राजनीति में राजधर्म और मित्रता का रिश्ता सदा से उलझा हुआ रहा है। क्या राजा अपने मित्र के लिए सब कुछ न्योछावर कर दे? या मित्र की उपेक्षा कब करनी चाहिए यह भी विचारणीय प्रश्न है। कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग का श्लोक 10.9 इसी दुविधा का सूक्ष्म उत्तर देता है। कौटिल्य की परंपरा में आने वाले कामन्दक मित्रधर्म की दो अलग-अलग स्थितियाँ सामने रखते हैं। जब मित्र अधर्म और द्रोह से युक्त हो अर्थात् अधर्मद्रोहसंयुक्त मित्र-तो उसकी उपेक्षा करनी चाहिए, चाहे वह मित्र ही क्यों न हो। लेकिन आत्मवान मित्र क्या है? वह धर्मपरायण, विश्वसनीय और आत्मा के समान प्रिय मित्र है; उसके लिए प्राण तक त्याग देने चाहिए। यह श्लोक केवल राजा के लिए नहीं है। यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो यह समझना चाहता है कि मित्रता का मूल्यांकन किस आधार पर होना चाहिए। इस श्लोक को समझने के लिए पहले इसके शब्दों को खोलना जरूरी है।
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| कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 10.9: अधर्मी मित्र की उपेक्षा और आत्मवान मित्र के लिए बलिदान |
मूल संस्कृत श्लोक
अधर्मद्रोहसंयुक्ते मित्रजातेऽप्युपेक्षणम्।
आत्मवन्मित्रजाते तु प्राणानपि परित्यजेत्॥ ९॥
स्रोत: कामन्दकीय नीतिसार, दशम सर्ग, श्लोक ९ (अर्थात् 10.9)
स्पष्टीकरण: यह दशम सर्ग का नौवाँ श्लोक है, इसलिए इसे 10.9 कहा जाता है। अंत में दिया गया ॥९॥ केवल सर्ग के भीतर की संख्या है, पूरे ग्रंथ की नहीं।
शब्दार्थ
- अधर्म - धर्म के विरुद्ध आचरण
- द्रोह - विश्वासघात, शत्रुभाव
- संयुक्ते - युक्त, भरा-हुआ
- मित्रजाते - मित्र वर्ग में, मित्र के प्रकार में
- अपि - भी
- उपेक्षणम् - उपेक्षा, सचेत दूरी
- आत्मवन् - आत्मा के समान प्रिय, धर्मात्मा
- तु - लेकिन, किंतु
- प्राणान् - प्राणों को
- परित्यजेत् - त्याग कर देना चाहिए
भावार्थ
राजा को चाहिए कि यदि कोई मित्र अधर्म और द्रोह से युक्त हो, तो उसकी उपेक्षा करे, चाहे वह मित्र ही क्यों न हो। लेकिन यदि मित्र आत्मा के समान प्रिय हो अर्थात् धर्मपरायण और विश्वसनीय - तो उसके लिए प्राणों का त्याग भी कर देना चाहिए।
मूल श्लोक का पाठ और उसका स्थान
कामन्दकीय नीतिसार के दशम सर्ग में कामन्दक राजा के शत्रु, मित्र और तटस्थ शक्तियों के बीच व्यवहार की बात करते हैं। इसी क्रम में यह श्लोक आता है। यहाँ वे मित्रनिमित्तक विग्रह यानी मित्र के कारण उठे युद्ध के संदर्भ में प्रशमोपाय यानी शांति के उपाय बता रहे हैं।
श्लोक का पहला चरण कहता है कि अधर्म और द्रोह से युक्त मित्र की उपेक्षा करनी चाहिए। दूसरा चरण कहता है कि आत्मवान मित्र के लिए प्राण तक छोड़ देने चाहिए। जयमंगला टीका, जो कामन्दकीय नीतिसार पर लिखी गई प्रसिद्ध संस्कृत व्याख्या है, इस पर टिप्पणी करती है कि अधर्म और द्रोह से युक्त मित्र का सहयोग लेना विग्रह को शांत करने के बजाय और भड़का देता है। इसलिए उससे दूरी ही उचित है। दूसरी ओर, आत्मवान मित्र के लिए प्राण त्यागने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
व्याख्या: मित्र के दो प्रकार
कामन्दक यहाँ मित्रता को दो श्रेणियों में बाँटते हैं। पहली श्रेणी, अधर्मद्रोहसंयुक्त मित्र। दूसरी, आत्मवन्मित्र। यह विभाजन केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक भी है।
अधर्म का अर्थ है शास्त्रविरुद्ध आचरण। द्रोह का अर्थ है विश्वासघात। जिस मित्र में ये दोनों दोष हों, वह राजा के लिए बोझ है। ऐसे मित्र का सहयोग लेने से राजा स्वयं अधर्म के दलदल में धँस जाता है। टीका में कहा गया है कि ऐसे मित्र की उपेक्षा करना कायरता नहीं, विवेक है।
दूसरी ओर, आत्मवान मित्र वह है जिसमें आत्मा के गुण विद्यमान हों। टीका के अनुसार मित्र का आत्मा उसकी प्रकृति है, उसका तत्त्व है, उसकी संपदा और गुण हैं। जिस मित्र में ये सब हों, वह आत्मवान है। ऐसे मित्र के लिए प्राण त्यागना भी उचित है।
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि कामन्दक मित्रता को भावुकता का विषय नहीं, विवेक का विषय मानते हैं। वे यह नहीं कहते कि जो मित्र कहलाता है, उसके लिए सब कुछ करो। वे कहते हैं कि पहले देखो, वह मित्र कैसा है। अगर अधर्मी है, तो दूरी बनाओ। अगर धर्मात्मा है, तो उसके लिए प्राण दो।
अधर्मी मित्र की पहचान कैसे करें?
कामन्दक ने अधर्मी मित्र की पहचान के लिए दो शब्द दिए हैं, अधर्म और द्रोह। इन दोनों को समझना जरूरी है, क्योंकि हर बुरा मित्र एक जैसा नहीं होता।
अधर्मी मित्र वह है जो स्वयं शास्त्रविरुद्ध काम करता हो। जो दूसरों को अधर्म में प्रेरित करता हो। जो अधर्म का साथ देता हो या उस पर पर्दा डालता हो। ऐसा मित्र धीरे-धीरे राजा को भी अधर्म की ओर खींच ले जाता है।
द्रोही मित्र वह है जो पीठ पीछे शत्रुता करता हो। जो भेद खोलता हो। जो स्वार्थ के लिए धोखा देता हो। ऐसा मित्र सामने मुस्कुराता है और पीछे छुरा भोंकता है।
कामन्दक कहते हैं कि ऐसे मित्र की उपेक्षा करनी चाहिए। यहाँ उपेक्षा का अर्थ केवल नजरअंदाज करना नहीं है। इसका अर्थ है सचेत दूरी बनाना, उसके सलाह-मशवरे से बचना और उसके साथ राजनीतिक मामलों में हाथ न मिलाना।
आत्मवान मित्र कौन है?
आत्मवान मित्र की पहचान उसके गुणों से होती है। कामन्दक और उनकी टीका परंपरा में इन गुणों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
पहला गुण है धर्मपरायणता। वह सदा धर्म के मार्ग पर चलता है। अधर्म का साथ नहीं देता, चाहे उसे कितनी भी हानि क्यों न उठानी पड़े।
दूसरा गुण है विश्वसनीयता। उसका वचन पत्थर की लकीर होता है। वह कभी पीठ पीछे कुछ नहीं करता।
तीसरा गुण है निःस्वार्थता। वह स्वार्थ के लिए मित्रता नहीं करता। उसकी मित्रता में कोई छिपा हुआ लेन-देन नहीं होता।
चौथा गुण है साहस। संकट के समय वह पीछे नहीं हटता। जब सब साथ छोड़ दें, तब भी वह साथ खड़ा रहता है।
पाँचवाँ गुण है समर्पण। वह मित्र के लिए सब कुछ न्योछावर कर सकता है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मित्रप्रकृति के प्रसंग में ऐसे ही मित्र का वर्णन है। वे कहते हैं कि वह मित्र श्रेष्ठ है जो पीढ़ियों से चला आ रहा हो, जो नित्य वश में हो, जो विश्वसनीय हो और जो बड़े उपकार करने में समर्थ हो। जिस मित्र में ये गुण हों, वही कामन्दक का आत्मवान मित्र है। ऐसे मित्र के लिए प्राणों की परवाह नहीं करनी चाहिए।
यह केवल आदर्श वाक्य नहीं है। यह राजधर्म है। क्योंकि ऐसा मित्र राजा की सबसे बड़ी संपत्ति होता है। धन चला जाए तो फिर आ सकता है। राज्य छिन जाए तो फिर मिल सकता है। लेकिन ऐसा मित्र एक बार चला जाए तो फिर नहीं मिलता।
कौटिल्य और कामन्दक में मित्रवर्ग की तुलना
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मित्रवर्ग का विस्तृत वर्णन है। वे मित्रों को कई श्रेणियों में बाँटते हैं सहज मित्र, जो जन्म से मित्र हो; कृत्रिम मित्र, जो स्वार्थवश मित्र बना हो; संपन्न मित्र और निर्धन मित्र। कौटिल्य का दृष्टिकोण व्यवहारवादी है। वे मित्र को शक्ति-संतुलन के चश्मे से देखते हैं।
कामन्दक कौटिल्य की परंपरा में आते हैं, लेकिन उनका झुकाव अधिक नैतिक है। वे मित्र की कसौटी धन या शक्ति नहीं, बल्कि धर्म और आत्मगुण बताते हैं। यह अंतर महत्वपूर्ण है।
कौटिल्य यह देखते हैं कि मित्र से राज्य को कितना व्यावहारिक लाभ मिलेगा, जबकि कामन्दक यह परखते हैं कि मित्र का नैतिक चरित्र कैसा है। कौटिल्य की दृष्टि राज्य की सुरक्षा पर है, कामन्दक की राजा के चरित्र पर। दोनों अपनी-अपनी जगह सार्थक हैं। दोनों को मिलाकर पढ़ें तो पूरा चित्र बनता है। मित्र का मूल्यांकन लाभ और चरित्र, दोनों से होना चाहिए। लेकिन जहाँ दोनों में टकराव हो, वहाँ कामन्दक धर्म को ऊपर रखते हैं।
नियतिवाद: मित्र का चुनाव किसके हाथ में है?
कामन्दकीय नीतिसार में नियतिवाद का उल्लेख कई जगह आता है। नियतिवाद कहता है कि सब कुछ पहले से तय है। मनुष्य के पास स्वतंत्र इच्छा नहीं है। लेकिन इस श्लोक में कामन्दक राजा को निर्णय की स्वतंत्रता देते हैं।
राजा को यह तय करना है कि कौन मित्र अधर्मी है और कौन आत्मवान। अगर सब कुछ नियति से तय होता, तो मित्र के चयन का प्रश्न ही न उठता। कामन्दक का दृष्टिकोण नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा के बीच संतुलन का है।
वे यह स्वीकार करते हैं कि कुछ बातें हमारे वश में नहीं हैं। मित्र कैसा मिलेगा, यह शायद नियति का खेल है। लेकिन मित्र का मूल्यांकन और उसके प्रति व्यवहार हमारे हाथ में है। यही कामन्दक की मौलिकता है।
यहाँ यह भी सोचने की बात है कि क्या अधर्मी मित्र का मिलना भी नियति है? अगर हाँ, तो क्या राजा उससे दूरी बना सकता है? कामन्दक का उत्तर स्पष्ट है: हाँ, राजा दूरी बना सकता है। क्योंकि नियति परिस्थिति देती है, निर्णय नहीं। राजा को परिस्थिति स्वीकार करनी है, लेकिन निर्णय अपने विवेक से लेना है।
सामाजिक असमानता: मित्रता में जाति का प्रश्न
कामन्दकीय नीतिसार में वर्णाश्रम व्यवस्था का उल्लेख है। यह उस समय की सामाजिक वास्तविकता थी। लेकिन इस श्लोक में मित्रता के संदर्भ में जाति या वर्ण का कोई उल्लेख नहीं है।
कामन्दक के लिए मित्र की कसौटी उसका आचरण है, उसकी सामाजिक स्थिति नहीं। यदि कोई निम्न मानी गई जाति का व्यक्ति भी धर्मपरायण और आत्मवान है, तो वह राजा का मित्र हो सकता है। यह उस युग के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
हालाँकि यहाँ एक सावधानी जरूरी है। कामन्दक का मुख्य दर्शक राजा है, सामान्य जन नहीं। उनका नीतिशास्त्र राजकीय व्यवहार के लिए लिखा गया है। वे सामाजिक क्रांति की बात नहीं कर रहे। लेकिन फिर भी, मित्रता के मूल्यांकन में जाति को बाहर रखना एक प्रगतिशील पहलू है। यह दिखाता है कि नीतिशास्त्र जब चरित्र को कसौटी बनाता है, तो जन्म आधारित भेद अपने आप गौण हो जाते हैं।
उदाहरण: महाभारत और रामायण से
अधर्मी मित्र का साथ न छोड़ने का परिणाम: कर्ण
कर्ण और दुर्योधन की मित्रता इस श्लोक की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर था। कर्ण यह जानता था। फिर भी उसने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा।
कामन्दक कहते हैं कि अधर्मी मित्र की उपेक्षा करनी चाहिए। कर्ण ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप वह भी अधर्म के युद्ध का हिस्सा बना और मारा गया। कर्ण स्वयं बड़ा दानवीर था, बड़ा योद्धा था। लेकिन मित्र के चुनाव में उसने विवेक का प्रयोग नहीं किया। यह उदाहरण दिखाता है कि अधर्मी मित्र का साथ कितना घातक हो सकता है।
आत्मवान मित्र का उदाहरण: राम और सुग्रीव, राम और विभीषण
रामायण में राम और सुग्रीव की मित्रता आत्मवान मित्रता का उदाहरण है। राम ने सुग्रीव के लिए वाली का वध किया। सुग्रीव ने राम के लिए सीता की खोज में पूरी वानर सेना लगा दी। दोनों ने एक-दूसरे के लिए प्राणों की परवाह नहीं की।
विभीषण का उदाहरण और भी सटीक है। विभीषण ने अधर्मी भाई रावण का साथ छोड़ दिया। वह राम के पास चला आया। राम ने उसे शरण दी। यहाँ विभीषण ने ठीक वही किया जो कामन्दक कहते हैं, अधर्मी मित्र या बंधु की उपेक्षा कर दी। और राम ने ठीक वही किया जो कामन्दक कहते हैं आत्मवान मित्र के लिए प्राणों की परवाह नहीं की।
भरत और राम का प्रसंग
भरत और राम का संबंध मुख्यतः भ्रातृप्रेम का प्रतीक है, न कि राजनीतिक मित्रता का। भरत ने राम के लिए राज्य त्याग दिया, यह भ्रातृधर्म का उदाहरण है। इसे मित्रधर्म के दायरे में लाना हो तो यह कह सकते हैं कि जब बंधु में मित्र के गुण आ जाएँ, तो वह आत्मवान मित्र से भी बढ़कर हो जाता है। लेकिन श्लोक के मूल प्रयोजन के लिए राम और सुग्रीव, अथवा राम और विभीषण का उदाहरण अधिक उपयुक्त है, क्योंकि वहाँ संबंध राजनीतिक भी है और नैतिक भी।
यह श्लोक आज कितना प्रासंगिक है?
यह श्लोक केवल प्राचीन राजसभाओं तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग आज भी कई जगह होता है।
राजनीति में: गठबंधन की राजनीति में यह श्लोक मार्गदर्शक है। किस दल से हाथ मिलाना है, किससे दूरी बनानी है, यह तय करने में यह कसौटी काम आती है। अगर साथी दल अधर्मी तरीके अपनाता है, तो उसका साथ छोड़ देना ही बेहतर है।
व्यापार में: साझेदारी चुनते समय भी यह श्लोक काम आता है। साझेदार का चरित्र, उसकी नीयत, उसका आचरण ये सब देखना चाहिए। केवल पूँजी या मुनाफे को देखकर साझेदारी करना खतरनाक हो सकता है।
व्यक्तिगत जीवन में: भी यह लागू होता है। हमें ऐसे मित्रों से दूरी बनानी चाहिए जो अधर्मी हों, द्रोही हों। और ऐसे मित्रों के लिए सब कुछ न्योछावर करना चाहिए जो आत्मवान हों।
सोशल मीडिया के इस दौर में: यह श्लोक और भी प्रासंगिक हो जाता है। यहाँ मित्रों की संख्या हज़ारों में होती है, लेकिन आत्मवान मित्र शायद दो-चार ही मिलते हैं। कामन्दक हमें याद दिलाते हैं कि संख्या मायने नहीं रखती, चरित्र मायने रखता है।
निष्कर्ष
कामन्दकीय नीतिसार श्लोक 10.9 राजनीतिक नैतिकता का सूक्ष्म चित्र है। यह बताता है कि मित्रता अंधी नहीं होनी चाहिए। राजा को मित्र के गुणों और आचरण का मूल्यांकन करना चाहिए। अधर्मी और द्रोही मित्र से दूरी बनाना राजधर्म है। आत्मवान मित्र के लिए प्राण त्यागना भी उचित है। यह श्लोक मित्रता के मूल्यांकन में जाति और सामाजिक स्थिति को गौण रखता है। कामन्दक का यह दृष्टिकोण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।
मित्रता केवल भावना नहीं, विवेक का विषय है। सच्चा मित्र वह है जो धर्म पर चले। ऐसे मित्र के लिए सब कुछ न्योछावर करना सार्थक है। और अधर्मी मित्र से दूरी बनाना ही बुद्धिमानी है। कामन्दक का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि मित्रों की संख्या मायने नहीं रखती, बल्कि चरित्र मायने रखता है।