कामन्दकीय नीतिसार का दशम सर्ग विग्रह और उसके प्रशमन के अनेक आयामों पर विचार करता है। आचार्य कामन्दक यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि संघर्ष का प्रश्न केवल सैन्य बल तक सीमित नहीं है; दशम सर्ग का आठवाँ श्लोक, अर्थात् कामन्दकीय नीतिसार 10.8, उन परिस्थितियों की ओर संकेत करता है जहाँ राज्य के भौतिक साधनों, धन, ज्ञान और राजकीय सामर्थ्य पर आघात से विग्रह की स्थिति उत्पन्न होती है। इन प्रसंगों में यानापहार, धनापहार तथा ज्ञानशक्ति-विघात का उल्लेख मिलता है, जिनके संदर्भ में क्षान्ति, उपेक्षा और तदर्थत्याग जैसे उपायों पर विचार किया गया है। जयमङ्गला-टीका इस श्लोक की व्याख्या करते हुए विग्रह-प्रशमन को केवल युद्ध-विराम तक सीमित नहीं रखती, बल्कि राजनीतिक विवेक, आत्मसंयम और आवश्यक त्याग के संदर्भ में इसे स्पष्ट करती है।
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| कामन्दकीय नीतिसार: यानापहार और ज्ञानशक्ति-विघात में क्षान्ति और उपेक्षा का उपाय |
मूल संस्कृत श्लोक
यानापहारसम्भूते ज्ञानशक्तिविघातजे ।
समस्तदर्थश्चाङ्ग क्षान्त्या वोपेक्षणेन वा ॥ ८ ॥
कामन्दकीय नीतिसारः, दशम सर्ग
पाठभेद
जयमङ्गला-टीका में इस श्लोक के कई पाठान्तर मिलते हैं। कुछ संस्करणों में “यानापहार” के स्थान पर “धनापहार” पढ़ा गया है। द्वितीय पद के भी कुछ पाठान्तर मिलते हैं। टीकाकार ने इन पाठों की व्याख्या प्रस्तुत की है, जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन टीका-परंपरा में इन अंतरों को महत्वपूर्ण माना गया है।
शब्दार्थ
- यानापहारसम्भूते - यान (वाहन, परिवहन के साधन) के अपहार (हरण, क्षति) से उत्पन्न विग्रह में।
- ज्ञानशक्तिविघातजे - ज्ञान और शक्ति के विघात (नाश, हानि) से उत्पन्न विग्रह में।
- क्षान्त्या - क्षान्ति (सहनशीलता, संयम) के द्वारा।
- वा - अथवा।
- उपेक्षणेन - उपेक्षा (अनवधारण, अनदेखा करना) के द्वारा।
टीका-व्याख्या में शम और तदर्थत्याग को भी विग्रह-प्रशमन के उपाय के रूप में समझाया गया है।
भावार्थ
जब शत्रु द्वारा यान अथवा धन का अपहार किया जाए, या ज्ञान-शक्ति का विघात हो, तब उस विग्रह का शमन क्षान्ति अथवा उपेक्षा से किया जा सकता है। जयमङ्गला-टीका के अनुसार इनके अतिरिक्त तदर्थत्याग भी एक उपाय है-अर्थात् विवाद के मूल कारण का परित्याग। परिस्थिति के अनुसार इनमें से कोई भी उपाय अपनाया जा सकता है।
यानापहार और धनापहार: राज्य की भौतिक शक्ति पर आघात
श्लोक का पहला पद “यानापहारसम्भूते” उस स्थिति की ओर संकेत करता है जहाँ राज्य के परिवहन और सैन्य आवागमन के साधनों पर आघात होता है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक परंपरा में यान केवल साधारण वाहन नहीं थे। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना के आवागमन के साधन राज्य की युद्धक्षमता और प्रशासनिक संचालन का आधार थे। इनका हरण या विनाश राज्य को आंतरिक रूप से कमजोर कर देता था।
जयमङ्गला-टीका में “धनापहार” पाठ भी मिलता है। टीकाकार के अनुसार-“धनापहारसम्भूते भूहिरण्याद्यर्थविघातजे”-अर्थात् धन का अपहार, अर्थात् भूमि, स्वर्ण आदि अर्थ का विघात। इस प्रकार यानापहार और धनापहार दोनों ही राज्य की भौतिक शक्ति पर आघात का संकेत करते हैं।
कामन्दक यहाँ यह नहीं कहते कि ऐसे आघातों का उत्तर तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया से दिया जाए। वे क्षान्ति और उपेक्षा को उपाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं-यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो राज्य की दीर्घकालिक स्थिरता को तत्काल प्रतिशोध से अधिक महत्व देता है।
ज्ञानशक्ति-विघात: विद्या और राजकीय सामर्थ्य पर आघात
श्लोक का दूसरा महत्वपूर्ण पद है “ज्ञानशक्तिविघातजे”। यहाँ ज्ञान और शक्ति दोनों के विघात की बात की गई है। टीकाकार इसे स्पष्ट करते हैं-“ज्ञानशक्तिविघातजे ज्ञानविघातजे शक्तिविघातजे च”-अर्थात् ज्ञान का विघात और शक्ति का विघात।
ज्ञानशक्ति-विघात वस्तुतः राजकीय प्रज्ञा, बौद्धिक मेधा और प्रशासनिक सामर्थ्य को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास है। जयमङ्गला-टीका और मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में इसे शिक्षकों को अपने पक्ष में कर लेने, विद्या के साधनों से वंचित करने, और विद्या के केन्द्रों को क्षति पहुँचाने से जोड़ा गया है।
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में ज्ञान को केवल सैद्धांतिक विषय नहीं माना जाता था। ज्ञान राज्य की निर्णय-क्षमता, कूटनीतिक बुद्धि और प्रशासनिक दक्षता का आधार था। जब शत्रु आपके विद्वानों को अपने पक्ष में कर लेता है, तो वह केवल व्यक्तियों को नहीं जीतता-वह आपकी बौद्धिक परंपरा, आपकी शिक्षण-व्यवस्था और आपकी निर्णय-प्रक्रिया को कमजोर करता है। यही ज्ञानशक्ति-विघात है।
जयमङ्गला-टीका और अंग्रेज़ी अनुवाद में राजकीय शक्ति के क्षरण का प्रसंग
जयमङ्गला-टीका और मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए राजकीय शक्ति के क्षरण को व्यापक अर्थ में प्रस्तुत किया गया है। यह क्षरण केवल सैन्य पराजय तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक कमजोरी के उन स्रोतों तक विस्तृत है जो राज्य को भीतर से खोखला कर देते हैं।
मन्मथनाथ दत्त के अनुवाद (1896) में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि परिवहन के साधनों को हानि पहुँचाना, विद्या के साधनों का हरण, विद्या-संस्थानों को क्षति, धन का निष्कासन, और प्रमुख राजकीय अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लेना-ये सभी राजकीय शक्ति के क्षरण के रूप हैं। ऐसे विग्रह को क्षमा, उदासीनता और शांतिपूर्वक त्याग के माध्यम से रोका जा सकता है।
इनमें “प्रमुख राजकीय अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लेना” विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह प्राचीन कूटनीति का वह पहलू है जिसे आज हम “आंतरिक सुरक्षा” या “राजनीतिक स्थिरता” के संदर्भ में समझ सकते हैं। जब शत्रु आपके अधिकारियों को तोड़कर या खरीदकर अपने पक्ष में कर लेता है, तो वह आपकी निर्णय-प्रक्रिया, आपकी गुप्त सूचना-प्रणाली और आपकी प्रशासनिक क्षमता को भीतर से नष्ट कर देता है।
क्षान्ति: सहनशीलता का राजनीतिक अर्थ
श्लोक में क्षान्ति को विग्रह-प्रशमन का पहला उपाय बताया गया है। जयमङ्गला-टीका में इसकी व्याख्या इस प्रकार है-“क्षान्त्यापहारादेः क्षमयानुज्ञानात्”-अर्थात् क्षान्ति के द्वारा अपहार आदि को क्षमा करना, अनुज्ञा देना।
राजनीतिक संदर्भ में क्षान्ति ऐसी सहनशीलता और संयम की ओर संकेत करती है जिसमें आहत पक्ष प्रत्येक आघात का तत्काल प्रतिघात आवश्यक नहीं मानता। यह पलायन नहीं है-यह एक सचेत, विवेकपूर्ण निर्णय है कि प्रतिक्रिया देने से स्थिति और बिगड़ सकती है।
टीकाकार की व्याख्या में क्षान्ति का संबंध साम-प्रधान (शान्त्युपाय) व्यवहार से जोड़ा गया है, जहाँ बलप्रयोग के स्थान पर सांत्वना और संवाद को प्राथमिकता दी जाती है। साम का अर्थ है संवाद, सांत्वना, शांतिपूर्ण समाधान। इस प्रकार क्षान्ति केवल निष्क्रिय सहनशीलता नहीं, बल्कि सक्रिय शांति-प्रयास है।
क्या क्षान्ति कायरता या दुर्बलता है? टीकाकार का उत्तर स्पष्ट है। क्षान्ति तब अपनाई जाती है जब विग्रह से कोई लाभ न हो, केवल हानि हो। यदि विग्रह शुष्क अर्थात् निरर्थक है, तो बलवान् भी क्षान्ति ही श्रेयस्कर मानता है। यह विवेक का प्रयोग है, कायरता नहीं।
उपेक्षा: सक्रिय अनदेखी की कला
श्लोक का दूसरा उपाय उपेक्षा है। जयमङ्गला-टीका में इसकी व्याख्या इस प्रकार है-“उपेक्षणेन वा दोषानुद्भावनेन वा अनवधारणेन”-अर्थात् उपेक्षा के द्वारा, दोषों का अनुद्भावन न करना, अनवधारण करना।
उपेक्षा का अर्थ यहाँ शत्रु के दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर न देखना और उन्हें मन में न धारण करना है। यह ऐसी स्थिति से संबंधित है जिसमें प्रत्येक उकसावे या क्षति का तत्काल प्रतिरोध न किया जाए। इसका उद्देश्य विग्रह को और बढ़ने से रोकना है।
टीकाकार के अनुसार, ज्ञानविघात की स्थिति में बलवान व्यक्ति को भी उपेक्षा का आश्रय लेना चाहिए। भाव यह है कि शत्रु आखिर कितने समय तक ज्ञान को बाधित कर सकेगा? अर्थात् यह आघात स्थायी नहीं है। इसका उत्तर देने से स्थिति और बिगड़ सकती है। इसलिए उपेक्षा श्रेयस्कर है।
उपेक्षा निष्क्रियता नहीं है। यह एक सक्रिय निर्णय है कि कुछ चीजों को जानबूझकर अनदेखा किया जाए ताकि संघर्ष की तीव्रता कम हो और राज्य को दीर्घकालिक शांति का अवसर मिले।
तदर्थत्याग: विवाद के कारण का परित्याग
जयमङ्गला-टीका में तदर्थत्याग को एक अलग उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है-“तदर्थत्यागेन उपाध्यायादि परित्यागेनार्पणेन वा”-अर्थात् उस प्रयोजन का त्याग, अथवा उपाध्याय अर्थात् शिक्षक आदि का परित्याग या अर्पण।
यदि विवाद का केंद्र बिंदु किसी विशेष वस्तु, स्थान या व्यक्ति का हरण है, तो उसका त्याग किया जा सकता है। यह पूर्ण समर्पण नहीं है-यह एक सचेत निर्णय है कि किसी विशेष वस्तु के लिए विग्रह करने से बड़ी हानि होगी। राज्य, स्त्री, स्थान और देश-इनमें से किसी एक के अपहार पर विग्रह हो, तो उस वस्तु के त्याग से शमन संभव है।
टीकाकार स्पष्ट करते हैं कि विवेकी राजा पहले विचार करे कि विग्रह करना चाहिए या नहीं। यदि विग्रह से हानि ही हो, तो क्षान्ति श्रेयस्कर है। यदि विग्रह शुष्क है, तो बलवान् भी क्षान्ति ही श्रेयस्कर मानता है। क्योंकि ऐसे विग्रह से कोई लाभ नहीं होता, केवल हानि होती है।
तदर्थत्याग इसी विवेक का विस्तार है-विवाद के मूल कारण को पहचानकर, यदि संभव हो, तो उसका परित्याग कर देना। यह न केवल संघर्ष को रोकता है, बल्कि राज्य को उस ऊर्जा को अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में लगाने का अवसर भी देता है।
आज के संदर्भ में श्लोक की प्रासंगिकता
कामन्दक का यह श्लोक आज के भू-राजनीतिक और आर्थिक संघर्षों में भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक युग में यानापहार का स्वरूप बदल गया है-यह अब साइबर हमलों, आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित करने, बंदरगाहों और रेलमार्गों को नष्ट करने के रूप में सामने आता है। धनापहार अब व्यापार युद्धों, आर्थिक प्रतिबंधों और विदेशी मुद्रा भंडार को खाली करने के रूप में देखा जा सकता है।
ज्ञानशक्ति-विघात का आधुनिक रूप बौद्धिक संपदा की चोरी, तकनीक हस्तांतरण पर प्रतिबंध, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों पर साइबर हमले, तथा प्रतिभा-पलायन के रूप में देखा जा सकता है। जब किसी देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और विद्वानों को दूसरा देश अपने पक्ष में कर लेता है, तो यह ज्ञानशक्ति-विघात ही है।
राजकीय शक्ति के क्षरण का आधुनिक उदाहरण है-प्रमुख अधिकारियों, राजनयिकों या सैन्य अधिकारियों को शत्रु देश द्वारा अपने पक्ष में कर लेना, या उन्हें गुप्त रूप से प्रभावित करना। यह कूटनीतिक और आर्थिक दबावों के माध्यम से होता है।
इन स्थितियों में कामन्दक का सुझाव है-तत्काल प्रतिघात के स्थान पर क्षान्ति, उपेक्षा और तदर्थत्याग। यह नीति आज भी उपयोगी है, विशेषकर तब जब तत्काल प्रतिक्रिया से संघर्ष और बढ़ने की संभावना हो।
आधुनिक लोकतंत्र और वैश्विक व्यवस्था में निर्णय-प्रक्रिया प्राचीन राजतंत्र से भिन्न है। यहाँ अनेक पक्ष, हित-समूह और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कार्यरत होती हैं। इसलिए क्षान्ति और उपेक्षा के उपायों को लागू करते समय निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखना होगा-लोकमत की भूमिका, अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियाँ, आर्थिक अन्योन्याश्रयता, सूचना और मीडिया का प्रभाव, तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की दीर्घकालिक रणनीति। प्राचीन काल में राजा का निर्णय अंतिम होता था, जबकि आधुनिक व्यवस्था में निर्णय सामूहिक विचार-विमर्श और संस्थागत प्रक्रियाओं से गुजरता है। अतः इन उपायों को एक व्यापक रणनीतिक ढांचे के भीतर ही अपनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग का आठवाँ श्लोक विग्रह के प्रशमन की ऐसी नीति प्रस्तुत करता है जिसमें यानापहार अथवा धनापहार, ज्ञानशक्ति-विघात और राजकीय शक्ति के क्षरण जैसी परिस्थितियों के सामने तत्काल प्रतिघात के स्थान पर क्षान्ति, उपेक्षा और तदर्थत्याग को उपाय के रूप में रखा गया है। जयमङ्गला-टीका और मन्मथनाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद इस प्रसंग को शिक्षित आचार्यों, विद्या-संस्थानों, धन, परिवहन के साधनों और प्रमुख राजकीय अधिकारियों से जुड़ी हानियों तक भी विस्तृत करते हैं। इस प्रकार श्लोक का मूल संकेत यह है कि प्रत्येक आघात का उत्तर युद्ध या प्रतिघात ही हो, यह आवश्यक नहीं। परिस्थिति के अनुसार संयम, उपेक्षा और विवाद के कारण का त्याग भी विग्रह-प्रशमन के साधन हो सकते हैं।
इस श्लोक के बारे में आपकी क्या राय है? क्या क्षान्ति और उपेक्षा का यह सिद्धांत आज के युग में व्यावहारिक है? टिप्पणी में अपने विचार साझा करें।