कामन्दकीय नीतिसार 10.7: विग्रह नीति

युद्ध और शांति का प्रश्न राजनीतिक चिंतन के आरंभ से ही महत्वपूर्ण रहा है। किसी संघर्ष को कब शांत करने का प्रयास किया जाए और कब उसका प्रत्युत्तर दिया जाए यह निर्णय शासक से परिस्थिति के सूक्ष्म परीक्षण की अपेक्षा करता है।

प्राचीन भारतीय राजनीतिक परंपरा में कौटिल्य के अर्थशास्त्र के बाद कामन्दकीय नीतिसार का महत्वपूर्ण स्थान है। कामन्दक ने अपने ग्रंथ के दशम सर्ग में विग्रह अर्थात् संघर्ष अथवा युद्ध से जुड़ी विभिन्न परिस्थितियों और उनके अनुरूप नीतियों पर विचार किया है। इसी क्रम में श्लोक 10.7 विग्रह की प्रकृति के आधार पर दो प्रकार की प्रतिक्रियाओं की ओर संकेत करता है।

श्लोक के अनुसार, यदि विग्रह स्वार्थ और धर्म के विघात से उत्पन्न हुआ हो, तो पूर्ववर्ती श्लोक में बताए गए प्रशमन के उपायों को ध्यान में रखना चाहिए। दूसरी ओर, यदि विग्रह विषय के ध्वंस से उत्पन्न हुआ हो, तो शत्रु के विषय का प्रतिपीडन किया जाना चाहिए।

इस प्रकार श्लोक 10.7 का मुख्य विषय किसी एक नीति को हर परिस्थिति में लागू करना नहीं, बल्कि विग्रह के कारण को पहचानकर उसके अनुरूप नीति तय करना है।

कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 10.7 में वर्णित प्रशमन और प्रतिपीडन की नीति
विग्रह की प्रकृति के अनुसार प्रशमन या प्रतिपीडन

मूल संस्कृत श्लोक

कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग का सातवाँ श्लोक इस प्रकार है-

एतदेव तु विज्ञेयं स्वार्थधर्मविघातजे।
विषयध्वंसजे शत्रोर्विषयप्रतिपीडनम् ॥ ७ ॥

यहाँ ‘विज्ञेयं’ पाठ माना गया है।

पूर्ववर्ती श्लोक 10.6 का संदर्भ

श्लोक 10.7 को समझने के लिए उससे ठीक पहले आने वाले श्लोक 10.6 को साथ पढ़ना आवश्यक है। वहाँ कहा गया है-

राज्यस्त्रीस्थानदेशानां दानेन च दमेन च।
विग्रहस्य तु युक्तिज्ञैरिति प्रशमनं स्मृतम् ॥ ६ ॥

इस श्लोक में राज्य, स्त्री, स्थान और देश से संबंधित विग्रह के प्रशमन के लिए दान और दम जैसे उपायों का उल्लेख है।

इसके तुरंत बाद 10.7 में स्वार्थधर्मविघात और विषयध्वंस से उत्पन्न स्थितियों की चर्चा होती है। इस क्रम को देखते हुए स्पष्ट है कि 10.7 को पिछले श्लोक से अलग करके नहीं पढ़ना चाहिए। यह पूर्ववर्ती प्रशमन-विचार को एक विशेष परिस्थिति के संदर्भ में आगे बढ़ाता है।

पदच्छेद

एतद् एव तु विज्ञेयम्।
स्वार्थ-धर्म-विघात-जे।
विषय-ध्वंस-जे।
शत्रोः विषय-प्रतिपीडनम्॥

यहाँ स्वार्थधर्मविघातजे और विषयध्वंसजे-दोनों पद विग्रह के कारण की ओर संकेत करते हैं। पहले में स्वार्थ और धर्म के विघात से उत्पन्न स्थिति है, दूसरे में विषय के ध्वंस से उत्पन्न स्थिति।

अन्वय

स्वार्थधर्मविघातजे एतद् एव तु विज्ञेयं, विषयध्वंसजे शत्रोः विषयप्रतिपीडनम्।

श्लोक का अन्वय उसके पदों के परस्पर संबंध को समझने में सहायता करता है। विशेषकर ‘एतद् एव’ का संबंध पूर्ववर्ती श्लोक में उल्लिखित प्रशमन-विचार से जोड़कर समझना चाहिए।

प्रमुख शब्दों का अर्थ

श्लोक के प्रमुख पदों का सामान्य अर्थ इस प्रकार है-

  • एतद् एव - यही

  • तु - तो, किंतु

  • विज्ञेयम् - जानना चाहिए, समझना चाहिए

  • स्वार्थ - अपना प्रयोजन या राजकीय हित

  • धर्म - धर्म, कर्तव्य अथवा धर्मसम्मत दायित्व

  • विघात - बाधा, क्षति या विघटन

  • स्वार्थधर्मविघातजे - स्वार्थ और धर्म के विघात से उत्पन्न स्थिति में

  • विषय - अधिकार-क्षेत्र अथवा भोग-क्षेत्र; संदर्भ के अनुसार इसका अर्थ निर्धारित होता है

  • ध्वंस - नाश या विनाश

  • विषयध्वंसजे - विषय के ध्वंस से उत्पन्न स्थिति में

  • शत्रोः - शत्रु के

  • विषयप्रतिपीडनम् - शत्रु के विषय पर प्रतिकूल दबाव या प्रत्युत्तरात्मक पीड़ा पहुँचाना

यहाँ विशेष रूप से ‘स्वार्थ’ और ‘विषय’ जैसे शब्दों को केवल आधुनिक अर्थ में ग्रहण करना उचित नहीं होगा। इनके अर्थ जयमङ्गल टीका और कामन्दकीय राजनीतिक संदर्भ के साथ समझना आवश्यक है।

भावार्थ

इस श्लोक का सरल भावार्थ यह है कि यदि विग्रह का कारण स्वार्थ और धर्म का विघात हो, तो पूर्ववर्ती श्लोक में बताए गए प्रशमन के उपायों को समझना चाहिए। किंतु यदि विग्रह विषय के ध्वंस से उत्पन्न हुआ हो, तो शत्रु के विषय का प्रतिपीडन करना चाहिए।

अर्थात् कामन्दक संघर्ष की हर स्थिति के लिए एक ही उपाय निर्धारित नहीं करते। संघर्ष के कारण और उसकी प्रकृति को देखकर उसके अनुरूप प्रतिक्रिया तय की जानी चाहिए।

जयमङ्गल टीका का आशय

जयमङ्गल टीका इस श्लोक के अर्थ को समझने में विशेष सहायता करती है। टीका के संदर्भ में स्वार्थ और स्वधर्म को सामान्य व्यक्तिगत अर्थों में लेने के बदले उनके राजकीय और धार्मिक संदर्भ को ध्यान में रखा जाता है। स्वार्थ की व्याख्या दुर्ग आदि से संबंधित राजकीय प्रयोजनों और कार्यों के संदर्भ में की जाती है, जबकि स्वधर्म का संबंध अश्वमेध आदि धर्मसम्मत कर्तव्यों के प्रवर्तन से जोड़ा जाता है।

इस प्रकार जब स्वार्थ और स्वधर्म में विघात उत्पन्न होता है, तब उसके समाधान के लिए प्रशमन की नीति की ओर संकेत किया गया है।

दूसरी ओर, विषयध्वंस के संदर्भ में टीका विषय की हानि या विनाश की ओर संकेत करती है। ऐसी स्थिति में शत्रु के विषय का प्रतिपीडन करने की बात कही गई है।

जयमङ्गल की व्याख्या में प्रतिपीडन का भाव केवल क्रोधजनित प्रतिशोध तक सीमित नहीं है। शत्रु ने जितनी हानि पहुँचाई हो, उसके अनुरूप प्रतिकार करने का विचार यहाँ सामने आता है। इस कारण ‘प्रतिपीडन’ को श्लोक के संदर्भ में प्रत्युत्तरात्मक कार्रवाई के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।

स्वार्थधर्मविघातजे का अर्थ

‘स्वार्थधर्मविघातजे’ शब्द को केवल ‘निजी स्वार्थ और धर्म की हानि’ के सामान्य अर्थ में लेना पर्याप्त नहीं होगा। यहाँ स्वार्थ और धर्म दोनों का संबंध उस राजनीतिक व्यवस्था से है जिसके भीतर राजा के प्रयोजन तथा उसके धर्मसम्मत दायित्व आते हैं।

जयमङ्गल की व्याख्या इस पद को अधिक विशिष्ट संदर्भ देती है। इसलिए ‘स्वार्थ’ को आधुनिक अर्थ में केवल व्यक्तिगत लाभ समझना उचित नहीं है।

इस पद में विग्रह के दो आधार दिखाई देते हैं स्वार्थ और धर्म। जब इनमें विघात उत्पन्न होता है और उससे संघर्ष की स्थिति बनती है, तब पूर्ववर्ती श्लोक में बताए गए प्रशमन के उपायों की ओर संकेत किया जाता है।

विषयध्वंसजे का अर्थ

‘विषय’ शब्द का अर्थ यहाँ केवल आधुनिक अर्थ में ‘राज्यक्षेत्र’ या भौगोलिक सीमा मान लेना उचित नहीं है। जयमङ्गल टीका के संदर्भ में यह अधिकार-क्षेत्र अथवा भोग-क्षेत्र से संबंधित अर्थ ग्रहण करता है। इसलिए विषयध्वंस को उस विषय की हानि या विनाश के रूप में समझना चाहिए जिससे विग्रह उत्पन्न होता है।

यहाँ श्लोक का दूसरा पक्ष सामने आता है। यदि शत्रु के कारण किसी पक्ष के विषय का ध्वंस होता है, तो उसके प्रत्युत्तर में शत्रु के विषय का प्रतिपीडन करने की नीति कही गई है।

इस प्रकार ‘विषयध्वंस’ संघर्ष के उस कारण को व्यक्त करता है जिसमें किसी पक्ष के अधिकार या भोग-क्षेत्र को क्षति पहुँचती है।

विषयप्रतिपीडनम् का आशय

‘विषयप्रतिपीडनम्’ को समझने के लिए जयमङ्गल टीका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

शब्द की दृष्टि से इसका रूप है विषय + प्रतिपीडन, अर्थात् विषय पर प्रत्युत्तरात्मक पीड़ा या दबाव।

किंतु इसका आशय केवल भावनात्मक प्रतिशोध नहीं है। टीका के अनुसार शत्रु ने जितनी हानि पहुँचाई हो, उसके अनुरूप प्रतिकार करने का विचार इसमें निहित है।

इसलिए ‘प्रतिपीडन’ को केवल ‘उसी प्रकार सब कुछ नष्ट कर देना’ कहना उचित नहीं होगा। इसका मूल भाव शत्रु के विषय पर प्रत्युत्तरात्मक दबाव या प्रतिघात करना है।

यहाँ आधुनिक राजनीतिक या सैन्य शब्दावली का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन मूल संस्कृत पद को किसी आधुनिक सैन्य सिद्धांत का सीधा पर्याय मानना उचित नहीं होगा।

प्रशमन और प्रतिपीडन में अंतर

इस श्लोक का मुख्य नीतिगत पक्ष प्रशमन और प्रतिपीडन के बीच का अंतर है।

प्रशमन का अर्थ है संघर्ष को शांत करना या उसकी तीव्रता कम करना। पूर्ववर्ती श्लोक में दान और दम जैसे उपायों के माध्यम से विग्रह के प्रशमन का उल्लेख किया गया है।

इसके विपरीत प्रतिपीडन में शत्रु की कार्रवाई के प्रत्युत्तर में उसके विषय पर दबाव डालने का भाव है।

दोनों नीतियों का आधार अलग है। जहाँ स्थिति को शांत करने और समाप्त करने की संभावना हो, वहाँ प्रशमन का विचार सामने आता है। जहाँ शत्रु द्वारा विषय का ध्वंस किया गया हो, वहाँ प्रतिपीडन की नीति कही गई है।

कामन्दक का बल इसी परिस्थिति-सापेक्ष निर्णय पर है।

महाभारत से तुलनात्मक दृष्टांत

महाभारत का पाण्डव-कौरव संघर्ष इस श्लोक की नीति को समझने के लिए एक तुलनात्मक दृष्टांत के रूप में देखा जा सकता है।

युद्ध से पहले पाण्डव पक्ष की ओर से समझौते और शांति के प्रयासों का वर्णन महाभारत में मिलता है। कृष्ण का दूत बनकर जाना और संधि का प्रयास संघर्ष टालने की दिशा में उठाया गया कदम था। बाद में जब समझौते की संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब संघर्ष युद्ध का रूप लेता है।

फिर भी महाभारत के इस प्रसंग को कामन्दकीय नीतिसार के श्लोक 10.7 का प्रत्यक्ष उदाहरण मानना उचित नहीं होगा। दोनों ग्रंथों का स्वरूप और उद्देश्य अलग हैं। महाभारत एक विस्तृत आख्यानात्मक ग्रंथ है, जबकि कामन्दकीय नीतिसार राजनीतिक नीति का शास्त्रीय ग्रंथ है।

इसलिए महाभारत का प्रसंग यहाँ केवल तुलनात्मक दृष्टांत के रूप में उपयोगी है।

मानवीय नीति-निर्णय का महत्व

श्लोक 10.7 में विग्रह की प्रकृति को पहचानकर उसके अनुरूप उपाय निर्धारित करने पर जोर है। इससे स्पष्ट है कि यहाँ राजा के नीतिगत निर्णय और परिस्थिति के विवेकपूर्ण परीक्षण को महत्व दिया गया है।

किंतु केवल इस एक श्लोक के आधार पर कामन्दक के पूरे दार्शनिक दृष्टिकोण को ‘नियतिवाद’ या ‘नियतिवाद-विरोध’ की किसी निश्चित श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

इस श्लोक का प्रत्यक्ष विषय दर्शन नहीं, बल्कि विग्रह की स्थिति में उचित नीति का निर्धारण है। इसलिए यहाँ मानवीय निर्णय की भूमिका को स्वीकार करना अधिक संतुलित निष्कर्ष है।

सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में इस श्लोक की सीमा

इस श्लोक में ‘धर्म’ और ‘स्वार्थ’ जैसे महत्वपूर्ण पद अवश्य आते हैं, लेकिन सामाजिक असमानता, वर्णव्यवस्था या सामाजिक पुनर्व्यवस्था पर यहाँ प्रत्यक्ष चर्चा नहीं है।

इसलिए केवल श्लोक 10.7 के आधार पर कामन्दक की संपूर्ण सामाजिक दृष्टि का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। ‘धर्म’ का व्यापक अर्थ समझने के लिए कामन्दकीय नीतिसार के अन्य प्रसंगों को भी साथ देखना आवश्यक है।

इस श्लोक की सीमा में इतना कहा जा सकता है कि धर्म का विघात यहाँ राजनीतिक संघर्ष के एक कारण के रूप में सामने आता है और ऐसी स्थिति में प्रशमन की नीति का उल्लेख किया गया है।

निष्कर्ष

कामन्दकीय नीतिसार का श्लोक 10.7 विग्रह को केवल युद्ध या संघर्ष के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसके कारण को नीति-निर्णय का आधार बनाता है।

स्वार्थधर्मविघात की स्थिति में पूर्ववर्ती श्लोक में बताया गया प्रशमन-विचार सामने आता है, जबकि विषयध्वंस की स्थिति में शत्रु के विषय के प्रतिपीडन की बात कही गई है।

इस प्रकार श्लोक का मूल नीतिगत संदेश यह है कि संघर्ष की सभी परिस्थितियों में एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया उचित नहीं होती। परिस्थिति, कारण और उससे उत्पन्न हानि को समझकर ही उपाय निर्धारित किया जाना चाहिए।

जयमङ्गल टीका के साथ पढ़ने पर ‘स्वार्थ’, ‘धर्म’, ‘विषय’ और ‘प्रतिपीडन’ जैसे पदों का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है। विशेषकर ‘विषयप्रतिपीडनम्’ को केवल प्रतिशोध के अर्थ में सीमित कर देना उचित नहीं होगा; टीका के संदर्भ में इसमें शत्रु की कार्रवाई के अनुरूप प्रत्युत्तर का भाव है।

इस दृष्टि से श्लोक 10.7 कामन्दकीय राजनीतिक चिंतन में परिस्थिति के अनुसार नीति निर्धारित करने की प्रवृत्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

यह पोस्ट मूल रूप से Indian Philosophy and Ethics पर प्रकाशित हुई है।
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