष
विगृह्य गमन को समझने के लिए श्लोक 3 और 4 को साथ पढ़ना आवश्यक है। श्लोक 3 में “विगृह्ययान” संघर्ष की स्थिति में अभियान का संकेत देता है, जबकि श्लोक 4 में “अरेर्मित्राणि” और “स्वमित्रैः” के माध्यम से शत्रु के सहयोगियों और अपने मित्रों की भूमिका सामने आती है। इस प्रकार अभियान केवल सैन्य शक्ति के प्रयोग का विषय नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक राजनीतिक परिस्थिति के आकलन से जुड़ जाता है।
कामन्दक के यहाँ शक्ति अकेली नहीं चलती। उसके साथ संबंध, परिस्थिति और निर्णय की समझ भी जुड़ी हुई है। शत्रु को समझना पर्याप्त नहीं; उसके संबंधों और अपनी ओर के सहयोगी तंत्र को भी समझना पड़ता है। यही परत इस छोटे-से प्रसंग को कामन्दकीय नीतिसार के व्यापक राजनीतिक चिंतन से जोड़ती है।